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देहरादून में बेटों की बेरुखी की शिकार 70 वर्षीय मीना देवी भरण-पोषण के लिए डेढ़ साल से काट रहीं डीएम दफ्तर के चक्करउत्तराखंड
15 अक्तू॰ 2026, 8:31 pm (3 घंटे पहले)· 1

देहरादून में बेटों की बेरुखी की शिकार 70 वर्षीय मीना देवी भरण-पोषण के लिए डेढ़ साल से काट रहीं डीएम दफ्तर के चक्कर

देहरादून के राजपुर की रहने वाली 70 वर्षीय मीना देवी पति की मृत्यु के 10 साल बाद भरण-पोषण और इलाज के खर्च के लिए जिला प्रशासन से गुहार लगा रही हैं।

उत्तराखंड की राजधानी देहरादून के राजपुर इलाके से एक बेहद भावुक और चिंताजनक मामला सामने आया है, जहां 70 साल की एक बुजुर्ग मां अपने ही बेटों की बेरुखी और उपेक्षा के चलते प्रशासनिक चौखट पर न्याय की आस लगाए खड़ी हैं। पति की मृत्यु के एक दशक बीत जाने के बाद बेसहारा हुईं मीना देवी पिछले डेढ़ वर्ष से नियमित तौर पर देहरादून जिलाधिकारी के कार्यालय में आयोजित होने वाली जनसुनवाई में पहुंच रही हैं। उम्र के इस नाजुक पड़ाव पर जब उन्हें अपनों के सहारे और सेवा की सख्त जरूरत थी, तब उन्हें अपने दैनिक भरण-पोषण और जीवन यापन के अधिकार के लिए सरकारी दफ्तरों की सीढ़ियां नापने को मजबूर होना पड़ रहा है।

घरेलू कलह, मारपीट और आर्थिक तंगी का दंश

पीड़िता ने अपनी व्यथा साझा करते हुए आरोप लगाया है कि जिन बेटों को उन्होंने लाड़-प्यार से पाला-पोसा, वही आज उन्हें बुनियादी सुविधाएं देने से कतरा रहे हैं। उनके अनुसार, बेटे और बहुएं आए दिन उनसे विवाद करते हैं और यह झगड़ा कई बार मारपीट तथा मानसिक प्रताड़ना तक पहुंच जाता है। मीना देवी के सामने संकट सिर्फ सिर छिपाने या दो वक्त के भोजन का ही नहीं है, बल्कि वह गंभीर आर्थिक तंगी से घिरी हुई हैं। वर्तमान में उनके पास न तो आजीविका का कोई नियमित साधन बचा है और न ही कोई सुरक्षित ठिकाना, जिसके चलते वह पूरी तरह असहाय महसूस कर रही हैं।

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स्वास्थ्य समस्याओं का बोझ और पुराने रोजगार का छूटना

मीना देवी ने बताया कि करीब दस वर्ष पूर्व उनके पति का निधन हो गया था, जिसके बाद उन्होंने खुद मेहनत-मजदूरी करके घर चलाने की कोशिश की। पहले वह नवजात शिशुओं और प्रसूताओं की मालिश करके कुछ आमदनी जुटा लेती थीं, लेकिन अब बढ़ती उम्र, कमर दर्द और पैरों की गंभीर तकलीफ की वजह से वह यह शारीरिक मेहनत करने में पूरी तरह असमर्थ हो चुकी हैं। इसके अलावा, उनके छोटे बेटे की एक दुर्घटना में चोटिल होने के कारण वह कोई काम नहीं कर पाता, जिससे उसकी दवाओं और देखरेख का खर्च जुटाना भी एक गंभीर चुनौती बना हुआ है।

इलाज के अभाव में ऑपरेशन टला, नाममात्र की मदद

चिकित्सकों ने मीना देवी के पैरों की बीमारी को देखते हुए उन्हें ऑपरेशन कराने की सलाह दी है, परंतु उनके पास इसके लिए आवश्यक धनराशि उपलब्ध नहीं है। उन्होंने व्यथित होकर बताया कि बेटे यदि कभी पैसे देते भी हैं, तो वह तीन महीने में मात्र 1500 रुपये के करीब होता है। इतनी कम राशि में वह अपने लिए भोजन जुटाएं अथवा अपनी नियमित दवाओं का प्रबंध करें, यह उनके सामने एक बड़ा यक्ष प्रश्न है। इसी लाचारी के चलते उन्हें अपने ही संतानों के खिलाफ जिलाधिकारी के समक्ष शिकायत दर्ज करानी पड़ी है।

प्रशासन की ओर से सख्त कदम उठाने की चेतावनी

जनसुनवाई में लगातार अपनी आपबीती सुनाने के बाद भी बुजुर्ग महिला को अब तक केवल आश्वासन ही हाथ लगे हैं। हालांकि, जिला प्रशासन ने स्पष्ट किया है कि मीना देवी के बेटों को पहले भी पत्र भेजकर माता के लिए हर महीने भरण-पोषण का खर्च देने के निर्देश जारी किए गए थे। अधिकारियों के अनुसार, यदि बेटे अपनी बुजुर्ग माता के नियमित भरण-पोषण और देखभाल का दायित्व नहीं निभाते हैं, तो उनके खिलाफ कानून के तहत बेहद सख्त प्रशासनिक कदम उठाए जाएंगे।

सवाल-जवाब

मीना देवी कहां की निवासी हैं और वह किस कार्यालय के चक्कर काट रही हैं?
मीना देवी देहरादून के राजपुर क्षेत्र की रहने वाली हैं और वह पिछले डेढ़ साल से देहरादून जिलाधिकारी कार्यालय के चक्कर काट रही हैं।
मीना देवी के पति का निधन कब हुआ था?
मीना देवी के पति का निधन लगभग 10 साल पहले हुआ था।
बुजुर्ग महिला ने अपने बेटों पर क्या मुख्य आरोप लगाए हैं?
उन्होंने आरोप लगाया है कि उनके बेटे-बहू उन्हें भरण-पोषण नहीं देते, गाली-गलौज और मारपीट करते हैं तथा उन्हें बेसहारा छोड़ दिया है।
महिला को डॉक्टरों ने किस चीज की सलाह दी है और वह ऐसा क्यों नहीं करा पा रही हैं?
पैरों की गंभीर समस्या के कारण डॉक्टरों ने उन्हें ऑपरेशन की सलाह दी है, लेकिन धन के अभाव में वह ऑपरेशन नहीं करवा पा रही हैं।
बेटे अपनी मां को आर्थिक सहायता के रूप में कितनी राशि देते हैं?
मीना देवी के अनुसार, उनके बेटे यदि देते भी हैं तो तीन महीने में केवल 1500 रुपये देते हैं।
जिला प्रशासन ने इस पूरे मामले में क्या रुख अपनाया है?
जिला प्रशासन ने कहा है कि बेटों को पहले भी पत्र भेजा गया था और यदि वे माता का भरण-पोषण नहीं करेंगे तो उनके खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी।
संपादकीय नीति सुधार नीति

टिप्पणियाँ 5

Tanvi Desai@tanvi-desai·1 घंटे पहले

ऐसी खबरें देखकर दिल बैठ जाता है। जिस उम्र में मां को आराम और अपनों का साथ मिलना चाहिए, वह न्याय के लिए भटक रही हैं। फिल्मी कहानियों में तो मां का त्याग सब दिखाते हैं, पर असल जिंदगी में यह कड़वा सच झकझोर देता है।

Arjun Mehta@arjun-mehta·1 घंटे पहले

अदालत और डीएम दफ्तर के चक्कर काटने की इस उम्र में भी मीना देवी को न्याय नहीं मिला, यह देख कर बहुत बुरा लगा। जिन बच्चों को मां ने पाला, वे ही आज एक रुपया भी देने से कतरा रहे हैं। आखिर ऐसे कानूनों का क्या फायदा जो बुजुर्गों को उनका हक तुरंत नहीं दिला पाते?

Ravikash Gupta@ravikash·1 घंटे पहले

अर्जुन जी, बात सही है आपकी। पर सोचिए, जब कॉर्पोरेट घरानों की तरह परिवारों में भी 'एसेट' और 'लायबिलिटी' का हिसाब होने लगे, तो रिश्तों का शेयर मार्केट तो क्रैश होना ही है।

Karan Malhotra@karan-malhotra·1 घंटे पहले

माता-पिता भरण-पोषण कानून साफ होने के बाद भी ऐसी बुजुर्ग मां को डेढ़ साल से दफ्तरों के चक्कर कटवाने पड़ रहे हैं, यह सिस्टम की नाकामी है। औलाद का ऐसा रवैया देखकर दुख होता है।

Rohan Verma@rohan-verma·1 घंटे पहले

करण भाई, बिल्कुल सही कहा आपने। कानून होते हुए भी बुजुर्गों को भटकना पड़े, तो ये हम सबकी नाकामी है।

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