दुनिया में भूख से जूझ रहे लोगों की तादाद लगातार तीसरे बरस घटी है, और इसमें सबसे बड़ा हाथ भारत का माना गया है। संयुक्त राष्ट्र की ताजा रिपोर्ट में साफ कहा गया है कि एशिया में भूख के आंकड़े सुधारने में भारत की भूमिका अहम रही है और यहां भूख की दर अब 10 प्रतिशत के आंकड़े से नीचे आ चुकी है। इसे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार की एक बड़ी कामयाबी के तौर पर देखा जा रहा है।
भारत की योजनाओं ने कैसे बदली तस्वीर
यूएन की रिपोर्ट में इस सुधार की वजह भी गिनाई गई है। रिपोर्ट के मुताबिक प्रधानमंत्री मोदी की कल्याणकारी योजनाओं, गरीबों तक अनाज पहुंचाने की व्यवस्था और खेती की पैदावार में हुई बढ़ोतरी ने इस बदलाव में बड़ी भूमिका निभाई है। यही कारण है कि भारत में भूख से जुड़े आंकड़े लगातार सुधरते चले गए। यह रिपोर्ट ऐसे समय आई है जब भारत बीते कई सालों से खाद्य सुरक्षा को मजबूत बनाने, किसानों की कमाई बढ़ाने और जरूरतमंदों तक राशन पहुंचाने पर लगातार जोर दे रहा है। संयुक्त राष्ट्र ने भी स्वीकार किया है कि इन कोशिशों का नतीजा अब पूरी दुनिया के आंकड़ों में झलकने लगा है।
अफ्रीका के कई देशों में भी राहत, डोमिनिकन गणराज्य सूची से बाहर
रिपोर्ट के मुताबिक सिर्फ भारत ही नहीं, अफ्रीका के कई मुल्कों में भी हालात पहले से बेहतर हुए हैं। इथियोपिया, तंजानिया, जिम्बाब्वे, सेनेगल और जाम्बिया जैसे देशों में भूख की स्थिति में सुधार दर्ज किया गया है। वहीं डोमिनिकन गणराज्य को अब उन देशों की फेहरिस्त से बाहर कर दिया गया है, जिन्हें दुनिया में गंभीर भुखमरी वाले देशों में गिना जाता रहा है। यानी अच्छी खबर सिर्फ एशिया तक सीमित नहीं है, बल्कि दुनिया के कई और हिस्सों से भी राहत की खबरें आई हैं।
गाजा पर एफएओ के मुख्य अर्थशास्त्री की राय
रिपोर्ट जारी करते वक्त संयुक्त राष्ट्र की एफएओ संस्था के मुख्य अर्थशास्त्री मैक्सिमो टोरेरो ने गाजा को लेकर भी अपनी बात रखी। उनका कहना था कि गाजा में चल रहे युद्ध का दुनिया भर के भूख से जुड़े आंकड़ों पर बहुत ज्यादा असर नहीं पड़ा है। टोरेरो के मुताबिक हाल के दिनों में गाजा में खाद्य आपूर्ति बढ़ने से वहां हालात कुछ हद तक सुधरे भी हैं। लेकिन युद्ध ने वहां की खेती से जुड़ा पूरा ढांचा तबाह कर दिया है, खेत, सिंचाई के साधन और जरूरी सुविधाओं को दोबारा खड़ा करने में अब कई-कई साल लग सकते हैं। उन्होंने कहा कि सबसे जरूरी काम गाजा में खेती-किसानी को फिर से पटरी पर लाना है, ताकि लोग लंबे समय तक दूसरों की मदद पर निर्भर रहने के बजाय खुद अपने पैरों पर खड़े हो सकें।
कुपोषण, एनीमिया और मोटापे की चिंता बरकरार
यूएन ने यह भी कहा कि बच्चों में कुपोषण अब भी दुनिया के सामने एक बड़ी चुनौती बना हुआ है। इसके साथ ही चिंता जताई गई कि पिछले कुछ समय में महिलाओं में एनीमिया और वयस्कों में मोटापे की समस्या तेजी से बढ़ रही है। मतलब सिर्फ लोगों का पेट भरना ही काफी नहीं है, उन तक पौष्टिक और संतुलित भोजन पहुंचाना भी उतना ही जरूरी है। रिपोर्ट में यह बात भी सामने आई कि आज भी दुनिया में करोड़ों लोग ऐसे हैं जिन्हें आसानी से संतुलित और पौष्टिक खाना नहीं मिल पाता। इसीलिए दुनिया भर की सरकारों को ऐसी नीतियां बनानी होंगी जो लोगों तक सिर्फ अनाज नहीं, बल्कि सही पोषण भी पहुंचा सकें।
यूएन ने दी भविष्य को लेकर चेतावनी
संयुक्त राष्ट्र ने आगे को लेकर आगाह भी किया है। रिपोर्ट के मुताबिक अगर जलवायु परिवर्तन की समस्या इसी तरह बढ़ती रही या वैश्विक व्यापार में बड़ी रुकावटें आईं, तो भुखमरी घटने की यह रफ्तार धीमी पड़ सकती है। संयुक्त राष्ट्र की पांच अलग-अलग एजेंसियों ने मिलकर 'द स्टेट ऑफ फूड सिक्योरिटी एंड न्यूट्रिशन इन द वर्ल्ड' नाम की यह रिपोर्ट तैयार की है। इसके मुताबिक 2025 में दुनिया के करीब 64.5 करोड़ लोग यानी करीब 7.8 प्रतिशत आबादी भूख से प्रभावित रही। यह आंकड़ा 2024 में 8.1 प्रतिशत और 2022 में 8.6 प्रतिशत हुआ करता था, यानी भूख से जूझती आबादी का हिस्सा साल दर साल घटता चला जा रहा है।



















