बिहार की बांकीपुर विधानसभा सीट पर होने वाले आगामी उपचुनाव से पहले विपक्षी खेमे में भारी उथल-पुथल देखने को मिल रही है, जिससे इस सीट पर राजनीतिक समीकरण पूरी तरह बदलते नजर आ रहे हैं। जन सुराज पार्टी के वरिष्ठ नेता रितेश रंजन उर्फ बिट्टू सिंह ने पार्टी के प्राथमिक सदस्यता से इस्तीफा दे दिया है। उन्होंने स्पष्ट किया है कि वे इस उपचुनाव में एनडीए (NDA) के प्रत्याशी का पुरजोर समर्थन करेंगे। बिट्टू सिंह ने जन सुराज के संस्थापक और बांकीपुर से चुनावी मैदान में उतरने जा रहे प्रशांत किशोर पर कड़ा निशाना साधा है। उनका कहना है कि प्रशांत किशोर एक बेहतरीन राजनीतिक रणनीतिकार (पॉलिटिकल स्ट्रैटेजिस्ट) तो हो सकते हैं, लेकिन उनमें एक राजनीतिक दल को व्यवस्थित ढंग से चलाने की प्रशासनिक क्षमता बिल्कुल नहीं है। इस संगठनात्मक कलह के बीच प्रशांत किशोर के नामांकन कार्यक्रम में भी अचानक बदलाव कर दिया गया है। पूर्व निर्धारित कार्यक्रम की जगह अब वे आगामी 13 जुलाई को अपना नामांकन पत्र दाखिल करेंगे। इस विषय पर पार्टी के अध्यक्ष मनोज भारती ने समर्थकों और कार्यकर्ताओं के दिशा-निर्देशन के लिए एक आधिकारिक सर्कुलर जारी किया है।
राष्ट्रीय जनता दल में उम्मीदवारी को लेकर अंदरूनी कलह और बगावत
एक तरफ जहां जन सुराज पार्टी अपने अंदरूनी संकट से जूझ रही है, वहीं दूसरी तरफ राष्ट्रीय जनता दल (RJD) के भीतर भी असंतोष की आग भड़क उठी है। राजद नेतृत्व ने इस उपचुनाव के लिए रेखा गुप्ता को अपना आधिकारिक प्रत्याशी घोषित किया है, लेकिन इस घोषणा के तुरंत बाद ही पार्टी के भीतर घमासान शुरू हो गया। पार्टी के कद्दावर सांसद सुरेंद्र यादव ने एक बयान देकर राजनीतिक गलियारों में सनसनी फैला दी कि वे रेखा गुप्ता को जानते तक नहीं हैं कि वे कौन हैं। इसके तुरंत बाद, राजद के एक और प्रभावशाली नेता भाई वीरेंद्र ने भी रेखा गुप्ता की उम्मीदवारी पर खुले तौर पर अपनी नाराजगी जता दी है। इस आंतरिक असंतोष का फायदा उठाने और राजद के पारंपरिक वोट बैंक में सेंध लगाने के लिए तेजस्वी यादव के बड़े भाई तेज प्रताप यादव की पार्टी जनशक्ति जनता दल (JJD) ने भी अपनी ताल ठोक दी है। जेजेडी (JJD) ने सामाजिक कार्यकर्ता वीणा मानवी को इस चुनावी रण में उतारकर मुकाबले को और अधिक पेचीदा बना दिया है। इस पूरे राजनीतिक घटनाक्रम और पार्टी के भीतर मचे कोहराम के बीच, राजद के मुख्य रणनीतिकार तेजस्वी यादव विदेश यात्रा पर चले गए हैं। इस फैसले से गठबंधन सहयोगी कांग्रेस भी खुद को पूरी तरह असहज और उपेक्षित महसूस कर रही है, क्योंकि राजद ने यह निर्णय एकतरफा लिया था। इन परिस्थितियों से साफ जाहिर होता है कि भाजपा को रोकने के लिए बनी विपक्षी एकजुटता बांकीपुर में पूरी तरह धराशायी हो चुकी है।
बांकीपुर का चुनावी इतिहास और भाजपा का मजबूत किला
बांकीपुर विधानसभा क्षेत्र का गठन साल 2010 में हुए परिसीमन के बाद किया गया था। इस नए निर्वाचन क्षेत्र के अस्तित्व में आने के बाद से लेकर साल 2025 तक के सभी चुनावों में यहां केवल भारतीय जनता पार्टी (BJP) का ही परचम लहराता आया है। इतिहास पर नजर डालें तो साल 2010 के चुनाव में राजद के उम्मीदवार विनोद कुमार श्रीवास्तव दूसरे स्थान पर रहे थे, जिन्हें भाजपा के हाथों करारी शिकस्त झेलनी पड़ी थी। उस वक्त जीत-हार का अंतर 60 हजार से भी अधिक वोटों का था। इसके बाद साल 2015 के चुनाव में महागठबंधन के तहत यह सीट कांग्रेस के खाते में गई और उनके उम्मीदवार कुमार आशीष दूसरे स्थान पर रहे। साल 2020 में भी इसी गठबंधन के तहत कांग्रेस ने शत्रुघ्न सिन्हा के बेटे लव सिन्हा को अपना उम्मीदवार बनाया था, लेकिन उन्हें भी पराजय का मुंह देखना पड़ा। साल 2015 और 2020 के चुनावों में जीत और हार का अंतर लगभग 39 हजार वोटों के करीब रहा था। साल 2025 के विधानसभा चुनाव में राजद ने रेखा कुमारी (रेखा गुप्ता) को अपना उम्मीदवार बनाकर दांव खेला था। इस चुनाव में भाजपा के नितिन नवीन को भारी जनसमर्थन मिला और उन्हें कुल 98,299 वोट प्राप्त हुए, जबकि दूसरे स्थान पर रहीं राजद की रेखा कुमारी को 46,363 वोट मिले। इस तरह रेखा कुमारी करीब 52,000 वोटों के भारी अंतर से चुनाव हार गईं। यह स्थिति तब थी जब मुकाबला मुख्य रूप से भाजपा और राजद-कांग्रेस गठबंधन के बीच सीधा था। लेकिन इस बार के उपचुनाव में भाजपा के नए प्रत्याशी अभिषेक कुमार सिन्हा के सामने विपक्ष के तीन मजबूत उम्मीदवार मैदान में खड़े हैं, जिससे विपक्षी वोटों का बिखराव होना तय माना जा रहा है।
प्रशांत किशोर के सामने जन सुराज के वजूद को साबित करने की चुनौती
इस उपचुनाव में सबसे बड़ा कौतूहल इस बात को लेकर है कि प्रशांत किशोर आखिरकार चुनावी मैदान में अपनी राजनीतिक जमीन कैसे तैयार करेंगे। साल 2025 के पिछले चुनाव में जन सुराज ने वंदना कुमारी को अपना उम्मीदवार बनाया था, लेकिन उन्हें पूरे विधानसभा क्षेत्र से मात्र 7,717 वोट ही हासिल हो सके थे। इसके बावजूद, प्रशांत किशोर ने खुद चुनावी मैदान में उतरकर अपनी प्रतिष्ठा दांव पर लगाने का फैसला किया है। पिछले विधानसभा चुनाव में जन सुराज ने राज्य की कुल 238 सीटों पर अपने प्रत्याशी उतारे थे, लेकिन पूरी ताकत झोंकने के बाद भी पार्टी को महज 2.44 प्रतिशत वोट शेयर से ही संतोष करना पड़ा था। पिछले सात-आठ महीनों के दौरान बिहार की राजनीति में ऐसी कोई बड़ी चमत्कारी घटना नहीं हुई है, जिसे मुद्दा बनाकर प्रशांत किशोर इस उपचुनाव में हवा को अपने पक्ष में मोड़ सकें। राजनीतिक रणनीतिकार के रूप में मशहूर प्रशांत किशोर को जरूर इस सीट पर कोई अदृश्य संभावना दिख रही होगी, लेकिन केवल 7,700 वोटों के पुराने आधार पर कोई चमत्कार करना मुमकिन नहीं है। उन्हें इस शहरी सीट पर जीत दर्ज करने के लिए एक बहुत बड़े जनाधार की आवश्यकता होगी।
वोट बैंक के समीकरण और मुस्लिम-युवा मतदाताओं का रुझान
जब से प्रशांत किशोर ने जन सुराज के बैनर तले अपनी पदयात्रा शुरू की थी, तब से उनकी नजर मुख्य रूप से ऐसे मतदाताओं पर रही है जो सत्तारूढ़ एनडीए (NDA) और विपक्षी महागठबंधन दोनों से ही असंतुष्ट हैं और एक नए राजनीतिक विकल्प की तलाश में हैं। हालांकि, चुनावी तिकड़मों के आगे उनकी यह रणनीति कितनी कारगर होगी, इस पर संदेह है। प्रशांत किशोर खुद भी इस बात से वाकिफ हैं कि सत्ताधारी दल के पास मतदाताओं को आकर्षित करने के लिए कई तरह की नीतियां और योजनाएं होती हैं। पिछले चुनाव में जब जदयू (JDU) को लेकर उनकी भविष्यवाणियां विफल साबित हुई थीं, तो उन्होंने खुद माना था कि नीतीश सरकार की महिलाओं के लिए चलाई गई 10 हजार रुपये वाली कल्याणकारी योजना ने जन सुराज की चुनावी तैयारियों को भारी नुकसान पहुंचाया था। बांकीपुर विधानसभा क्षेत्र में कुल मिलाकर करीब 4 लाख मतदाता हैं, जिनमें से अनुमानित तौर पर 30 से 40 हजार (लगभग 8 से 10 प्रतिशत) मुस्लिम मतदाता हैं। बिहार में अल्पसंख्यक समुदाय वर्तमान में खुद को राजनीतिक रूप से विकल्पहीन महसूस कर रहा है। वे भाजपा विरोधी रुख रखने वाले दलों का समर्थन करते आए हैं। सीमांचल के इलाकों में जहां उन्हें असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी एआईएमआईएम (AIMIM) पसंद आती है, वहीं बाकी बिहार में वे राजद के पारंपरिक एम-वाई (M-Y) समीकरण से जुड़े रहे हैं। इसके अलावा, नीतीश कुमार के जेडीयू (JDU) की प्रशासनिक नीतियों के प्रति भी उनका एक धड़ा आकर्षित रहता है। आमतौर पर मुस्लिम मतदाता भाजपा को हराने में सक्षम सबसे मजबूत विपक्षी उम्मीदवार के साथ खड़े होते हैं। इस लिहाज से पिछले चुनाव में दूसरे नंबर पर रहने वाली राजद की रेखा गुप्ता उनकी स्वाभाविक पसंद हो सकती हैं। इसके अलावा राजद ने सुनियोजित तरीके से प्रशांत किशोर की छवि को भाजपा के गुप्त मददगार के रूप में प्रचारित किया है। यदि राजद इस धारणा को मतदाताओं के बीच स्थापित करने में सफल रहा, तो अल्पसंख्यक मतदाता प्रशांत किशोर से पूरी तरह दूरी बना सकते हैं। दूसरी ओर, प्रशांत किशोर की जनसभाओं में युवा वर्ग की अच्छी उपस्थिति देखी जाती रही है, क्योंकि वे शिक्षा, प्रतियोगी परीक्षाओं के पेपर लीक और रोजगार जैसे मुद्दों पर मुखर रहते हैं। हालांकि, युवा वर्ग के इन मुद्दों पर विपक्ष के अन्य प्रत्याशी भी अपनी नजरें गड़ाए हुए हैं, जिससे युवाओं के वोटों में भी विभाजन की पूरी संभावना बनी हुई है।











