दिल्ली जिमखाना क्लब पर हुई कार्रवाई के कुछ ही समय बाद राजधानी के एक और रसूखदार ठिकाने पर सरकारी शिकंजा कसा है. रेस कोर्स रोड के अति-संवेदनशील वीवीआईपी इलाके में बना ऐतिहासिक जयपुर पोलो ग्राउंड अब केंद्र सरकार के सीधे नियंत्रण में आ गया है. खास बात यह है कि यह बहुचर्चित परिसर ठीक प्रधानमंत्री आवास के सामने स्थित है.
शनिवार की सुबह-सुबह भूमि और विकास कार्यालय (L&DO) की टीम मौके पर पहुंची, मेन एंट्री गेट पर बेदखली नोटिस चिपकाया और परिसर को कब्जे में लेने की प्रक्रिया शुरू कर दी. यह कदम ठीक उसी वक्त उठाया गया जब दिल्ली की एक अदालत ने इंडियन पोलो एसोसिएशन (IPA) को बेदखली आदेश के खिलाफ अंतरिम राहत देने से इनकार कर दिया. अदालत का रुख साफ होते ही सरकार ने देर नहीं लगाई और मैदान पर अपना नियंत्रण स्थापित कर लिया.
अदालत में क्यों नहीं चली IPA की दलील
इस पूरे विवाद की जड़ इसी साल 20 मई को जारी हुआ वह आदेश है, जिसमें जयपुर पोलो ग्राउंड को खाली कराने की बात कही गई थी. इंडियन पोलो एसोसिएशन ने इसके खिलाफ अपील दाखिल कर बेदखली पर रोक लगाने की गुहार लगाई थी.
लेकिन कोर्ट की अवकाशकालीन पीठ ने एसोसिएशन को कोई राहत नहीं दी. पीठ ने टिप्पणी की कि इसी तरह की राहत के लिए IPA पहले डिस्ट्रिक्ट सेशन जज और दिल्ली हाईकोर्ट का दरवाजा भी खटखटा चुकी है, मगर किसी भी स्तर पर उसे कामयाबी नहीं मिली. अदालत ने यह भी रेखांकित किया कि केंद्र सरकार को अपना जवाब दाखिल करने का मौका दिए बिना स्थगन की अर्जी पर फैसला सुनाना ठीक नहीं होगा. न्यायिक अनुशासन और पहले के आदेशों का हवाला देते हुए पीठ ने बेदखली पर रोक लगाने से साफ मना कर दिया. इस मामले की अगली सुनवाई अब 17 जून को होगी.
लीज खत्म, फिर भी बना रहा कब्जा
अदालत से कोई राहत न मिलने के बाद शनिवार सुबह L&DO के अधिकारी सीधे जयपुर पोलो ग्राउंड पहुंचे, गेट पर नोटिस चस्पा किया और सरकारी अधिग्रहण की औपचारिक प्रक्रिया शुरू कर दी. अधिकारियों का कहना है कि इस जमीन का मालिकाना हक केंद्र सरकार के पास है और लीज की अवधि बीत जाने के बावजूद परिसर पर कब्जा जारी था.
सरकारी दस्तावेजों के मुताबिक यह जमीन मूल रूप से जयपुर राजघराने से जुड़ी रही है और आगे चलकर इसका इस्तेमाल पोलो खेलने के लिए होने लगा. इस परिसर का संचालन इंडियन पोलो एसोसिएशन के हाथ में था.
केंद्र सरकार का दावा है कि वर्ष 1951 में जो लीज दी गई थी, उसकी मियाद 20 साल की थी. इसे बाद में बढ़ाया गया, मगर 1993 में यह पूरी तरह समाप्त हो गई. सरकार के मुताबिक इसके बाद भी इंडियन पोलो एसोसिएशन परिसर पर काबिज रही और उसका उपयोग करती रही.
सरकार का तर्क: 'बड़े जनहित' का मामला
केंद्र सरकार इसे 'लार्जर पब्लिक पर्पज' यानी व्यापक सार्वजनिक हित और जनकल्याण से जुड़ा मामला बता रही है. सरकार के मुताबिक इसी आधार पर बेदखली का आदेश जारी किया गया था.
सरकार का कहना है कि राष्ट्रीय राजधानी के इतने अहम इलाके में मौजूद यह जमीन व्यापक जनहित में इस्तेमाल होनी चाहिए. हालांकि अभी तक यह साफ नहीं हो पाया है कि भविष्य में इस जमीन को किस परियोजना के लिए काम में लाया जाएगा.













