शिक्षा हमारे बेहतर भविष्य और जीवन के लिए बेहद आवश्यक है, अगर हम शिक्षित नहीं होते हैं तो अपने अधिकारों को भी नहीं समझ पाते हैं। लेकिन यदि बच्चों के बजाय बड़ी उम्र के लोग शिक्षा लेते नजर आएं, तो यह किसी को भी हैरान कर सकता है। कुछ ऐसी ही प्रेरणादायक कहानी उत्तर प्रदेश के अमेठी जिले की है, जहां मालती और राधा जैसी महिलाएं घर की जिम्मेदारियां संभालने की उम्र में अपने हाथों में किताबें थामे नजर आ रही हैं। उन्हें इस बात का कोई आश्चर्य नहीं है, बल्कि उनका साफ कहना है कि पढ़ाई की कोई उम्र नहीं होती है और मैडम के पढ़ाने का तरीका उन्हें बेहद अच्छा लगता है।
नव साक्षरता अभियान से संवर रहा जीवन
बेसिक शिक्षा विभाग की ओर से हर साल नव साक्षरता अभियान चलाया जाता है। इस अभियान का मुख्य उद्देश्य उन महिलाओं को जोड़ना और साक्षर बनाना है, जो किसी वजह से पहले पढ़ नहीं पाई थीं। अमेठी जिले के गौरीगंज की रहने वाली राधा सिंह और मालती मौर्य जैसी महिलाओं की यह कहानी दर्शाती है कि कैसे काम की उम्र में भी हाथों में किताबें थामकर अपना भविष्य संवारा जा सकता है और आत्मनिर्भर बना जा सकता है।
क्या कहती हैं राधा और मालती
मालती देवी का कहना है कि पढ़ाई की कोई उम्र नहीं होती है। वह घर पर काम करने के साथ-साथ बच्चों के साथ खुद भी किताब लेकर बैठती हैं और पढ़ाई करती हैं। इसके अलावा स्कूल में भी उनकी कक्षाएं चलती हैं और मैडम के पढ़ाने का तरीका उन्हें बहुत पसंद आता है। उनका मानना है कि अगर लोग पढ़े-लिखे रहेंगे तभी अपने अधिकारों को समझ पाएंगे, अन्यथा कोई भी उनका फायदा उठाकर उन्हें ठग सकता है।
वहीं, राधा सिंह बताती हैं कि जिले में उन सबको शिक्षा का अधिकार मिल रहा है। पहले वे बिल्कुल पढ़ी-लिखी नहीं थीं और जो थोड़ी-बहुत पढ़ाई की थी, उसे भी भूल चुकी थीं, लेकिन अब सब कुछ फिर से याद आ रहा है। बच्चों के साथ किताबें लेकर पढ़ने बैठने पर उन्हें अपना बचपन भी याद आ जाता है। साक्षर होकर वे आज अपना भविष्य बेहतर बना रही हैं और अपने अधिकारों के प्रति जागरूक हो रही हैं।
शिक्षा विभाग की पहल और अधिकारियों का पक्ष
जिला बेसिक शिक्षा अधिकारी संजय तिवारी ने इस बारे में जानकारी देते हुए बताया कि नव साक्षरता अभियान के तहत ग्रामीण क्षेत्रों और परिवेश के 1570 विद्यालयों में समय-समय पर विशेष अभियान चलाया जाता है। इस अभियान में उन महिलाओं को जोड़ा जाता है जो साक्षर नहीं हैं। उन्हें साक्षर बनाने के साथ-साथ उनके कानूनी और सामाजिक अधिकारों के प्रति जागरूक किया जाता है। इस पहल से काफी फायदा मिल रहा है और महिलाएं जागरूक होने के साथ-साथ आत्मनिर्भर भी बन रही हैं।


















