उत्तर प्रदेश की औद्योगिक नगरी कानपुर में अपशिष्ट जल के बेहतर प्रबंधन और जल संरक्षण की दिशा में एक बड़ा कदम उठाया गया है। शहर के बिनगवां इलाके में स्थापित अत्याधुनिक टर्शियरी ट्रीटमेंट प्लांट (TTP) ने पनकी थर्मल पावर प्लांट को प्रतिदिन 40 मिलियन लीटर (MLD) उच्च श्रेणी का शोधित पानी आपूर्ति करना शुरू कर दिया है। सीवेज के इस पानी का उपयोग बिजली संयंत्र के विशाल कूलिंग टावरों को ठंडा रखने के लिए किया जा रहा है। इस व्यवस्था से पावर प्लांट की ताजे जल स्रोतों पर निर्भरता बेहद कम हो गई है, जिससे खेती-किसानी के लिए बड़ी मात्रा में स्वच्छ पानी उपलब्ध हो सकेगा।
249.92 करोड़ रुपये की लागत और 18 किलोमीटर लंबी पाइपलाइन नेटवर्क
कानपुर के बिनगवां में पहले से ही 210 MLD क्षमता वाला एक सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट (STP) संचालित किया जा रहा है, जहां सीवेज जल का प्राथमिक और द्वितीयक (सेकेंडरी) ट्रीटमेंट किया जाता है। द्वितीयक चरण में साफ हुए पानी को इसके बाद नए बने टर्शियरी ट्रीटमेंट प्लांट में भेजा जाता है। इस TTP इकाई में पानी को अत्यधिक पारदर्शी और शुद्ध बनाने के लिए रिवर्स ऑस्मोसिस (RO) और अल्ट्राफिल्ट्रेशन (UF) मेम्ब्रेन जैसी आधुनिक तकनीकों का प्रयोग किया जाता है। अल्ट्राफिल्ट्रेशन जहां पानी से बारीक कणों को हटाता है, वहीं रिवर्स ऑस्मोसिस घुलनशील लवणों को साफ करता है।
इस पूरी महत्वाकांक्षी परियोजना को धरातल पर उतारने में लगभग 249.92 करोड़ रुपये का कुल खर्च आया है। शोधित पानी को बिना किसी रुकावट के पनकी थर्मल पावर स्टेशन तक पहुंचाने के लिए 600 मिलीमीटर व्यास की 18 किलोमीटर लंबी एक विशेष पाइपलाइन बिछाई गई है। इस बुनियादी ढांचे के जरिए हर दिन 40 MLD शोधित पानी निर्बाध रूप से पावर प्लांट तक पहुंच रहा है।
पावर प्लांट के कूलिंग टावरों के लिए क्यों जरूरी है उच्च गुणवत्ता का पानी?
थर्मल पावर प्लांट में बिजली निर्माण की प्रक्रिया के दौरान भारी मात्रा में ऊष्मा पैदा होती है, जिसे नियंत्रित करने के लिए कूलिंग टावरों में लगातार पानी के छिड़काव और चक्रण की आवश्यकता होती है। यदि कूलिंग सिस्टम में साधारण या कम गुणवत्ता वाले पानी का प्रयोग किया जाए, तो मशीनों के कलपुर्जों, वाल्वों और लंबी पाइपलाइनों में मिनरल की परतें जमने (स्केलिंग) लगती हैं। इसके अतिरिक्त जंग लगने (कॉरोजन) का जोखिम भी कई गुना बढ़ जाता है।
मशीनों में जंग और स्केलिंग होने से बिजली उत्पादन की कुल कार्यक्षमता पर बुरा असर पड़ता है और संयंत्र के रखरखाव तथा मरम्मत का बजट काफी बढ़ जाता है। इसी तकनीकी आवश्यकता को देखते हुए बिनगवां के टर्शियरी ट्रीटमेंट प्लांट में RO और UF मेम्ब्रेन तकनीक द्वारा सीवेज वाटर को उस स्तर तक शुद्ध किया जाता है, जो पावर प्लांट की अति-संवेदनशील मशीनों के अनुकूल हो।
नदियों के प्रदूषण में कमी और किसानों के लिए पानी की सुरक्षा
इस परियोजना का सबसे सुखद और पर्यावरण-अनुकूल पहलू सीवेज जल का दोबारा उपयोग करना है। इस TTP संयंत्र की स्थापना से पूर्व, द्वितीयक शोधन के बाद बचा हुआ सीवेज जल सीधे नदियों, नालों या अन्य प्राकृतिक जल निकायों में बहा दिया जाता था, जिससे जल निकायों में प्रदूषण फैलता था। अब वही अपशिष्ट पानी आधुनिक तकनीक से साफ होकर बिजली बनाने के काम में आ रहा है।
इस प्रक्रिया से दोहरा फायदा हो रहा है। पहला, नदियों में गिरने वाले गंदे पानी की मात्रा में भारी कमी आई है, जिससे नदी का पारिस्थितिकी तंत्र सुधर रहा है। दूसरा, पावर प्लांट द्वारा भूजल या नहरों से लिए जाने वाले ताजे पानी की खपत में 40 MLD की बड़ी कटौती हुई है। यह बचा हुआ मीठा और सिंचाई योग्य पानी स्थानीय किसानों को खेती के लिए आसानी से मिल सकेगा, जिससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था को भी संबल मिलेगा।
टैरिफ नीति 2016 का पालन और भविष्य के लिए एक मॉडल
केंद्र सरकार की टैरिफ पॉलिसी-2016 के दिशा-निर्देशों के तहत यह अनिवार्य किया गया है कि किसी भी एसटीपी के 50 किलोमीटर के दायरे में आने वाले थर्मल पावर स्टेशनों को अपनी आवश्यकताओं के लिए केवल शोधित सीवेज जल का ही उपयोग करना चाहिए। इसी राष्ट्रीय नीति के अनुपालन में बिनगवां में 40 MLD क्षमता का TTP तैयार किया गया है।
इस अत्याधुनिक संयंत्र का निर्माण नेशनल थर्मल पावर कॉर्पोरेशन (NTPC) द्वारा किया गया है, जबकि इसके दैनिक संचालन और रखरखाव की जिम्मेदारी उत्तर प्रदेश जल निगम (नगरीय) संभाल रहा है। RO और UF मेम्ब्रेन तकनीक पर आधारित यह टर्शियरी ट्रीटमेंट प्लांट उत्तर प्रदेश का पहला ऐसा प्रोजेक्ट है। कानपुर की यह सफल पहल अब जल संरक्षण और अपशिष्ट प्रबंधन के क्षेत्र में एक नजीर बन चुकी है, जिसे राज्य के अन्य औद्योगिक शहरों में भी लागू करने की योजनाएं बनाई जा रही हैं।



















