बोकारो क्षेत्र के किसान बड़े पैमाने पर फ्रेंच बीन की खेती करते हैं। हालांकि, मौसम में लगातार होने वाले बदलावों और देखभाल में थोड़ी सी भी चूक के कारण फसलों पर कई गंभीर बीमारियां हमला बोल देती हैं। इन रोगों की वजह से पौधों का विकास रुक जाता है और कुल पैदावार में भारी गिरावट आती है, जिससे किसानों को वित्तीय नुकसान का सामना करना पड़ता है। इस समस्या से निपटने के लिए बोकारो के कृषि एक्सपर्ट कुलदीप कुमार ने फ्रेंच बीन में लगने वाली प्रमुख बीमारियों, उनके स्पष्ट लक्षणों और समय रहते इनसे निपटने के असरदार तरीकों की विस्तृत जानकारी दी है।
पाउडरी मिल्ड्यू से कमजोर होते हैं पौधे
कृषि एक्सपर्ट कुलदीप कुमार के अनुसार, फ्रेंच बीन की फसल में पाउडरी मिल्ड्यू एक आम समस्या है जो पौधों को काफी नुकसान पहुंचाती है। इस बीमारी में पौधों की पत्तियों के ऊपर सफेद रंग के पाउडर जैसी परत जमने लगती है, और यदि स्थिति ज्यादा गंभीर हो जाए तो उस पर भूरे रंग के धब्बे भी उभर आते हैं। इसकी वजह से पत्तियों की प्रकाश संश्लेषण की क्रिया पर बुरा असर पड़ता है और पौधे भीतर से कमजोर होने लगते हैं। इस बीमारी पर काबू पाने के लिए सल्फर 80 प्रतिशत डब्ल्यूपी का इस्तेमाल किया जा सकता है। इसके लिए दो ग्राम दवा को प्रति लीटर पानी में मिलाकर उसका घोल तैयार करके छिड़काव किया जाना चाहिए। इसके अलावा, डाइफेनोकोनाजोल 25 प्रतिशत ईसी का भी उपयोग किया जा सकता है, जिसमें 0.5 से एक मिलीलीटर मात्रा को प्रति लीटर पानी में घोलकर छिड़कने से पाउडरी मिल्ड्यू की समस्या से पूरी तरह राहत मिल सकती है।
जलभराव से बढ़ता है जड़ सड़न का खतरा
फसल को नुकसान पहुंचाने वाले अन्य कारकों में जड़ सड़न और पौधों के मुरझाने की दिक्कत भी किसानों को बहुत परेशान करती है। इस समस्या को जड़ से खत्म करने के लिए किसानों को सबसे पहले खेत में पानी के निकास का पुख्ता बंदोबस्त करना चाहिए, ताकि बारिश या सिंचाई का अतिरिक्त पानी खेत में कहीं भी रुक न पाए। यदि इस बीमारी के लक्षण पौधों पर दिखाई देने लगें, तो कॉपर ऑक्सीक्लोराइड का तीन ग्राम प्रति लीटर पानी की दर से घोल बनाकर छिड़काव करना फायदेमंद रहता है। इसके साथ ही, पांच से दस ग्राम ट्राइकोडर्मा को प्रति लीटर पानी में मिलाकर छिड़काव करने से भी इस खतरनाक रोग से फसल को सुरक्षित रखा जा सकता है।
रतुआ रोग के लक्षण और बचाव
फ्रेंच बीन की फसल को बर्बाद करने में बीन रस्ट यानी रतुआ रोग भी बहुत बड़ी भूमिका निभाता है। इस बीमारी के दौरान पत्तियों के ठीक नीचे की सतह पर छोटे-छोटे उभरे हुए भूरे, लाल या फिर नारंगी रंग के धब्बे साफ नजर आने लगते हैं। जब इन धब्बों को छुआ जाता है, तो इनसे बिल्कुल लोहे की जंग जैसा पाउडर बाहर निकल सकता है। जैसे-जैसे इस बीमारी का प्रकोप बढ़ता है, वैसे-वैसे पत्तियां पीली पड़कर सूखने लगती हैं, जिससे फसल की कुल बढ़वार और उत्पादन बुरी तरह प्रभावित होता है। इस खास बीमारी पर नियंत्रण पाने के लिए सल्फर 80 प्रतिशत डब्ल्यूपी का दो से ढाई ग्राम प्रति लीटर पानी में घोल बनाकर फसल पर छिड़काव करने की सलाह दी जाती है।
एन्थ्रेक्नोज रोग और इसके उपाय
एन्थ्रेक्नोज फ्रेंच बीन की फसल में लगने वाला एक बेहद प्रमुख फफूंदजनित रोग है। इस बीमारी के होने पर पत्तियों पर गहरे भूरे या एकदम काले रंग के धब्बे पड़ने लगते हैं, और इसके लक्षण केवल पत्तियों तक सीमित न रहकर फलियों तथा तनों पर भी दिखाई दे सकते हैं। जब इस रोग का असर बहुत ज्यादा बढ़ जाता है, तो फसल की गुणवत्ता और पैदावार दोनों में भारी गिरावट आ जाती है। इस बीमारी से अपनी फसल को बचाने के लिए बुवाई से पहले बीज उपचार करना बहुत जरूरी होता है, जिसके लिए कार्बेन्डाजिम 50 प्रतिशत डब्ल्यूपी का उपयोग किया जा सकता है। वहीं, यदि खेत में फसल उगने के बाद इस रोग के लक्षण दिखने लगें, तो मैनकोजेब 75 प्रतिशत डब्ल्यूपी का ढाई ग्राम प्रति लीटर पानी में घोल बनाकर छिड़काव करना एक बेहतरीन विकल्प साबित हो सकता है।
नियमित निगरानी से होती है फसल की सुरक्षा
अपनी बात को समाप्त करते हुए कृषि एक्सपर्ट कुलदीप कुमार ने यह स्पष्ट किया कि किसी भी फसल को बीमारियों से सुरक्षित रखने के लिए यह बेहद आवश्यक है कि किसान नियमित रूप से अपने खेतों की निगरानी करते रहें। इसके अलावा, खेत में हमेशा जल निकासी की सही व्यवस्था बनाए रखनी चाहिए और रोग के शुरुआती लक्षणों को समय रहते पहचानकर तुरंत उपचार करना चाहिए, ताकि किसानों को किसी बड़े आर्थिक नुकसान का सामना न करना पड़े।



















