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उत्तराखंड के ऋषिकेश में बंगाली परंपरा से स सजता है अनोखा दुर्गा पंडाल, बंगाल से आते हैं पंडित और मूर्तिकारउत्तराखंड
17 अक्तू॰ 2026, 2:48 pm (20 दिन पहले)· 8

उत्तराखंड के ऋषिकेश में बंगाली परंपरा से स सजता है अनोखा दुर्गा पंडाल, बंगाल से आते हैं पंडित और मूर्तिकार

ऋषिकेश के लक्ष्मण झूला स्थित तपोवन में बंगाली रीति-रिवाजों के साथ शारदीय नवरात्रि का आयोजन किया जाता है, जहां बंगाल के कारीगरों द्वारा मां दुर्गा की प्रतिमा तैयार होती है।

उत्तराखंड के धार्मिक शहर ऋषिकेश में इन दिनों शारदीय नवरात्रि की धूम है। शहर में कई स्थानों पर माता रानी के भव्य पंडाल सजाए जा रहे हैं, लेकिन लक्ष्मण झूला क्षेत्र के तपोवन में होने वाली दुर्गा पूजा की अपनी एक अनूठी और खास पहचान है। इस आयोजन की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यहां मां दुर्गा की आराधना पूरी तरह से पारंपरिक बंगाली रीति-रिवाजों और तौर-तरीकों के अनुसार संपन्न की जाती है। उत्सव की तैयारियां काफी समय पहले से ही जोर-शोर से शुरू हो जाती हैं। पंडाल की भव्य सजावट से लेकर मां दुर्गा की पवित्र प्रतिमा की स्थापना तक, हर एक कार्य में बेहद बारीकी और विशिष्टता का ध्यान रखा जाता है। इस आयोजन को पूरी तरह से प्रामाणिक और पारंपरिक बनाए रखने के लिए विशेष रूप से पश्चिम बंगाल से ही पंडितों और मूर्तिकारों को ऋषिकेश बुलाया जाता है। माता की मूर्ति के निर्माण से लेकर पूजा-पाठ के सभी विधानों में बंगाल की संस्कृति और परंपराओं की स्पष्ट झलक देखने को मिलती है।

38 वर्षों से चली आ रही है यह खास परंपरा

श्री दुर्गा पूजा समिति के सचिव शंकर कुमार राय के अनुसार, लक्ष्मण झूला के तपोवन में स्थित इस प्रसिद्ध पंडाल में इस वर्ष शारदीय नवरात्रि का 38वां वार्षिकोत्सव बड़े उत्साह के साथ मनाया जा रहा है। इस भव्य आयोजन की शुरुआत वर्ष 1989 में की गई थी, जो तब से लेकर आज तक अनवरत चली आ रही है। शंकर राय बताते हैं कि इस पंडाल की सबसे मुख्य विशेषता यह है कि यहां की संपूर्ण पूजा और धार्मिक अनुष्ठान पूरी तरह से पश्चिम बंगाल की प्राचीन पद्धति पर आधारित होते हैं। इस आयोजन की प्रामाणिकता को बनाए रखने के लिए मूर्तिकार, पुरोहित और आयोजक सभी पश्चिम बंगाल से ही ताल्लुक रखते हैं। मां दुर्गा की प्रतिमा को पूरी तरह से पारंपरिक और शास्त्रीय रूप में गढ़ा जाता है, जिसमें मां के साथ-साथ असुर महिषासुर और अन्य देवी-देवताओं की सुंदर आकृतियां भी उकेरी जाती हैं। इन जीवंत और कलात्मक प्रतिमाओं को तैयार करने का कार्य बंगाल से आए विशेष मूर्तिकारों द्वारा ही किया जाता है।

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संस्कृति का संगम और विशेष अनुष्ठान

इस अनूठे आयोजन की एक और बड़ी खूबी यह है कि इसमें उत्तराखंड के गढ़वाल क्षेत्र के स्थानीय निवासी और बंगाली समुदाय के लोग कंधे से कंधा मिलाकर पूरी श्रद्धा के साथ हिस्सा लेते हैं। इस पंडाल में षष्ठी तिथि से लेकर दशमी तिथि तक यानी लगभग पांच से छह दिनों तक लगातार विशेष धार्मिक कार्यक्रमों और सांस्कृतिक अनुष्ठानों का सिलसिला चलता रहता है। इन सभी आयोजनों में अष्टमी और नवमी के पावन दिनों में होने वाली विशेष पूजा-अर्चना का बहुत अधिक धार्मिक महत्व माना जाता है। अष्टमी तिथि के समापन और नवमी तिथि के आरंभ होने के ठीक बीच के महत्वपूर्ण 40 मिनटों के अंतराल में अत्यंत पवित्र ‘संधि पूजा’ का आयोजन किया जाता है। यह विशेष पूजा उस पौराणिक समय की याद दिलाती है जब माता दुर्गा ने महिषासुर का वध किया था। इसके पश्चात, दशमी तिथि के दिन पारंपरिक ‘सिंदूर खेला’ अनुष्ठान के साथ माता को अश्रुपूर्ण विदाई दी जाती है। मां दुर्गा को उनके मायके से विदा करने के बाद पवित्र गंगा नदी में उनकी प्रतिमा का विसर्जन किया जाता है।

सवाल-जवाब

ऋषिकेश में यह दुर्गा पूजा पंडाल कहाँ स्थित है?
यह पंडाल ऋषिकेश के लक्ष्मण झूला क्षेत्र के तपोवन में स्थित है।
इस दुर्गा पूजा आयोजन की शुरुआत कब हुई थी?
इस आयोजन की शुरुआत वर्ष 1989 में हुई थी और इस वर्ष इसका 38वां वार्षिकोत्सव मनाया जा रहा है।
पंडाल में मुख्य रूप से कौन सी परंपराएं फॉलो की जाती हैं?
यहाँ की पूजा और अनुष्ठान पूरी तरह से पश्चिम बंगाल की पद्धति और रीति-रिवाजों पर आधारित होते हैं।
संधि पूजा का आयोजन कब किया जाता है?
संधि पूजा अष्टमी तिथि की समाप्ति और नवमी तिथि के आरंभ के बीच के 40 मिनटों के दौरान की जाती है।
दशमी के दिन माता की विदाई किस प्रकार होती है?
दशमी के दिन सिंदूर खेला के बाद माता की प्रतिमा को मायके से विदा कर गंगा जी में विसर्जित किया जाता है।
संपादकीय नीति सुधार नीति

टिप्पणियाँ 5

Meera Joshi@meera-joshi·19 दिन पहले

ऋषिकेश में बंगाल की संस्कृति का ऐसा मेल वाकई दिल खुश कर देता है। पहाड़ों की वादियों में जब ढाक की आवाज़ गूँजती होगी और सिंदूर खेला होता होगा, तो पूरा माहौल कितना जीवंत हो जाता होगा।

Ravikash Gupta@ravikash·19 दिन पहले

ऋषिकेश के तपोवन में जब पिछली बार बंगाली परंपरा से दुर्गा पूजा देखी थी, तो लगा ही नहीं कि बंगाल से बाहर हैं। वहां गंगा किनारे गूंजते ढाक की थाप और सिंदूर खेला की रौनक आज भी याद है, उत्तराखंड में ऐसा मेल देखकर सचमुच दिल खुश हो जाता है।

Arjun Mehta@arjun-mehta·19 दिन पहले

रवि जी, सही कहा आपने! उत्तराखंड में इस तरह से सांस्कृतिक मेल-जोल देखना वाकई अद्भुत है और यह हमारी विविधता की ताकत को दिखाता है।

Rohan Verma@rohan-verma·19 दिन पहले

ऋषिकेश में 1989 से बंगाल जैसी दुर्गा पूजा चल रही है, जानकर अच्छा लगा।

Karan Malhotra@karan-malhotra·19 दिन पहले

रोहन भाई, सच कह रहे हो। मैं खुद पिछली बार तपोवन गया था, वहां के पंडाल और बंगाली पूजा की भव्यता वाकई याद आ जाती है।

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