झारखंड की राजधानी रांची में पारंपरिक खानपान के शौकीनों के बीच एक छोटा सा फूड आउटलेट इन दिनों चर्चा का केंद्र बना हुआ है। इस दुकान को शुरू हुए अभी महज पांच महीने ही बीते हैं, लेकिन यहां मिलने वाले धूसका का आकर्षण इस कदर बढ़ चुका है कि लोग तेज बारिश में भी छाता ताने कतार में खड़े होकर अपनी बारी का इंतजार करते नजर आते हैं। सुबह की शुरुआत से लेकर शाम ढलने तक इस जगह पर ग्राहकों की लगातार भीड़ बनी रहती है। दुकान के संचालक दिलीप ने यह साबित कर दिया है कि अगर सही रणनीति अपनाई जाए, तो समोसा या कटलेट जैसे किसी भी पारंपरिक और सामान्य व्यंजन को एक प्रतिष्ठित ब्रांड का रूप दिया जा सकता है। थोड़े ही समय में मिली इस कामयाबी के पीछे काम करने वाले पांच महत्वपूर्ण सिद्धांतों को समझकर कोई भी उद्यमी अपने छोटे उद्यम को नई पहचान दिला सकता है।
इंटरनेट और वीडियो के जरिए सीधे ग्राहकों तक पहुंच
दिलीप के अनुसार अपने कारोबार को गति देने के लिए उन्होंने सबसे पहले डिजिटल प्लेटफॉर्म का व्यापक इस्तेमाल किया। वर्तमान समय में लगभग हर व्यक्ति के हाथ में स्मार्टफोन मौजूद है, जिससे कोई भी विक्रेता आसानी से अपने उत्पादों का वीडियो तैयार कर सकता है। उन्होंने अपने आउटलेट पर बनने वाले व्यंजनों और वहां की गतिविधियों के हर रोज दो से तीन वीडियो साझा करने का नियम बनाया। इस निरंतर प्रयास से स्थानीय लोगों को यह स्पष्ट रूप से समझ आने लगा कि आउटलेट पर किस तरह का भोजन तैयार किया जा रहा है। इस रणनीति की बदौलत बिना किसी अतिरिक्त विज्ञापन खर्च के उत्पादों की प्रभावी और मुफ्त मार्केटिंग संभव हो सकी।
स्वाद और खाद्य तेल की शुद्धता पर पूरा जोर
प्रचार के माध्यम से ग्राहकों को आकर्षित करने के बाद सबसे बड़ी चुनौती उन्हें संतुष्ट करने की होती है। दिलीप का मानना है कि यदि लोग वीडियो देखकर दुकान पर आएं और उन्हें भोजन का स्तर सामान्य लगे, तो कारोबार कभी आगे नहीं बढ़ सकता। इसी वजह से उन्होंने स्वाद और सामग्री की गुणवत्ता के साथ किसी भी स्तर पर समझौता न करने की नीति अपनाई। उनके आउटलेट पर इस्तेमाल होने वाला खाद्य तेल पूरी तरह शुद्ध रहता है, जिसे कोई भी ग्राहक स्वयं आकर देख और जांच सकता है। भोजन पकाने के लिए वह एक खास ब्रांड के शुद्ध सरसों तेल का उपयोग करते हैं, जिससे पकवान का मूल स्वाद और पौष्टिकता बरकरार रहती है।
दुकान की स्वच्छता और साफ-सुथरा माहौल
सड़क किनारे खानपान के व्यवसाय में स्वच्छता सबसे संवेदनशील पहलू होता है। आज के उपभोक्ता स्वास्थ्य और परिवेश को लेकर पहले से कहीं अधिक जागरूक हो चुके हैं। दिलीप बताते हैं कि लोग बेहतर और स्वच्छ भोजन के लिए पांच सौ रुपये तक अतिरिक्त खर्च करने को तैयार रहते हैं, परंतु वे किसी भी सूरत में अस्वच्छ जगह पर तैयार खाना पसंद नहीं करते। इसलिए चाहे आउटलेट कितना भी छोटा क्यों न हो, कार्यस्थल की साफ-सफाई का विशेष ध्यान रखा जाना चाहिए और पूरे परिसर को हमेशा चकाचक बनाए रखना चाहिए।
ग्राहकों के साथ आत्मीय व्यवहार और सुझावों का सम्मान
उत्पाद के साथ-साथ ग्राहकों से संवाद करने की कला भी कारोबार की सफलता तय करती है। दुकान पर आने वाले हर खरीदार को पूरे आदर और स्नेह के साथ भोजन परोसना जरूरी होता है। इसके साथ ही ग्राहकों से यह पूछना चाहिए कि खाने में कोई कमी तो नहीं रह गई, ताकि मिले फीडबैक के आधार पर जरूरी सुधार किए जा सकें। यदि कभी कोई ग्राहक असंतुष्ट होकर रूखा व्यवहार भी करे, तो भी विक्रेता को धैर्य और शालीनता के साथ स्थिति संभालनी चाहिए। यह व्यवहारिक हुनर हर उस व्यक्ति को सीखना पड़ता है जो सेवा क्षेत्र में टिकना चाहता है।
अपनी विशेषज्ञता पहचानें और नकल से बचें
अक्सर नए व्यापारी बाजार के तात्कालिक रुझान को देखकर ऐसा काम शुरू कर देते हैं जिसमें उनकी कोई दक्षता नहीं होती। दिलीप इस बात पर जोर देते हैं कि यदि बाकी लोग पिज्जा बेच रहे हैं, तो केवल उनकी देखा-देखी पिज्जा बेचना शुरू नहीं करना चाहिए। इसके बजाय जिस व्यंजन या कला में आपकी सबसे ज्यादा पकड़ है, उसी पर अपनी पूरी ताकत और सौ प्रतिशत ध्यान केंद्रित करना चाहिए। अपनी इसी विशेषज्ञता और पांच सिद्धांतों के दम पर आज दिलीप के आउटलेट को अन्य शहरों में फ्रेंचाइजी शुरू करने के लिए फोन कॉल्स आ रहे हैं। इतना ही नहीं, यहां तैयार किए गए धूसका को लोग विशेष रूप से विमान के जरिए कोलकाता तक ले जा रहे हैं।



















