यूरोप के विभिन्न शहरों में विरोध प्रदर्शनों के नाम पर भड़की हिंसा, लूटपाट और आगजनी की घटनाओं के बीच राष्ट्रीय राजधानी में सुरक्षा प्रबंधों को लेकर राजनीतिक विमर्श तेज हो गया है। हाल के दो से तीन सप्ताह के दौरान केंद्र सरकार और दिल्ली पुलिस की ओर से उठाए गए कड़े कदमों ने देश को एक गंभीर अराजक स्थिति से दूर रखा है। फ्रांस और यूरोप के कई हिस्सों में प्रदर्शनकारियों द्वारा सार्वजनिक संपत्तियों को निशाना बनाने, दुकानों को लूटने और सुरक्षा बलों पर सीधे हमलों के जो दृश्य सामने आ रहे हैं, उन्हें देखकर यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या भारत में भी ऐसे ही हालात पैदा करने की तैयारी थी। जुलाई महीने में जंतर-मंतर पर हुए पहले चरण के घटनाक्रम में जो पथराव और टकराव देखा गया था, उसकी पुनरावृत्ति रोकने के लिए उठाए गए एहतियाती फैसलों का असर अब साफ दिखाई दे रहा है।
राष्ट्रीय राजधानी में सुरक्षा घेरा और उठे सवाल
जब नई दिल्ली में भारी पुलिस बल की तैनाती की गई और सुरक्षा घेरे को बेहद सख्त बनाया गया, तब राजनीतिक और सामाजिक हलकों में इस पर तीखे सवाल उठाए जा रहे थे। आलोचक पूछ रहे थे कि आम विरोध प्रदर्शनों के दौरान इतनी भारी फोर्स तैनात करने की क्या आवश्यकता थी और क्या यह कोई अंतरराष्ट्रीय सीमा है। आलोचकों का तर्क था कि जिस बल को कानून व्यवस्था बनाए रखने के लिए सड़कों पर उतारा गया, उसे सीमा पर तैनात होना चाहिए था। हालांकि, यूरोप की हालिया सड़कों पर मची अफरा-तफरी को देखने के बाद यह स्पष्ट होता जा रहा है कि इस स्तर के कड़े बंदोबस्त क्यों किए गए थे। विभिन्न हलकों में यह आशंका जताई जा रही थी कि जो टूलकिट यूरोप के बड़े शहरों को अशांत कर रही है, उसके तार देश के भीतर भी सक्रिय होने की ताक में थे।
विरोध प्रदर्शनों की आड़ में अराजकता की रूपरेखा
सार्वजनिक विमर्श में सत्ता परिवर्तन, तख्तापलट, खूनखराबा और बांग्लादेश जैसे घटनाक्रमों का बार-बार उल्लेख किया जा रहा था। जब आम जनता फ्रांस और पूरे यूरोप से आ रही तस्वीरों को देखती है, तो वह पूरी कड़ियों और घटनाओं के क्रम को जोड़कर समझने की कोशिश कर रही है। यह पहलू सामने आ रहा है कि कैसे शुरुआती दौर में शांतिपूर्ण दिखने वाले प्रदर्शन आगे चलकर पूरे देश को अनियंत्रित अराजकता की गिरफ्त में ले लेते हैं। जंतर-मंतर के पहले चरण में भी छात्रों और शिक्षा प्रणाली के मुद्दों की आड़ लेकर माहौल गरमाने की कोशिश की गई थी, जहां जवानों पर हमले और पथराव हुए थे। यदि इस बार दिल्ली पुलिस द्वारा असाधारण सतर्कता न बरती जाती और संवेदनशील इलाकों की मजबूत किलेबंदी न की जाती, तो वैसी ही परिस्थितियां यहां भी बन सकती थीं और वैश्विक मंचों पर दिल्ली की नकारात्मक छवि पेश करने की कोशिशें होतीं।
फ्रांस में पुलिस पर हमले और उपद्रव का स्वरूप
यूरोपीय सड़कों पर उपद्रवियों के अनियंत्रित व्यवहार की गंभीर तस्वीरें सामने आई हैं, जहां कानून व्यवस्था लागू करने वाले कर्मियों को सीधे तौर पर निशाना बनाया जा रहा है। प्रदर्शनकारी पुलिसकर्मियों को घेरकर उन पर हमले कर रहे हैं, सड़कों पर उन्हें खदेड़ रहे हैं और पुलिस वाहनों को नुकसान पहुंचा रहे हैं। कई स्थानों पर सुरक्षाबलों पर प्रहार करने के बाद आतिशबाजी कर जश्न मनाने और पटाखे फोड़ने के दृश्य दर्ज किए गए। भीड़ में शामिल लोग अपने चेहरों को मास्क और कपड़ों से ढके हुए हैं, हेलमेट और पत्थर फेंककर सुरक्षाकर्मियों को घायल कर रहे हैं तथा दुकानों में खुली लूटपाट और आगजनी को अंजाम दे रहे हैं। यह रणनीति किसी सामान्य मांग पर आधारित आंदोलन के बजाय सुनियोजित उपद्रव का संकेत देती है।
केंद्रीय मंत्री किरेन रिजिजू का बयान और सोरोस का संदर्भ
देश में अस्थिरता पैदा करने की साजिशों पर केंद्र सरकार के मंत्री अब सीधे तौर पर अपनी बात रख रहे हैं। केंद्रीय मंत्री किरेन रिजिजू ने इस पूरे मामले पर बयान देते हुए कहा कि बांग्लादेश में हुई हिंसक घटनाएं और फ्रांस में जो दंगे, आगजनी और लूटपाट हुई है, ठीक वैसी ही साजिश भारत के लिए भी रची गई थी। किरेन रिजिजू के मुताबिक, भारत-विरोधी गिरोहों और कुछ राजनेताओं ने मिलकर युवाओं को भड़काने और देश की सड़कों पर हिंसा फैलाने की योजना बनाई थी। उन्होंने स्पष्ट किया कि ऐसी खतरनाक योजना बनाने वाले यह भूल गए कि भारत न तो बांग्लादेश है और न ही फ्रांस। उन्होंने जोर देकर कहा कि भारत में सत्ता परिवर्तन केवल चुनावों के जरिए हो सकता है, सोरोस के जरिए नहीं।
राजनीतिक सरगर्मियां और बदलता घटनाक्रम
इस बीच देश के राजनीतिक पटल पर भी तेजी से बदलाव देखने को मिले हैं। पिछले 15 से 20 दिनों से लगातार विरोध, धरना-प्रदर्शन और मार्च निकालने में सक्रिय रहे राहुल गांधी को लेकर चर्चाओं का दौर शुरू हो गया है। भारतीय जनता पार्टी का दावा है कि लंबे समय तक सियासी माहौल गरमाने के बाद राहुल गांधी अब विदेश यात्रा पर चले गए हैं। विपक्ष के जो नेता ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग पर अड़े हुए थे और बिना इस्तीफे के पीछे न हटने का दावा कर रहे थे, वे अब पूरी तरह शांत नजर आ रहे हैं। प्रशासनिक सख्ती और चाक-चौबंद सुरक्षा इंतजामों के चलते किसी भी तरह के अप्रिय घटनाक्रम को पनपने का अवसर नहीं मिला।
सोशल मीडिया पर बयानबाजी और कूटनीतिक चर्चा
विपक्षी खेमे से जुड़े कई समूह जो सोशल मीडिया पर आक्रामक अभियान चला रहे थे और ज्ञानेश कुमार को लेकर टिप्पणियां कर रहे थे, वे अब कानूनी और प्रशासनिक शिकंजे के चलते केवल डिजिटल मंचों तक सीमित रह गए हैं। कुछ तत्व जेल में हैं और बाहर आने में असमर्थ हैं। दूसरी ओर, राजनीतिक हलकों में यह चर्चा भी जोरों पर है कि राहुल गांधी, केजरीवाल और अन्य विपक्षी नेताओं के तमाम विरोध अभियानों के बावजूद केंद्र सरकार अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी शर्तों पर आगे बढ़ रही है। यहां तक कि अमेरिका के साथ होने वाले महत्वपूर्ण समझौतों में भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा तय शर्तों पर सहमति बनने की खबरें सामने आ रही हैं, जिससे विरोध का पूरा ताना-बाना बिखरता नजर आ रहा है।



















