मधुबनी जिले में एक-दो नहीं, बल्कि कई दर्जन गांव ऐसे हैं जहां बंदरों का उत्पात चरम पर है। हालत यह है कि अपने अनाज को बचाने के लिए यहां के लोगों को मिट्टी की गोली और गुलेटी का इस्तेमाल करना पड़ता है। छत या आंगन में जैसे ही कुछ सुखाने के लिए रखा जाता है, बंदर उसे खाने और बर्बाद करने पहुंच जाते हैं। ऐसे में ग्रामीण इसी हथियार के सहारे अपने अनाज की रखवाली करते हैं। आइए इस देसी जुगाड़ के बारे में विस्तार से जानते हैं।
गुलेटी से कोसों दूर भाग जाते हैं बंदर
मधुबनी जिले में बंदरों के आतंक से जूझ रहे गांवों की संख्या एक-दो नहीं, बल्कि कई दर्जन है। पंडौल प्रखंड के शाहपुर, सरहद, नवहटथ, जटेश्वर और लोहट के अलावा फुलपरास, झंझारपुर और बेनीपट्टी के कई इलाकों में लोग बंदरों के उपद्रव से परेशान हैं। कुल मिलाकर देखें तो नहर वाले इलाके में बंदरों की संख्या काफी ज्यादा है। बाग-बगीचों में डेरा जमाने के साथ-साथ ये बंदर खाने की तलाश में लोगों की छत और आंगन तक पहुंच जाते हैं, और वहां सुखाने या यूं ही रखे अनाज को नुकसान पहुंचाए बिना इन्हें चैन नहीं मिलता। आधा खाना और आधा बिखेर देना इस जीव का स्वभाव है। ऐसे में ग्रामीण चाहते हैं कि बंदरों को चोट भी न पहुंचे और उनका अनाज, भोजन तथा फल भी सुरक्षित रहें। इसी समस्या से निपटने के लिए ग्रामीणों ने एक कमाल का तरीका खोज निकाला है, और वह है लकड़ी की गुलेटी और मिट्टी की गोली।
दरअसल यहां जैसे ही ग्रामीण छत पर गेहूं, दलहन या घरेलू सामान सुखाने के लिए रखते हैं, बंदर उसे खाने और नुकसान पहुंचाने के लिए तुरंत आ धमकते हैं। ऐसे में ग्रामीण गुलेटी से निशाना साधकर उन्हें मारते हैं। यह गोली मिट्टी की बनी होती है, जिसके लगते ही बंदर दुम दबाकर भाग खड़ा होता है। लोग यहां मिट्टी की गोलियां बनाकर रखते हैं और लकड़ी की गुलेटी लगभग हर घर में मौजूद रहती है, ताकि जैसे ही बंदर दिखे, दूर से ही उस पर निशाना साधा जा सके और वह देखते ही भाग जाए। इससे बंदरों को ज्यादा चोट नहीं पहुंचती, लेकिन डर के मारे वे भाग जरूर जाते हैं। कई बार ऐसा भी देखने को मिलता है कि अगर किचन खुला रह जाए तो बंदर रोटियां और फल तक उठाकर ले भागते हैं।
जानें गांव की ओर क्यों आते हैं बंदर
परेशान ग्रामीणों ने बंदरों से निपटने के लिए गुलेटी का यह जुगाड़ निकाला है। इस वीडियो में मदनमोहन झा दिखाई दे रहे हैं, जो निशाना साधकर गोली दाग रहे हैं। वह बताते हैं कि यह हर दिन का काम बन गया है और बंदरों से बचने के लिए कई लोगों को ऐसा करना पड़ता है, क्योंकि अब इन्हें कुछ कहा भी नहीं जा सकता। उनके मुताबिक बंदरों का यह आतंक मधुबनी में 2012 के बाद से कहीं ज्यादा देखने को मिल रहा है। जगह-जगह पुल और नहर का जो निर्माण कार्य हुआ और जंगल घटते गए, उसके बाद से बंदर ग्रामीण इलाकों की ओर अधिक रुख करने लगे हैं।













