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सब्जी बेचने वाले अर्जुन महतो ने बेटे की सलाह पर शुरू की बेकरी, बदली परिवार की किस्मतझारखंड
20 सित॰ 2026, 9:48 pm (4 दिन पहले)· 0

सब्जी बेचने वाले अर्जुन महतो ने बेटे की सलाह पर शुरू की बेकरी, बदली परिवार की किस्मत

झुमरी तिलैया के अर्जुन महतो ने सीमित कमाई वाली सब्जी की दुकान छोड़कर बेटे के अनुभव के दम पर बेकरी का काम शुरू किया, जिससे अब उनका परिवार हर महीने बेहतर मुनाफा कमा रहा है।

झारखंड के झुमरी तिलैया स्थित बिशुनपुर रोड में रहने वाले अर्जुन महतो ने आजीविका के संकट से उबरने के लिए स्वरोजगार की दिशा में एक नया कदम उठाया है। पहले वह एक आश्रम परिसर में पैदा होने वाली ताजी हरी सब्जियों को खरीदकर स्थानीय बाजार में बेचा करते थे। उसी दैनिक व्यवसाय से मिलने वाले मुनाफे पर उनके पूरे घर का गुजर-बसर टिका हुआ था। हालांकि, सब्जी की घटती-बढ़ती बिक्री और सीमित आमदनी के कारण बड़े परिवार का खर्च संभालना लगातार मुश्किल होता जा रहा था। जब रोजमर्रा की आर्थिक तंगी बढ़ने लगी, तब उन्होंने अपने परिजनों के साथ बैठकर कोई नया और टिकाऊ काम तलाशने का विचार किया।

बेटे के औद्योगिक अनुभव से मिला बेकरी का विचार

इस आर्थिक मुश्किल के दौर में अर्जुन महतो के बेटे दिलीप कुमार ने परिवार के सामने एक नया रास्ता रखा। दिलीप इससे पहले धनबाद की एक स्थापित बेकरी फैक्ट्री में काम कर चुके थे। वहां काम करते हुए उन्होंने बेकरी से जुड़ी उत्पादन प्रक्रियाओं, सामग्री के अनुपात, भट्ठी के संचालन और बाजार की मांग की बारीकियों को बेहद करीब से सीखा था। जब घर में नया कारोबार खड़ा करने पर बात हुई, तो दिलीप ने अपने उसी हुनर को आधार बनाकर खुद की पारिवारिक बेकरी शुरू करने का ठोस सुझाव दिया। पिता और परिवार ने इस विचार पर भरोसा जताया और नई शुरुआत की तैयारी में जुट गए।

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बैंक ऋण से खरीदी गई आधुनिक मशीनें

नया काम शुरू करने के लिए सबसे बड़ी चुनौती जरूरी पूंजी जुटाने की थी। परिवार ने बैंक से व्यावसायिक ऋण प्राप्त किया और उससे उत्पादन के लिए आवश्यक मशीनरी की व्यवस्था की। वर्तमान में उनकी कार्यशाला में एक बड़ा फर्नेस, मिक्सर मशीन, ब्रेड कटर मशीन के साथ-साथ कई अन्य छोटे और बड़े आधुनिक उपकरण लगाए गए हैं। इन उपकरणों के सहारे उत्पादन का काम तेजी से और व्यवस्थित तरीके से होने लगा है।

ग्रामीण इलाकों तक पहुंच रहे ताजा उत्पाद

इस नई इकाई में अब नियमित रूप से कई तरह के बेकरी उत्पाद बनाए जा रहे हैं। अर्जुन महतो के अनुसार, यहां मुख्य रूप से टोस्ट, ब्रेड, पापड़ी, कुकीज, चाय कुकीज और नमकीन कुकीज तैयार की जा रही हैं। तैयार माल की आपूर्ति केवल स्थानीय नजदीकी बाजारों तक ही सीमित नहीं है, बल्कि कोडरमा जिले के विभिन्न ग्रामीण अंचलों और कस्बों में भी इन उत्पादों को बिक्री के लिए भेजा जा रहा है।

बाहरी मजदूरी बचाकर परिवार खुद संभालता है कामकाज

कारोबार को लागत प्रभावी बनाए रखने के लिए अर्जुन महतो ने किसी बाहरी मजदूर को काम पर नहीं रखा है। घर के सभी सदस्य उत्पादन, पैकिंग, गुणवत्ता निगरानी और वितरण से जुड़े विभिन्न दायित्वों को आपस में बांटकर पूरा करते हैं। इससे अतिरिक्त मजदूरी का खर्च पूरी तरह बच जाता है और परिवार के सभी लोगों का सीधा जुड़ाव व्यवसाय से बना रहता है।

सब्जी बेचने के पुराने दिनों की तुलना में अब इस परिवार की वित्तीय स्थिति में बड़ा सुधार आया है। इस समय बेकरी से रोजाना लगभग 5 से 6 हजार रुपये का कारोबार हो रहा है। कच्चा माल और संचालन के तमाम जरूरी खर्चे निकालने के बाद परिवार को हर महीने करीब 40 से 50 हजार रुपये की शुद्ध आमदनी हो रही है, जिसने उनकी आर्थिक स्थिति को पहले से कहीं अधिक मजबूत बना दिया है।

सवाल-जवाब

अर्जुन महतो पहले अपनी आजीविका के लिए क्या काम करते थे?
वह एक आश्रम परिसर में उगने वाली सब्जियों को खरीदकर बाजार में बेचने का काम करते थे।
बेकरी का कारोबार शुरू करने का सुझाव किसने दिया था?
यह सुझाव उनके बेटे दिलीप कुमार ने दिया, जिन्होंने धनबाद की एक बेकरी फैक्ट्री में काम का अनुभव लिया था।
बेकरी के लिए उपकरण और मशीनें कैसे खरीदी गईं?
आवश्यक फर्नेस, मिक्सर और ब्रेड कटर मशीनें बैंक से व्यावसायिक ऋण लेकर खरीदी गईं।
इस बेकरी में कौन-कौन से उत्पाद बनाए जा रहे हैं?
यहां ब्रेड, टोस्ट, पापड़ी, कुकीज, चाय कुकीज और नमकीन कुकीज तैयार की जा रही हैं।
इस व्यवसाय से परिवार को कितनी मासिक आमदनी हो रही है?
रोजाना 5 से 6 हजार रुपये की बिक्री के बाद तमाम खर्च काटकर परिवार को महीने में लगभग 40 से 50 हजार रुपये की शुद्ध आय हो रही है।
संपादकीय नीति सुधार नीति

टिप्पणियाँ 5

Divya Reddy@divya-reddy·4 दिन पहले

यह खबर कौशल विकास और स्वरोजगार के उस मॉडल को रेखांकित करती है जहाँ पारंपरिक स्कूली शिक्षा के बजाय व्यावहारिक औद्योगिक प्रशिक्षण (Vocational Training) आजीविका बदल सकता है। जब एक युवा ने धनबाद की फैक्ट्री में हुनर सीखा और बैंक ऋण के सहारे पारिवारिक उद्यम खड़ा किया, तो यह दर्शाता है कि औपचारिक शिक्षा के साथ यदि कौशल को जोड़ा जाए, तो ग्रामीण और अर्ध-शहरी क्षेत्रों में बेरोजगारी संकट का प्रभावी समाधान निकल सकता है। भविष्य में ऐसे सूक्ष्म उद्यमों को डिजिटल विपणन और पैकेजिंग उन्नयन की भी आवश्यकता होगी।

Ravikash Gupta@ravikash·4 दिन पहले

झुमरी तिलैया के इस छोटे से उद्यम का विकास दर्शाता है कि कैसे पारंपरिक असंगठित क्षेत्र से निकलकर सूक्ष्म विनिर्माण की ओर बढ़ना ग्रामीण और अर्ध-शहरी अर्थव्यवस्थाओं में वित्तीय स्थिरता की नई इबारत लिख सकता है। बैंक ऋण के जरिए आधुनिक मशीनों का अधिग्रहण और बाहरी श्रम लागत को शून्य कर पारिवारिक श्रम का उपयोग करना मार्जिन को सुरक्षित रखने का एक बेहतरीन कॉर्पोरेट मॉडल है। आगे चलकर यदि यह इकाई स्थानीय स्तर पर ब्रांडिंग और एफएसएसएआई अनुपालन को मजबूत करती है, तो यह कोडरमा जिले के बाहर भी अपनी आपूर्ति श्रृंखला का विस्तार कर सकती है, जिससे इस माइक्रो-स्टार्टअप का वैल्यूएशन और टर्नओवर दोनों तेजी से बढ़ेंगे।

Arjun Mehta@arjun-mehta·4 दिन पहले

झुमरी तिलैया के इस उद्यम की सफलता यह स्पष्ट करती है कि सरकारी योजनाओं और बैंक ऋण के माध्यम से मिलने वाली वित्तीय सहायता किस प्रकार सूक्ष्म और लघु उद्योगों को संबल दे सकती है। जब परिवार अपनी श्रम शक्ति को जोड़कर बिना बाहरी मजदूरी के उत्पादन संभालता है, तो शुरुआती चरण के घाटे का जोखिम न्यूनतम हो जाता है। यदि ऐसे ग्रामीण और अर्ध-शहरी माइक्रो-स्टार्टअप्स को कलस्टर विकास योजनाओं और डिजिटल विपणन का लाभ मिले, तो यह मॉडल रोजगार सृजन और क्षेत्रीय आर्थिक सुदृढ़ीकरण का एक मजबूत राष्ट्रीय उदाहरण बन सकता है।

Rohan Verma@rohan-verma·4 दिन पहले

यह सफलता दर्शाती है कि ग्रामीण और अर्ध-शहरी क्षेत्रों में पारंपरिक मजदूरी से निकलकर हुनर आधारित सूक्ष्म उद्यमों की ओर रुख करने से आजीविका संकट का प्रभावी समाधान हो सकता है। बैंक ऋण और पारिवारिक श्रम के इस मॉडल को यदि कौशल विकास योजनाओं से जोड़ दिया जाए, तो स्थानीय स्तर पर आर्थिक आत्मनिर्भरता को और गति मिल सकती है।

Karan Malhotra@karan-malhotra·4 दिन पहले

रोहन वर्मा के विश्लेषण को आगे बढ़ाते हुए, यह मामला स्वरोजगार और सूक्ष्म ऋण की महत्ता को रेखांकित करता है। जब स्थानीय स्तर पर वित्तीय समावेशन और कौशल का सही मिलान होता है, तो पारंपरिक व्यवसायों की अनिश्चितता कम होती है। हालांकि, ग्रामीण और अर्ध-शहरी क्षेत्रों में ऐसे उद्यमों के लिए बाजार प्रतिस्पर्धा और गुणवत्ता मानकों को बनाए रखना भविष्य की मुख्य चुनौतियाँ होंगी।

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