देश की सड़कों पर पैदल चलने वाले लोगों की सुरक्षा को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने एक कड़ा रुख अपनाया है। शीर्ष अदालत ने केंद्र सरकार को स्पष्ट निर्देश दिया है कि जहां भी सड़कें मौजूद हैं, वहां पैदल यात्रियों के लिए स्पष्ट रूप से चिह्नित और अतिक्रमण से मुक्त जगह सुनिश्चित की जाए। जस्टिस पी. एस. नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे की पीठ ने यह स्पष्ट किया है कि पैदल चलने वालों को गाड़ियों की आवाजाही से अलग और सुरक्षित रास्ता मिलना चाहिए ताकि वे बिना किसी खतरे के स्वतंत्र रूप से आवागमन कर सकें।
कम लागत में सीमांकन करने का सुझाव
सोमवार को हुई सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार की ओर से पेश हुए अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल के. एम. नटराज को संबंधित अधिकारियों तक यह निर्देश पहुंचाने को कहा। पीठ ने टिप्पणी की कि पैदल यात्रियों के लिए सुरक्षित स्थान बनाने के लिए किसी बहुत बड़े निवेश या भारी निर्माण कार्य की आवश्यकता नहीं है। इसे केवल रस्सी या अन्य सरल साधनों के माध्यम से भी सीमांकित किया जा सकता है, जिससे मोटर वाहनों का मार्ग अलग रहे और उस स्थान पर कोई अतिक्रमण न हो सके।
अदालत ने कहा कि आम नागरिकों में यह विश्वास होना जरूरी है कि यह फुटपाथ उनके लिए ही सुरक्षित रखा गया है और वहां गाड़ियों का कोई खतरा नहीं है। सुप्रीम कोर्ट ने अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल को संबंधित प्रशासनिक अधिकारियों को ये निर्देश जारी करने के लिए दो सप्ताह का समय दिया है। इस मामले में अगली सुनवाई अब दो सप्ताह के बाद तय की गई है।
मौलिक अधिकार के रूप में पैदल चलने का हक
सुप्रीम कोर्ट का यह नया निर्देश 19 जून को दिए गए एक ऐतिहासिक फैसले की अगली कड़ी है। उस समय शीर्ष अदालत ने सीमांकित फुटपाथों पर चलने के अधिकार को नागरिकों का मौलिक अधिकार घोषित किया था। अदालत ने अपने फैसले में स्पष्ट किया था कि किसी भी चिह्नित रास्ते पर मोटर वाहनों की तुलना में पैदल चलने वालों के अधिकारों को प्राथमिकता दी जाएगी।
अदालत के अनुसार, यह अधिकार संविधान के अनुच्छेद 19 (1) (घ) के तहत मिलने वाले आवागमन की स्वतंत्रता और अनुच्छेद 21 के तहत दिए गए जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार का अनिवार्य हिस्सा है। इस संवैधानिक व्याख्या के साथ, देश के सर्वोच्च न्यायालय ने यह साफ कर दिया है कि नागरिकों की जीवन रक्षा और सुगम आवाजाही की अनदेखी किसी भी स्थिति में नहीं की जा सकती।


















