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छाछ और गुड़ का देसी फॉर्मूला बढ़ाएगा खेतों की ताकत, कम लागत में मिट्टी बनेगी उपजाऊभारत
3 अग॰ 2026, 12:15 am (2 घंटे पहले)· 1

छाछ और गुड़ का देसी फॉर्मूला बढ़ाएगा खेतों की ताकत, कम लागत में मिट्टी बनेगी उपजाऊ

भीलवाड़ा में किसान मिट्टी की गुणवत्ता बढ़ाने और फसलों को पोषण देने के लिए मट्ठा और गुड़ से तैयार जैविक घोल का सहारा ले रहे हैं। बेहद कम खर्च में बनने वाला यह देसी मिश्रण सूक्ष्म जीवों को सक्रिय कर जमीन को उपजाऊ बनाता है।

कृषि क्षेत्र में आधुनिक तकनीकों के प्रसार के बावजूद पारंपरिक और जैविक उपाय किसानों के बीच बेहद लोकप्रिय हैं। भीलवाड़ा समेत कई ग्रामीण इलाकों में किसान अपनी फसलों और बगीचों की सेहत सुधारने के लिए घरेलू संसाधनों का सहारा ले रहे हैं। ऐसा ही एक प्रभावी देसी तरीका है मट्ठा (छाछ) और गुड़ का जैविक घोल, जो मिट्टी में मौजूद मित्र सूक्ष्म जीवों की संख्या बढ़ाकर उसकी उर्वरता को प्राकृतिक रूप से समृद्ध करता है।

जैविक घोल के लाभ और मिट्टी की सेहत पर असर

यह पारंपरिक घोल मिट्टी में जैविक गतिविधियों को तेज करने का काम करता है। जब मट्ठा और गुड़ का मिश्रण मिट्टी में डाला जाता है, तो इसमें मौजूद शर्करा और लैक्टिक एसिड मिट्टी के बैक्टीरिया तथा अन्य लाभदायक सूक्ष्म जीवों के लिए भोजन का काम करते हैं। ये सक्रिय सूक्ष्म जीव जमीन में पड़े जैविक पदार्थों को विघटित करते हैं, जिससे पौधे आसानी से आवश्यक पोषक तत्व सोख पाते हैं। इससे न केवल पौधों का विकास तेजी से होता है, बल्कि मिट्टी की जलधारण क्षमता और उसकी बनावट में भी सकारात्मक बदलाव आता है।

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घोल तैयार करने की आवश्यक सामग्री और अनुपात

इस तरल खाद को तैयार करने के लिए बहुत कम सामान और लागत की आवश्यकता होती है। इसे बनाने के लिए मुख्य रूप से तीन चीजों की आवश्यकता होती है

  • 5 लीटर स्वच्छ पानी
  • आधा लीटर ताजा मट्ठा या छाछ
  • 200 से 250 ग्राम गुड़

इन सामग्रियों को किसी प्लास्टिक की बाल्टी या ड्रम में अच्छी तरह मिला लें। बर्तन को ऊपर से ढक्कन या कपड़े से इस तरह ढकें कि हवा का आवागमन पूरी तरह से बंद न हो।

किण्वन प्रक्रिया और घोल बनाने की विधि

मिश्रण तैयार करने के बाद इसे 2 से 3 दिनों के लिए किसी छायादार स्थान पर रख दें। इस दौरान प्रतिदिन कम से कम 1 या 2 बार लकड़ी की छड़ से घोल को अच्छी तरह हिलाएं। छाया में रखने और नियमित हिलाने से इसमें प्राकृतिक रूप से किण्वन (फर्मेंटेशन) की प्रक्रिया शुरू हो जाती है। लगभग 48 से 72 घंटों के बाद जब मिश्रण से हल्की खट्टी महक आने लगे, तो समझ जाएं कि जैविक घोल बनकर तैयार हो चुका है। इस्तेमाल करने से पहले इसे किसी बारीक कपड़े या छलनी से अच्छी तरह छान लेना चाहिए।

छिड़काव और सिंचाई में प्रयोग का सही तरीका

तैयार किए गए गाढ़े घोल को कभी भी सीधे पौधों या मिट्टी पर प्रयोग नहीं करना चाहिए। इस्तेमाल से पहले इसमें 3 से 4 गुना साफ पानी मिलाकर इसे पतला कर लें। इस पतले घोल को पौधों की जड़ों के पास मिट्टी में डालें या सिंचाई के पानी के साथ मिलाकर दें। इसके अतिरिक्त, फसलों पर इसका छिड़काव भी किया जा सकता है। घोल का प्रयोग सुबह या शाम के समय करना सबसे लाभदायक रहता है, जब धूप की तीव्रता कम होती है। इस प्रक्रिया को हर 15 से 20 दिनों के अंतराल पर दोहराया जा सकता है।

सावधानियां और अन्य जैविक खादों का सहयोग

हालांकि यह देसी घोल मिट्टी और पौधों के लिए बहुत फायदेमंद है, लेकिन इसका अत्यधिक उपयोग नहीं करना चाहिए। यदि फसल पर कीटों या गंभीर बीमारियों का प्रकोप अधिक हो, तो केवल इस उपाय पर निर्भर रहने के बजाय कृषि विभाग के विशेषज्ञों से तुरंत सलाह लेनी चाहिए। सर्वोत्तम परिणामों के लिए इस घोल के साथ-साथ खेत में सड़ी हुई गोबर की खाद, कंपोस्ट और फसल अवशेषों का उपयोग करना चाहिए। खासकर बरसात के मौसम में, जब मिट्टी में पर्याप्त नमी मौजूद होती है, यह उपाय और भी अधिक असरदार साबित होता है।

सवाल-जवाब

मट्ठा और गुड़ का जैविक घोल बनाने के लिए क्या सामग्री चाहिए?
इसे बनाने के लिए 5 लीटर साफ पानी, आधा लीटर ताजा मट्ठा और 200 से 250 ग्राम गुड़ की आवश्यकता होती है।
घोल को कितने दिनों तक और कहां रखना चाहिए?
मिश्रण को किसी बाल्टी में हल्का ढककर 2 से 3 दिन तक छायादार जगह पर रखें और दिन में 1-2 बार लकड़ी से हिलाएं।
कैसे पता चलेगा कि यह जैविक घोल इस्तेमाल के लिए तैयार है?
2 से 3 दिनों के किण्वन के बाद जब घोल से हल्की खट्टी महक आने लगे, तब यह छिड़काव और सिंचाई के लिए तैयार माना जाता है।
घोल का इस्तेमाल पौधों में कैसे करना चाहिए?
तैयार घोल में 3 से 4 गुना साफ पानी मिलाकर इसे पतला कर लें, फिर सुबह या शाम के समय जड़ों के पास डालें या सिंचाई के साथ प्रयोग करें।
क्या फसल में गंभीर कीट लगने पर सिर्फ यही घोल काफी है?
नहीं, फसल में गंभीर बीमारी या कीट का प्रकोप होने पर केवल इस घोल पर निर्भर रहने के बजाय कृषि विभाग से परामर्श लेना चाहिए।
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