उत्तर प्रदेश के लखीमपुर खीरी जिले में बड़े पैमाने पर गन्ने की खेती की जाती है। मानसून का मौसम गन्ने की फसल की तेजी से बढ़वार के लिए बेहद अनुकूल माना जाता है, क्योंकि इस समय खेत की मिट्टी में पर्याप्त नमी मौजूद होती है। हालांकि, बारिश का यह समय गन्ने के लिए जितना फायदेमंद है, उतना ही संवेदनशील भी है। इस दौरान फसलों में कई तरह के कीटों और बीमारियों का हमला बढ़ जाता है। कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि अगर किसान अगस्त महीने में सही प्रबंधन और फसल की देखभाल पर ध्यान नहीं देते, तो गन्ने के कुल उत्पादन के साथ-साथ उसकी गुणवत्ता में भी भारी गिरावट आ सकती है। इस मौसम में गन्ने की बंधाई, कीट व रोग नियंत्रण, जल निकासी तथा संतुलित पोषण जैसे कार्यों पर विशेष रूप से ध्यान देने की जरूरत होती है।
गन्ने की बंधाई और लॉजिंग से बचाव
गन्ने के पौधे जब लंबाई पकड़ते हैं, तो बारिश के मौसम में चलने वाली तेज हवाओं और भारी बारिश की वजह से उनके गिरने की आशंका काफी बढ़ जाती है। कृषि विज्ञान की भाषा में गन्ने के पौधों के इस तरह गिर जाने को लॉजिंग कहा जाता है। जब गन्ने की फसल गिर जाती है, तो पौधों के तनों का प्राकृतिक विकास रुक जाता है। इसके अलावा, फसल गिरने से कटाई के समय किसानों को भारी समस्याओं का सामना करना पड़ता है। कृषि वैज्ञानिक डॉ प्रदीप कुमार बिसेन के अनुसार, अगस्त महीने में गन्ने की बंधाई कराना बेहद आवश्यक कार्य है। बंधाई के दौरान एक कतार के गन्नों को दूसरी कतार के गन्नों की पत्तियों के सहारे आपस में बांध दिया जाता है। पत्तियों की मदद से की गई यह बंधाई पौधों को मजबूती प्रदान करती है, जिससे तेज आंधी और मूसलाधार बारिश में भी फसल आसानी से खड़ी रहती है। सही समय पर बंधाई कराने से पौधों के बीच पर्याप्त धूप और हवा का संचार बना रहता है, जिससे गन्ने के तनों की मोटाई और लंबाई का विकास बेहतर ढंग से होता है।
लाल सड़न रोग और जैविक नियंत्रण
बरसात के दिनों में गन्ने की फसल को सबसे ज्यादा नुकसान लाल सड़न रोग से पहुंचता है। यह एक खतरनाक फफूंद जनित बीमारी है, जिसे कृषि क्षेत्र में गन्ने का कैंसर रोग भी कहा जाता है। यदि इस बीमारी पर समय रहते नियंत्रण न पाया जाए, तो यह पूरी फसल को तबाह कर सकती है। लाल सड़न रोग का प्रभाव दिखने पर गन्ने की पत्तियां पीली पड़ने लगती हैं और धीरे-धीरे पूरी तरह सूख जाती हैं। इस जानलेवा बीमारी के शुरुआती लक्षण नजर आते ही खेतों में ट्राइकोडर्मा आधारित जैविक फफूंदनाशी का छिड़काव या प्रयोग करना बहुत फायदेमंद साबित होता है। ट्राइकोडर्मा मिट्टी के भीतर मौजूद हानिकारक फफूंदों को प्रभावी ढंग से नियंत्रित करता है और साथ ही गन्ने के पौधों की जड़ों को मजबूत बनाता है।
खेतों से जल निकासी का सही तरीका
बरसात के मौसम में खेतों में लगातार जलभराव की स्थिति बने रहना गन्ने की जड़ों के लिए घातक साबित हो सकता है। लंबे समय तक खेत में पानी खड़ा रहने से गन्ने की जड़ें गलने और सड़ने लगती हैं, जिससे पौधे का विकास पूरी तरह से रुक जाता है। गन्ने की फसल को सड़न से बचाने के लिए खेत में जल निकासी की समुचित व्यवस्था होना बेहद आवश्यक है। जिन खेतों या निचली जगहों पर बारिश का पानी जमा होता हो, वहां किसानों को तुरंत छोटी-छोटी नालियां बनाकर अतिरिक्त पानी को खेत से बाहर निकाल देना चाहिए। संतुलित पोषण और बेहतर जल प्रबंधन से किसान मानसून के इस दौर में अपनी फसल को सुरक्षित रख सकते हैं।



















