सुप्रीम कोर्ट ने देश भर में पैर पसार रहे नशीले पदार्थों के अवैध कारोबार और ड्रग्स की तस्करी पर गहरी चिंता व्यक्त की है। सोमवार को एक महत्वपूर्ण मामले की सुनवाई करते हुए शीर्ष अदालत ने स्पष्ट रूप से कहा कि ड्रग्स के दुरुपयोग और इसकी तस्करी का खतरा अब केवल किसी सीमित क्षेत्र या एक विशिष्ट राज्य तक सिमट कर नहीं रह गया है, बल्कि यह पूरे देश में एक भयावह समस्या का रूप ले चुका है। अदालत ने इस गंभीर चुनौती से निपटने के लिए केंद्र सरकार के साथ-साथ सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को नोटिस जारी करते हुए चार सप्ताह के भीतर विस्तृत जवाब प्रस्तुत करने का निर्देश दिया है।
सुप्रीम कोर्ट की तीन जजों की पीठ ने दर्ज की तीखी टिप्पणी
अदालत में यह महत्वपूर्ण सुनवाई चीफ जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना की संयुक्त पीठ के समक्ष हुई। यह याचिका नारकोटिक ड्रग्स एंड साइकोट्रॉपिक सब्सटेंसेज (एनडीपीएस) कानून के तहत जांच तंत्र और अदालती प्रक्रिया को अधिक असरदार, सख्त और पारदर्शी बनाने की मांग को लेकर दायर की गई है। सुनवाई के दौरान चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने टिप्पणी करते हुए कहा कि देश में ड्रग्स से जुड़ी घटनाएं और तस्करी के नेटवर्क लगातार अपना दायरा बढ़ा रहे हैं। उन्होंने हालात को बेहद चिंताजनक करार देते हुए कहा कि देश की पूरी कानून व्यवस्था और प्रशासनिक मशीनरी को इस चुनौती से निपटने के लिए अधिक मुस्तैदी और प्रभावी ढंग से काम करना होगा।
अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क और गोल्डन क्रेसेंट का खतरा
मामले की सुनवाई के दौरान पीठ के सदस्य जस्टिस जॉयमाल्य बागची ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर फैले ड्रग तस्करी के नेटवर्क की ओर ध्यान आकर्षित किया। उन्होंने विशेष रूप से गोल्डन क्रेसेंट क्षेत्र का उल्लेख करते हुए बताया कि भारत की सीमाएं ऐसे अंतरराष्ट्रीय मार्गों से जुड़ी हैं, जिनके माध्यम से मादक पदार्थों की भारी आमद होती है। अफगानिस्तान और म्यांमार जैसे पड़ोसी व नजदीकी क्षेत्रों से होने वाली घुसपैठ और तस्करी के रास्तों के कारण भारत के लिए यह चुनौती अत्यंत विकराल रूप धारण कर लेती है। इन अंतरराष्ट्रीय रास्तों के जरिए सीमा पार से देश के भीतर भारी मात्रा में जहरीले नशीले पदार्थ पहुंचाए जा रहे हैं, जिसे रोकने के लिए एक मजबूत और एकीकृत रणनीति की सख्त जरूरत है।
अश्विनी उपाध्याय की याचिका में की गई प्रमुख मांगें
यह जनहित याचिका भारतीय जनता पार्टी के नेता और वरिष्ठ अधिवक्ता अश्विनी कुमार उपाध्याय की तरफ से दाखिल की गई है। इसमें एनडीपीएस मामलों की जांच से लेकर अदालत में चलने वाले ट्रायल तक की पूरी प्रणाली में समयबद्ध सुधार लागू करने की अपील की गई है। याचिकाकर्ता का तर्क है कि जांच एजेंसियों और न्याय प्रणाली में ढिलाई के कारण अपराधी अक्सर कानूनी खामियों का फायदा उठाकर बच निकलते हैं।
याचिका में अदालत से कई विशिष्ट निर्देश जारी करने का अनुरोध किया गया है
- फॉरेंसिक लैब रिपोर्ट की समयसीमा: फॉरेंसिक साइंस लैबोरेटरी (एफएसएल) द्वारा सैंपल की जांच रिपोर्ट दाखिल करने के लिए एक सख्त और निश्चित समयसीमा तय की जाए, ताकि जांच में बेवजह की देरी न हो।
- जांच और सुनवाई के लिए तय समय: ड्रग्स से जुड़े मुकदमों की जांच प्रक्रिया और अदालती सुनवाई पूरी करने के लिए स्पष्ट समयसीमा निर्धारित की जानी चाहिए।
- वीडियोग्राफी अनिवार्य करना: तलाशी लेने, नशीले पदार्थों की जब्ती करने, सैंपल इकट्ठा करने और जब्त किए गए माल की सूची तैयार करने की पूरी कार्रवाई की अनिवार्य रूप से वीडियोग्राफी कराई जाए। इससे जांच प्रक्रिया में पूर्ण पारदर्शिता आएगी और बाद में अदालत में सबूतों की प्रामाणिकता को लेकर किसी प्रकार के विवाद की गुंजाइश नहीं रहेगी।
विशेष अदालतों की स्थापना और संपत्तियों की जब्ती का सुझाव
मादक पदार्थों के तस्करों पर नकेल कसने के लिए याचिका में त्वरित न्याय प्रणाली विकसित करने पर बल दिया गया है। याचिकाकर्ता ने मांग की है कि ड्रग तस्करी के बड़े मामलों का तेजी से निपटारा करने के लिए देश भर में विशेष अदालतों का गठन किया जाए। इसके साथ ही, ड्रग सिंडिकेट, उनके मुख्य आकाओं और इस अवैध धंधे को वित्तीय सहायता देने वाले फाइनेंसरों के खिलाफ अत्यधिक कठोर सजा का प्रावधान सुनिश्चित किया जाना चाहिए।
इसके अलावा, याचिका में यह भी कहा गया है कि ड्रग तस्करों, उनके सहयोगियों और फाइनेंसरों द्वारा अवैध कमाई से खड़ी की गई चल-अचल संपत्तियों को समय रहते जब्त करने के लिए एक मजबूत और प्रभावी वैधानिक व्यवस्था लागू की जानी चाहिए, जिससे इस अवैध नेटवर्क की आर्थिक रीढ़ तोड़ी जा सके।
नए साइकोट्रॉपिक पदार्थों पर निगरानी और सामाजिक दुष्प्रभाव
याचिका में बदलते समय के साथ बाजार में आ रहे नए रासायनिक व सिंथेटिक नशीले पदार्थों पर चिंता जताई गई है। याचिकाकर्ता ने मांग की है कि ऐसे नए साइकोट्रॉपिक पदार्थों की तुरंत पहचान करने और उन्हें बिना किसी विलंब के प्रतिबंधित पदार्थों की सूची में शामिल करने के लिए विशेषज्ञों की एक समर्पित समिति गठित की जाए।
अदालत के समक्ष याचिकाकर्ता ने इस लत के भयावह सामाजिक पहलुओं को भी रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि ड्रग्स का बढ़ता जाल देश के युवाओं और अनगिनत परिवारों को पूरी तरह बर्बाद कर रहा है। आए दिन समाचार पत्रों में ऐसी हृदयविदारक घटनाएं सामने आती हैं, जहां नशे की गिरफ्त में आकर लोग अपने ही परिवार के भीतर संगीन अपराधों को अंजाम दे रहे हैं।
राष्ट्रीय सुरक्षा और आतंकी फंडिंग से जुड़ा गंभीर जुड़ाव
याचिका में मादक पदार्थों के अवैध कारोबार और देश की राष्ट्रीय सुरक्षा के बीच के गहरे संबंध को प्रमुखता से रेखांकित किया गया है। याचिकाकर्ता के अनुसार, नशीले पदार्थों की तस्करी को महज एक साधारण कानून-व्यवस्था या सार्वजनिक स्वास्थ्य की समस्या मानकर नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। इस अवैध धंधे से उत्पन्न होने वाले अरबों रुपये के काले धन का इस्तेमाल देश-विरोधी गतिविधियों और आतंकवादी संगठनों की फंडिंग में किया जाता है।
सुप्रीम कोर्ट द्वारा केंद्र सरकार और सभी राज्य सरकारों को चार हफ्ते का नोटिस जारी किए जाने के बाद अब इस पूरे मामले में आगामी सुनवाई बेहद निर्णायक मानी जा रही है। अदालत के सामने अब सबसे बड़ा और प्राथमिक सवाल यह होगा कि देश भर में एनडीपीएस मामलों की जांच, ठोस सबूतों के संकलन और मुकदमों के शीघ्र निस्तारण की प्रक्रिया को किस प्रकार अधिक पारदर्शी, समयबद्ध और प्रभावकारी बनाया जाए।



















