करीब पांच दशक पहले दिल्ली को दहला देने वाला रंगा-बिल्ला कांड एक बार फिर लोगों की जुबान पर है। इसकी वजह है अमेजन प्राइम वीडियो पर आई नई वेब सीरीज 'राख', जो 1978 की उस वारदात को पर्दे पर जिंदा करती है, जब महज 16 साल की गीता चोपड़ा और 14 साल के संजय चोपड़ा एक कार्यक्रम के लिए घर से निकले और कभी लौटकर नहीं आए। दो दिन बाद जब उनके शव मिले तो पूरा देश सहम गया था। यह घटना सिर्फ एक अपराध नहीं थी, इसने बच्चों की सुरक्षा को लेकर देशभर में एक गंभीर बहस को जन्म दिया था।
'राख' में क्या है और कौन निभा रहा है किरदार
आठ एपिसोड वाली यह सीरीज अमेजन प्राइम वीडियो पर 12 जून 2026 को रिलीज हुई। इसमें अली फजल, सोनाली बेंद्रे, आमिर बशीर, आकाश माखिजा और राकेश बेदी मुख्य भूमिकाओं में नजर आते हैं। कहानी 1970 के दशक की दिल्ली की पृष्ठभूमि पर बुनी गई है, जहां दो बच्चों के अचानक गायब हो जाने के बाद शहर डर के साये में आ जाता है। सीरीज उसी भय, मातम और इंसाफ की लंबी लड़ाई को दिखाती है जिसने एक दौर में पूरे देश को झकझोर दिया था।
26 अगस्त 1978, वह शाम जब सब बदल गया
दरअसल यह मामला उस घटना से जुड़ा है जिसने देश की कानून व्यवस्था पर सवाल खड़े कर दिए थे। 26 अगस्त 1978 को एक नौसेना अधिकारी के दोनों बच्चे, गीता और संजय, ऑल इंडिया रेडियो के 'युवा वाणी' कार्यक्रम में हिस्सा लेने के लिए घर से रवाना हुए थे। वे धौला कुआं से रेडियो स्टेशन की ओर निकले, मगर वहां तक पहुंच ही नहीं पाए। उस शाम तेज बारिश हो रही थी और दोनों भाई-बहन ने एक कार में लिफ्ट ले ली। यही उनकी सबसे बड़ी भूल साबित हुई, क्योंकि वह कार 'रंगा' यानी कुलजीत सिंह और 'बिल्ला' यानी जसबीर सिंह नाम के दो कुख्यात अपराधियों की थी।
बच्चों ने नहीं मानी हार
रंगा और बिल्ला ने दोनों बच्चों को अगवा कर लिया, लेकिन गीता और संजय ने आसानी से हार नहीं मानी। संजय खुद एक मुक्केबाज था और उसने आखिरी सांस तक अपराधियों का मुकाबला किया। बताया जाता है कि गीता ने ड्राइविंग सीट पर बैठे अपराधी के बाल तक खींच लिए और सड़क पर मौजूद राहगीरों से मदद की गुहार लगाई। कई लोगों ने इसकी खबर पुलिस को भी दी, मगर ज्यूरिस्डिक्शन यानी अधिकार क्षेत्र को लेकर चली खींचतान और ढुलमुल रवैये के चलते पुलिस वक्त रहते कुछ नहीं कर पाई।
फिरौती की योजना से कत्ल तक
शुरुआत में दोनों अपराधियों का इरादा फिरौती वसूलने का था। लेकिन जैसे ही उन्हें पता चला कि बच्चे किसी नौसेना अधिकारी की संतान हैं, उन्होंने हत्या की साजिश रच ली। रंगा और बिल्ला दोनों बच्चों को बुद्धा गार्डेन की तरफ रिज इलाके में ले गए। एक सुनसान जगह पर कार रोककर उन्होंने पहले संजय चोपड़ा की हत्या की और फिर गीता के साथ बलात्कार किया। दो दिन बाद, 28 अगस्त को दोनों बच्चों के क्षत-विक्षत शव दिल्ली के एक जंगली इलाके से बरामद हुए। संजय के शरीर पर चाकू के 25 से ज्यादा घाव मिले। इस दरिंदगी ने पूरी दिल्ली को डर और गुस्से से भर दिया।
कैसे फंसे रंगा और बिल्ला
वारदात को अंजाम देने के बाद दोनों अपराधी दिल्ली से भागे और पहले मुंबई पहुंचे, फिर वहां से आगरा। आगरा से दिल्ली लौटते वक्त वे कालका मेल में गलती से सैनिकों के डिब्बे में जा चढ़े। वहां मौजूद सैनिकों ने दोनों को पहचान लिया और दबोचकर पुलिस के हवाले कर दिया। अदालत ने दोनों को दोषी करार दिया और साल 1982 में उन्हें फांसी पर लटका दिया गया। उस दौर के सबसे चर्चित अपराध मामलों में इसकी गिनती होती है।
बहादुरी जो हमेशा के लिए अमर हो गई
गीता और संजय की कहानी सिर्फ एक जुर्म की दास्तान बनकर नहीं रह गई। उनकी हिम्मत और संघर्ष को देश ने हमेशा याद रखा। उनकी स्मृति में भारतीय बाल कल्याण परिषद ने गीता चोपड़ा पुरस्कार और संजय चोपड़ा पुरस्कार की शुरुआत की, जो असाधारण साहस दिखाने वाले बच्चों को दिए जाते हैं। इतना ही नहीं, दोनों भाई-बहन को मरणोपरांत कीर्ति चक्र से भी नवाजा गया। आज भी उनके नाम साहस और जज्बे की मिसाल के तौर पर लिए जाते हैं।
सिर्फ एक थ्रिलर नहीं
'राख' को महज एक क्राइम थ्रिलर कहना ठीक नहीं होगा। यह भारत के इतिहास के एक बेहद दर्दनाक अध्याय की याद दिलाती है और साथ ही उन दो बच्चों को श्रद्धांजलि भी देती है, जिनकी कहानी लगभग पांच दशक बीत जाने के बाद भी लोगों के दिलों में जिंदा है।













