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2027 के महासंग्राम से पहले उत्तर प्रदेश की बिसात पर जातीय समीकरणों का पूरा विश्लेषणराजनीति
2 घंटे पहले· 2

2027 के महासंग्राम से पहले उत्तर प्रदेश की बिसात पर जातीय समीकरणों का पूरा विश्लेषण

उत्तर प्रदेश में आगामी विधानसभा चुनाव को लेकर राजनीतिक दलों ने अपनी बिसात बिछानी शुरू कर दी है, जहां पुराने जातीय समीकरणों और नए सामाजिक गठजोड़ के बीच वर्चस्व की जंग छिड़ गई है।

अर्जुन मेहताअर्जुन मेहताराजनीतिक संवाददाता 6 मिनट पढ़ें AI के लिए
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उत्तर प्रदेश की राजनीति हमेशा से ही जातीय समीकरणों, सामाजिक गठजोड़ और चुनावी गणित की प्रयोगशाला रही है। साल 2027 में होने वाले विधानसभा चुनाव अभी भले ही दूर नजर आते हों, लेकिन सभी प्रमुख राजनीतिक दलों ने अपनी जमीनी तैयारी और गोटियां सेट करना शुरू कर दिया है। भारतीय जनता पार्टी अपने उस पुराने और सफल सामाजिक तालमेल यानी सोशल इंजीनियरिंग को हर हाल में बचाए रखना चाहती है जिसने उसे पिछले कई चुनावों में भारी सफलता दिलाई है। दूसरी तरफ, समाजवादी पार्टी अपने नए नारे 'PDA' यानी पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक के जरिए अपना जनाधार बढ़ाने और विरोधी खेमे में सेंध लगाने की पुरजोर कोशिश कर रही है। बहुजन समाज पार्टी के लिए यह अस्तित्व बचाने की लड़ाई बनती दिख रही है, जहां वह अपने खिसकते वोट बैंक को फिर से सहेजने में जुटी है, जबकि कांग्रेस पार्टी राज्य में अपने खोए हुए वजूद को वापस पाने के लिए एक नया और सुरक्षित रास्ता तलाश रही है। ऐसे में सबसे बड़ा यक्ष प्रश्न यही है कि 2027 तक किस राजनीतिक दल का पारंपरिक वोट बैंक पूरी तरह सुरक्षित रहेगा, किस दल के समीकरणों में दरार आएगी और किसकी रणनीति सिर्फ चुनावी शोर बनकर रह जाएगी।

यह गहन विश्लेषण उत्तर प्रदेश की राजनीतिक यात्रा के उन पड़ावों को उजागर करता है जहां से सत्ता का रास्ता तय होता है। पिछले चार प्रमुख चुनावों के मतदान पैटर्न और सामाजिक समूहों के झुकाव को देखकर भविष्य की राजनीति का खाका खींचा जा सकता है। इन चुनावों में साल 2017 का विधानसभा चुनाव, साल 2019 का लोकसभा चुनाव, साल 2022 का विधानसभा चुनाव और हाल ही में संपन्न हुआ साल 2024 का लोकसभा चुनाव शामिल हैं। इन चारों चुनावों के आंकड़ों और रुझानों का अध्ययन करने पर यह साफ हो जाता है कि उत्तर प्रदेश की जनता ने किस तरह समय-समय पर अपने फैसले बदले हैं और इसके पीछे की सामाजिक वजहें क्या रही हैं। हालांकि, विश्लेषण में आगे बढ़ने से पहले यह स्पष्ट करना जरूरी है कि सीटों और कुल वोट शेयर के आंकड़े चुनाव आयोग के आधिकारिक नतीजों पर आधारित हैं, लेकिन विभिन्न जातियों के मतदान प्रतिशत का ब्योरा लोकनीति-सीएसडीएस जैसे चुनाव बाद के सर्वेक्षणों और राजनीतिक विश्लेषकों के अनुमानों पर टिका है। इसे अंतिम सत्य मानने के बजाय राजनीति के बदलते रुझान के रूप में देखा जाना चाहिए।

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चार चुनावों की कहानी और राजनीतिक दलों का उतार-चढ़ाव

अगर हम साल 2017 से लेकर साल 2024 तक के राजनीतिक सफरनामे को एक साथ रखकर देखें, तो उत्तर प्रदेश की सत्ता का एक बहुत ही स्पष्ट और दिलचस्प ढांचा हमारे सामने उभरकर आता है। साल 2017 के विधानसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी ने ऐतिहासिक और प्रचंड बहुमत हासिल करके राज्य की पारंपरिक राजनीति की पूरी दिशा ही बदल दी थी। इसके बाद साल 2019 के लोकसभा चुनाव में जब समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी ने धुर-विरोधी होने के बावजूद एक ऐतिहासिक गठबंधन बनाया, तब भी भाजपा ने अपनी ताकत का लोहा मनवाया और विपक्ष के इस बड़े चक्रव्यूह को ध्वस्त कर दिया। साल 2022 के विधानसभा चुनाव में भी भाजपा ने अपनी सत्ता बरकरार रखी, लेकिन इस दौरान समाजवादी पार्टी ने अपने वोट शेयर और सीटों की संख्या में उल्लेखनीय बढ़ोतरी करके खुद को मुख्य चुनौती के रूप में स्थापित कर लिया। इसके बाद साल 2024 के लोकसभा चुनाव ने पूरी बाजी को एक नया मोड़ दे दिया, जिसमें भाजपा को भारी नुकसान उठाना पड़ा और समाजवादी पार्टी सबसे बड़ी विजेता बनकर उभरी, जबकि कांग्रेस को भी इस गठबंधन से नया जीवनदान मिला।

इस पूरी राजनीतिक उथल-पुथल की कहानी सिर्फ जीती गई सीटों तक सीमित नहीं है। असली कहानी तो पर्दे के पीछे चल रही उस सामाजिक गोलबंदी की है जिसमें सवर्ण, गैर-यादव ओबीसी, दलित, मुस्लिम और सरकारी योजनाओं के लाभार्थियों का वोट बैंक लगातार इधर से उधर खिसकता रहा। इन चार चुनावों के आंकड़ों से स्पष्ट है कि भाजपा का वोट बैंक साल 2017 से 2022 तक बेहद मजबूत बना रहा और साल 2019 में अपने चरम पर पहुंच गया था, लेकिन साल 2024 के आम चुनाव में इसमें भारी गिरावट दर्ज की गई। वहीं दूसरी ओर, समाजवादी पार्टी ने साल 2017 की अपनी बेहद कमजोर स्थिति से उबरते हुए साल 2022 में वापसी की और साल 2024 में वह राज्य की सबसे बड़ी राजनीतिक ताकत बनकर सामने आई। इसके उलट, बहुजन समाज पार्टी का ग्राफ लगातार नीचे गिरता चला गया, और स्थिति यहां तक पहुंच गई कि साल 2024 के लोकसभा चुनाव में पार्टी को शून्य सीटें मिलीं और उसका वोट शेयर घटकर महज 9 प्रतिशत के आसपास सिमट कर रह गया।

साल 2017 की राजनीतिक क्रांति और सोशल इंजीनियरिंग का उदय

साल 2017 का उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव राज्य के इतिहास में एक बड़ा टर्निंग पॉइंट साबित हुआ। भाजपा ने न केवल चुनाव जीता, बल्कि उसने जातियों को जोड़ने का एक बिल्कुल नया और अनूठा मॉडल पेश किया, जिसे विश्लेषकों ने सोशल इंजीनियरिंग का नाम दिया। इस चुनाव में सवर्ण समाज तो भाजपा के साथ पूरी मजबूती से खड़ा था ही, लेकिन पार्टी ने गैर-यादव ओबीसी और गैर-जाटव दलित समुदायों के बीच भी अपनी गहरी पैठ बना ली। यह एक ऐसा चुनावी मोड़ था जहां समाजवादी पार्टी सत्ता में रहने के बावजूद पूरी तरह बिखर गई और आपसी कलह के कारण अपनी सीटें नहीं बचा सकी। वहीं बहुजन समाज पार्टी भी अपने पारंपरिक वोट बैंक को सीटों में बदलने में नाकाम रही।

इस चुनाव के बाद यह पूरी तरह साफ हो गया कि उत्तर प्रदेश में अब केवल पुराने और पारंपरिक जातीय गणित के भरोसे चुनाव नहीं जीते जा सकते। भाजपा ने हिंदुत्व की लहर, केंद्र और राज्य स्तर पर मजबूत नेतृत्व की छवि, बेजोड़ सांगठनिक क्षमता और नए सामाजिक वर्गों तक अपनी पहुंच को मिलाकर एक ऐसा अपराजेय समीकरण तैयार किया जो आने वाले कई चुनावों तक उसकी जीत की मजबूत बुनियाद बना रहा। इस नए मॉडल ने विपक्षी दलों को अपनी राजनीतिक रणनीतियों पर दोबारा सोचने के लिए मजबूर कर दिया।

जातीय समूहों का झुकाव और वोट ट्रांसफर की हकीकत

साल 2017 के चुनाव विश्लेषणों और लोकनीति-सीएसडीएस के अध्ययनों से जो सामाजिक तस्वीर सामने आई, वह बेहद हैरान करने वाली थी। इस चुनाव में सवर्ण मतदाताओं ने एकतरफा रूप से भाजपा का समर्थन किया। वहीं, गैर-यादव ओबीसी वर्ग का एक बहुत बड़ा हिस्सा भी भाजपा के पक्ष में लामबंद हो गया, जिससे सपा के पारंपरिक वोट बैंक को भारी झटका लगा। यादव मतदाताओं ने अपनी वफादारी समाजवादी पार्टी के साथ बनाए रखी और जाटव वोट बैंक का बड़ा हिस्सा बहुजन समाज पार्टी के पाले में ही रहा। लेकिन सबसे बड़ा बदलाव गैर-जाटव दलितों में देखने को मिला, जिन्होंने बड़े पैमाने पर भाजपा का रुख करना शुरू कर दिया था। मुस्लिम मतदाताओं का वोट समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी के बीच विभाजित हो गया, जिससे भाजपा विरोधी ताकतें कमजोर हुईं और इसका सीधा फायदा भाजपा को मिला।

इसके बाद साल 2019 के लोकसभा चुनाव में जब समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी ने हाथ मिलाया, तो कागज पर यह गठबंधन बेहद मजबूत और अजेय दिखाई दे रहा था। राजनीतिक पंडितों का मानना था कि यदि यादव, मुस्लिम और जाटव वोट एक साथ आ गए, तो भाजपा के लिए राज्य में पैर टिकाना मुश्किल हो जाएगा। लेकिन जब नतीजे आए, तो वे पूरी तरह विपरीत थे। भाजपा ने अकेले दम पर 62 सीटें जीतीं और एनडीए गठबंधन को 64 सीटें हासिल हुईं। इस अप्रत्याशित जीत के पीछे की बड़ी वजह यह थी कि भाजपा ने सवर्णों, गैर-यादव ओबीसी और गैर-जाटव दलितों के बीच अपने प्रभाव को अक्षुण्ण रखा। इसके साथ ही, जमीनी स्तर पर समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी के मतदाताओं के बीच वोट का पूर्ण हस्तांतरण यानी वोट ट्रांसफर नहीं हो सका, जिससे इस महागठबंधन की सीमाएं उजागर हो गईं और भाजपा का किला सुरक्षित रहा।

इसका आप पर असर

  • उत्तर प्रदेश में: इस राजनीतिक विश्लेषण से राज्य के मतदाताओं को विभिन्न दलों की बदलती रणनीतियों, सोशल इंजीनियरिंग और चुनावी समीकरणों को गहराई से समझने में मदद मिलेगी।
  • भारत में: देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश के जातीय समीकरणों और चुनावी बदलावों का सीधा असर केंद्र की राजनीति, राष्ट्रीय गठबंधनों और आगामी राष्ट्रीय नीतियों पर पड़ता है।

सवाल-जवाब

2027 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के लिए समाजवादी पार्टी की क्या रणनीति है?
समाजवादी पार्टी अपने नए नारे 'PDA' यानी पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक के जरिए अपना सामाजिक आधार बढ़ाना चाहती है और भाजपा के पारंपरिक वोट बैंक में सेंध लगाने की कोशिश कर रही है।
2017 के चुनाव में भाजपा की बड़ी जीत के पीछे कौन से मुख्य कारक थे?
2017 में भाजपा की जीत के पीछे हिंदुत्व की लहर, मजबूत केंद्रीय व राज्यीय नेतृत्व, उत्कृष्ट संगठन और गैर-यादव ओबीसी तथा गैर-जाटव दलितों को जोड़ने वाली सोशल इंजीनियरिंग मुख्य कारक थे।
2019 के लोकसभा चुनाव में सपा-बसपा गठबंधन के असफल होने का क्या कारण था?
कागज पर मजबूत दिखने के बावजूद, जमीनी स्तर पर दोनों दलों के कार्यकर्ताओं और मतदाताओं के बीच सुचारू रूप से वोट ट्रांसफर नहीं हो पाया, जिससे यह गठबंधन अपेक्षित परिणाम नहीं दे सका।
क्या इस विश्लेषण में दिए गए जातीय वोटिंग के आंकड़े आधिकारिक हैं?
नहीं, सीटों और कुल वोट शेयर के आंकड़े आधिकारिक चुनाव आयोग के नतीजों पर आधारित हैं, लेकिन जातियों के वोटिंग पैटर्न का ब्योरा लोकनीति-सीएसडीएस जैसी संस्थाओं के चुनाव बाद के सर्वे और राजनीतिक अनुमानों पर आधारित है।
2024 के लोकसभा चुनाव में बहुजन समाज पार्टी का प्रदर्शन कैसा रहा?
2024 के लोकसभा चुनाव में बहुजन समाज पार्टी का प्रदर्शन बेहद निराशाजनक रहा, जहां पार्टी को एक भी सीट नहीं मिली और उसका वोट शेयर गिरकर लगभग 9 प्रतिशत पर आ गया।
अर्जुन मेहता
लेखक के बारे मेंअर्जुन मेहताराजनीतिक संवाददाता दिल्ली
विशेषज्ञताराजनीतिक समाचार, चुनाव, सरकारी नीति, अंतरराष्ट्रीय संबंध, लोक नीति, संसद, भू-राजनीति, शासन, राजनीतिक विश्लेषण

अर्जुन मेहता एक राजनीतिक संवाददाता हैं जो सरकारी नीतियों, चुनावों, अंतरराष्ट्रीय संबंधों और ब्रेकिंग राजनीतिक ख़बरों को कवर करते हैं। वे अहम राजनीतिक घटनाक्रमों पर समय पर अपडेट और विश्लेषण देते हैं।

अर्जुन मेहता एक राजनीतिक संवाददाता हैं जो राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय राजनीति, सरकारी नीति, चुनाव, कूटनीति और विधायी घटनाक्रमों में विशेषज्ञता रखते हैं। वे ब्रेकिंग राजनीतिक ख़बरों, नीतिगत फ़ैसलों, चुनावी अभियानों और जनचर्चा व शासन को आकार देने वाली भू-राजनीतिक घटनाओं पर रिपोर्ट करते हैं। सटीकता, निष्पक्षता और गहन रिपोर्टिंग पर ज़ोर देते हुए अर्जुन जटिल राजनीतिक मुद्दों और समाज पर उनके असर का स्पष्ट विश्लेषण देते हैं। उनकी कवरेज में संसदीय मामले, राजनीतिक दल, नेतृत्व परिवर्तन, लोक नीति और वैश्विक कूटनीतिक संबंध शामिल हैं।

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