पूरे भारत में जब कार्तिक अमावस्या के दिन दीपों की कतारें सजती हैं, आतिशबाजी होती है और लोग खुशियों के साथ दिवाली का स्वागत करते हैं, तब हिमाचल प्रदेश के हमीरपुर जिले का सम्मू गांव एक अलग ही सन्नाटे में डूबा रहता है। जहां एक तरफ देश भर के घरों में हफ्तों पहले से साफ सफाई और मिठाइयों की तैयारियां पूरी कर ली जाती हैं, वहीं सम्मू गांव के लोग इस सबसे पूरी तरह बेखबर रहते हैं। यहां न तो कोई दीया जलाया जाता है और न ही किसी आंगन में रोशनी की लड़ियां लगाई जाती हैं। भोरंज क्षेत्र के अंतर्गत आने वाले इस गांव के बाशिंदे कई दशकों से दिवाली के उत्सव से पूरी तरह दूरी बनाए हुए हैं। इस अजीबोगरीब खामोशी के पीछे किसी खुशी की कमी नहीं, बल्कि वर्षों पुराना एक ऐसा खौफनाक इतिहास है जिसने पूरे गांव की जीवनशैली को एक कड़े नियम में बांध दिया है।
शहीद सैनिक की पत्नी का वह ऐतिहासिक श्राप
सम्मू गांव में सदियों से चली आ रही इस परंपरा की जड़ें राजशाही के दौर से जुड़ी हुई हैं। स्थानीय निवासी सोनी कुमार के अनुसार, उस जमाने में जब राजाओं की बड़ी सेनाएं हुआ करती थीं, तब इस गांव का एक व्यक्ति भी सेना में सिपाही के तौर पर तैनात था। दिवाली के पावन दिन पर उस सैनिक की पत्नी अपने छोटे बेटे को साथ लेकर अपने मायके जा रही थी। रास्ते में उसे कुछ अन्य सैनिक आते हुए दिखाई दिए, जो सेना की वर्दी और कुछ सामान ढो रहे थे। उन सैनिकों ने महिला को रास्ते में रोककर पूछा कि फौजी का घर किस तरफ पड़ता है क्योंकि वह युद्ध में वीरगति को प्राप्त हो चुका था और वे उसका अंतिम सामान पहुंचाने आए थे। महिला ने तुरंत पहचान लिया कि वे चीजें उसके अपने पति की हैं। उसने भारी मन से सैनिकों से कहा कि यह सारा सामान यहीं रख दें क्योंकि वह उस वीर सैनिक की ही पत्नी है। इसके बाद उस वीरांगना ने अपने पति की निशानी और अपने मासूम बेटे को गोद में लेकर उसी स्थान पर सती होने का अत्यंत कठोर फैसला ले लिया। अपने प्राण त्यागने से ठीक पहले उसने अत्यंत पीड़ा में आकर पूरे सम्मू गांव को यह श्राप दिया कि आने वाली सात पीढ़ियों तक यहां का कोई भी बाशिंदा कभी दिवाली का उत्सव नहीं मनाएगा। उसी दिन के बाद से आज तक गांव में कभी दिवाली के दीये नहीं जले।
दिवाली मनाने पर अनहोनी और हादसों का खौफ
गांव की रहने वाली उर्मिला ने इस परंपरा के पीछे के खौफ की हकीकत बयां करते हुए बताया कि ग्रामीण केवल पुरानी बातों के आधार पर ही त्योहार से दूर नहीं रहते, बल्कि इस श्राप के असर को उन्होंने अपनी आंखों से महसूस किया है। पुराने समय में कुछ लोगों ने इस बंदिश को तोड़ने का साहस दिखाया और अपने घरों में दिवाली मनाने की कोशिश की थी। लेकिन जैसे ही उन्होंने उत्सव शुरू किया, अचानक उनकी गौशाला में भीषण आग भड़क उठी। वह आग इतनी भयानक थी कि देखते ही देखते पल भर में पूरी गौशाला और मवेशियों की जगह जलकर पूरी तरह राख के ढेर में तब्दील हो गई। इसके अलावा जब भी किसी परिवार ने इस पाबंदी को नजरअंदाज करके उत्सव मनाना चाहा, तो उनके घर में कोई न कोई गंभीर बीमारी का शिकार हो गया। बार-बार होने वाले इन हादसों और अप्रिय घटनाओं ने ग्रामीणों के मन में गहरा डर बैठा दिया, जिसके चलते अब कोई भी इस परंपरा के खिलाफ जाने की हिम्मत नहीं जुटा पाता है।
दिवाली के बाद सती प्रतिमा की विशेष पूजा
सम्मू गांव के लोग दिवाली भले ही न मनाते हों, लेकिन सती हुई उस महिला और उसके परिवार के प्रति उनके मन में असीम सम्मान है। जगदीश चन्द रंगड़ा ने जानकारी दी कि गांव के हर परिवार के पास सती महिला और उसके परिवार की एक पवित्र प्रतिमा मौजूद है। दिवाली का दिन बीत जाने के बाद सभी ग्रामीण अपने-अपने घरों में इस प्रतिमा की पूरे विधि-विधान और आदर के साथ पूजा-अर्चना करते हैं। इस पूजा से जुड़ा एक बेहद सख्त और अचूक नियम भी है। यदि पूजा के दौरान अचानक कोई मेहमान या बाहरी व्यक्ति घर में प्रवेश कर जाए, तो वह अनुष्ठान अधूरा और असफल मान लिया जाता है। ऐसी स्थिति में परिवार को फिर से पूरी तैयारी करके शुरुआत से नए सिरे से पूजा संपन्न करनी पड़ती है। यह परंपरा आज भी गांव के हर घर में पूरी निष्ठा के साथ निभाई जाती है।
आधुनिक दौर में युवा पीढ़ी की सोच
वर्तमान समय में नई पीढ़ी के युवाओं के विचार भी इस प्राचीन रीति से गहराई से जुड़े हुए हैं। गांव के युवा दिव्यांश ठाकुर का कहना है कि आज के आधुनिक दौर में भी सम्मू गांव के सभी नौजवान अपने बुजुर्गों द्वारा बनाई गई इस व्यवस्था का पूरी तरह सम्मान करते हैं और इसका पालन करते हैं। हालांकि, जब पूरा देश जगमगाता है, तो युवा मन में दिवाली का पर्व न मना पाने का थोड़ा मलाल और कसक जरूर रहती है। इसके बावजूद दिव्यांश स्पष्ट करते हैं कि इसे केवल अंधविश्वास या कोरी कल्पना मानना गलत होगा। उनके अनुसार, यह एक ऐतिहासिक और सच्ची घटना है जो उनके बुजुर्गों की स्मृतियों और गांव के इतिहास में दर्ज है। यही वजह है कि सम्मान और सुरक्षा दोनों को ध्यान में रखते हुए ग्रामीण आज भी इस प्राचीन मर्यादा को नहीं लांघते हैं।





















