झारखंड के पलामू जैसे शुष्क और कम वर्षा वाले क्षेत्रों में पारंपरिक फसलों पर निर्भर रहने वाले काश्तकारों के सामने मौसम की अनिश्चितता एक बड़ी चुनौती बनी रहती है। सूखे और अनियमित मॉनसून की मार झेलने वाले इस इलाके में अब फल उत्पादन की आधुनिक पद्धति एक नया आर्थिक संबल बनकर उभर रही है। जिन जोतों में बलुई दोमट अथवा दोमट मिट्टी उपलब्ध है, वहां स्ट्रॉबेरी की खेती मुनाफे का एक सशक्त विकल्प साबित हो रही है। परंपरागत अनाजों की तुलना में खुले बाजार में बेहतर भाव और लगातार मांग मिलने के कारण किसान अपनी जमीन से अतिरिक्त आय जुटाने की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं।
पौष्टिकता से भरपूर फल और बाजार में लगातार बनी मांग
क्षेत्रीय अनुसंधान केंद्र चियांकी के कृषि वैज्ञानिक प्रमोद कुमार के अनुसार स्ट्रॉबेरी का स्वाद खट्टा-मीठा होने के साथ-साथ यह सेहत के लिए भी बेहद गुणकारी फल है। इस फल में प्रचुर मात्रा में विटामिन सी, आवश्यक खनिज तत्व और कई अन्य विटामिन पाए जाते हैं। इसके अतिरिक्त स्ट्रॉबेरी में एंटीऑक्सीडेंट यौगिक मौजूद होते हैं, जिसके कारण उपभोक्ता बाजार में इसकी ग्राहकी पूरे साल बनी रहती है। लोग इसे केवल ताजे फल के रूप में ही पसंद नहीं करते, बल्कि फल प्रसंस्करण उद्योग में जूस, शेक, जैम और अन्य कन्फेक्शनरी खाद्य उत्पादों को तैयार करने में भी इसका बड़े पैमाने पर उपयोग किया जाता है।
रोपाई का सही वक्त और खेत की उचित तैयारी
पलामू के स्थानीय मौसमी मिजाज को देखते हुए स्ट्रॉबेरी की खेती का सबसे मुफीद वक्त सितंबर से अक्टूबर के बीच माना गया है। काश्तकार अमूमन 15 सितंबर से 15 अक्टूबर की अवधि के दौरान अपने खेतों में पौधों की रोपाई की तैयारी पूरी कर सकते हैं। शीत ऋतु का आगमन इस पौधे की वानस्पतिक बढ़वार और फल लगने की प्रक्रिया को गति देता है। यह फसल लगभग पांच महीने के चक्र में पूरी होती है, जिसके चलते सही समय पर भूमि का चयन, जुताई और क्यारियां बनाना आवश्यक होता है।
टिशू कल्चर तकनीक और जल निकासी का उचित प्रबंधन
स्ट्रॉबेरी के सफल उत्पादन का पूरा दारोमदार स्वस्थ और गुणवत्तायुक्त पौध सामग्री पर टिका होता है। कृषि वैज्ञानिक प्रमोद कुमार के अनुसार किसानों को टिशू कल्चर लैबोरेटरी या किसी प्रमाणित और विश्वसनीय संस्थान से तैयार पौधे ही लगाने चाहिए। खेत में समतल जमीन पर सीधे रोपाई करने के बजाय उठी हुई मेड़ों यानी रिज बेड का निर्माण किया जाता है। खेत की योजना बनाते समय यह ध्यान रखना अत्यंत आवश्यक है कि जल निकासी की चाक-चौबंद व्यवस्था हो। अगर मेड़ों के बीच पानी जमा रह जाता है, तो जड़ों में गलन पैदा होने से पूरे पौधे सूखकर नष्ट हो सकते हैं।
लागत का ढांचा और एक एकड़ से लाखों की शुद्ध कमाई
स्ट्रॉबेरी की वाणिज्यिक खेती में शुरुआती निवेश कई मदों में बंटता है। इसमें मुख्य खर्च उन्नत पौधों की खरीद, उठी हुई क्यारियों के निर्माण, नमी और खरपतवार नियंत्रण के लिए मल्चिंग, सूक्ष्म सिंचाई व्यवस्था, खाद-उर्वरक और निरंतर रखरखाव पर आता है। कुल लागत बाजार की परिस्थितियों, फसल के उत्पादन स्तर और प्रबंधन की दक्षता पर निर्भर करती है। यदि किसान वैज्ञानिक पद्धति से फसल की देखभाल करें और उपज को समय पर अच्छा बाजार भाव मिल जाए, तो प्रति एकड़ तीन से चार लाख रुपये तक का शुद्ध मुनाफा हासिल किया जा सकता है। मौजूदा समय में फल की सीधी आपूर्ति के लिए कई अच्छे विपणन मंच भी उपलब्ध हो रहे हैं।
फसल बोने से पूर्व विपणन रणनीति बनाना अनिवार्य
स्ट्रॉबेरी बेहद नाजुक और जल्दी खराब होने वाला फल है, जिसे अधिक दिनों तक सामान्य तापमान पर सुरक्षित नहीं रखा जा सकता। इसी वजह से खेती का काम शुरू करने से पहले ही किसानों को अपनी बिक्री व्यवस्था और खरीदारों का नेटवर्क तय कर लेना चाहिए। स्थानीय मंडियों के साथ-साथ आसपास के बड़े महानगरों के फल बाजारों, बड़े होटलों, रेस्टोरेंट्स और फूड प्रोसेसिंग इकाइयों से पहले ही संपर्क साधा जा सकता है, जिससे तुड़ाई के तुरंत बाद ताजा माल उचित दामों पर खपाया जा सके।





















