पटना की बांकीपुर विधानसभा सीट पर हो रहे उपचुनाव ने राज्य की राजनीति में खलबली मचा दी है। इस सीट पर भारतीय जनता पार्टी ने पहले अभिषेक कुमार सिन्हा उर्फ अभिषेक बंटी को अपना उम्मीदवार बनाया था। गुरुवार को उन्होंने मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी और जदयू के राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष संजय झा की मौजूदगी में जोरदार शक्ति प्रदर्शन करते हुए अपना नामांकन पत्र दाखिल किया था। लेकिन राजनीति के इस खेल में अगले 24 घंटे के भीतर ही बड़ा उलटफेर देखने को मिला। शुक्रवार, 10 जुलाई को अभिषेक बंटी ने अचानक चुनाव मैदान से हटने का निर्णय लिया और “पारिवारिक कारणों” का हवाला देकर अपना नाम वापस ले लिया। इस नाटकीय मोड़ के तुरंत बाद भाजपा की केंद्रीय इकाई ने राष्ट्रीय महासचिव अरुण सिंह के माध्यम से एक विज्ञप्ति जारी की, जिसमें नीरज कुमार सिन्हा को बांकीपुर का नया अधिकृत प्रत्याशी घोषित किया गया। इस बड़े बदलाव के पीछे सिर्फ पारिवारिक मजबूरी है या फिर दिल्ली और पटना में बुनी गई कोई गहरी राजनीतिक बिसात?
चारा घोटाला और भाजपा का डर
भले ही सार्वजनिक रूप से अभिषेक बंटी के हटने के पीछे पारिवारिक वजहें बताई जा रही हैं, लेकिन राजनीतिक चर्चाओं का केंद्र चारा घोटाला है। सूत्रों के मुताबिक, आरजेडी सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव के साथ जिन 75 लोगों को 2022 में सीबीआई कोर्ट ने चारा घोटाला में दोषी पाया था, उनमें अभिषेक बंटी के पिता रविंद्र प्रसाद का नाम शामिल है। रविंद्र प्रसाद मगध मेडिकल कॉर्पोरेशन के मैनेजर रह चुके हैं और उन्हें 139 करोड़ रुपये के घोटाले में 3 साल की सजा सुनाई गई थी। बीजेपी को इस बात का स्पष्ट भय था कि चुनाव प्रचार के दौरान विपक्षी दल इस पुराने विवाद को एक बड़ा चुनावी हथियार बना सकते हैं, और पार्टी के पास इसका कोई ठोस बचाव या जवाब तैयार नहीं था।
प्रशांत किशोर की चुनौती और जन सुराज का असर
बांकीपुर उपचुनाव केवल एक सामान्य चुनावी मुकाबला नहीं रह गया है। जन सुराज पार्टी के संस्थापक प्रशांत किशोर स्वयं इस सीट से मैदान में हैं। वे घर-घर और गली-गली जाकर मतदाताओं से सीधे संवाद कर रहे हैं और इस चुनाव को एनडीए सरकार के खिलाफ एक जनमत संग्रह के रूप में पेश कर रहे हैं। अभिषेक बंटी को पार्टी का एक साधारण और मध्यमवर्गीय कार्यकर्ता माना जाता था, जिसे लेकर विपक्ष ने यह नैरेटिव गढ़ना शुरू कर दिया था कि भाजपा इस सीट को अपनी सुरक्षित जागीर समझकर कमजोर उम्मीदवार मैदान में उतार रही है। प्रशांत किशोर के बढ़ते प्रभाव के बीच यह नैरेटिव भाजपा के लिए जोखिम भरा साबित हो रहा था, और आलाकमान ने इस खतरे को भांपते हुए त्वरित निर्णय लेना सही समझा।
बदलाव की आंतरिक वजहें और आरएसएस की रिपोर्ट
अभिषेक बंटी के खिलाफ हालांकि कोई आपराधिक मामला लंबित नहीं है और उन्होंने अपने हलफनामे में दोषसिद्धि से इनकार किया है, लेकिन उनके परिवार के चारा घोटाला कनेक्शन ने पार्टी के शीर्ष नेतृत्व को सचेत कर दिया। लगभग 4 लाख मतदाताओं वाली इस सीट पर, जहां शिक्षित और बुद्धिजीवी वर्ग का दबदबा है, भाजपा को एक ऐसे निर्विवाद चेहरे की जरूरत थी जिस पर कोई उंगली न उठा सके। इसके अतिरिक्त, स्थानीय भाजपा कैडर में भी अभिषेक बंटी के चयन को लेकर असंतोष था। बंटी को केंद्रीय मंत्री नितिन नवीन का बेहद करीबी माना जाता है और नितिन नवीन के राज्यसभा जाने के बाद खाली हुई इस सीट पर उनके प्रभाव से टिकट मिलने की चर्चाओं ने कार्यकर्ताओं में नाराजगी पैदा कर दी थी। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और पार्टी की आंतरिक रिपोर्टों में यह फीडबैक दिया गया था कि स्थानीय संगठन उस आक्रामकता के साथ काम नहीं कर पा रहा है, जो प्रशांत किशोर और आरजेडी की रेखा गुप्ता जैसी मजबूत घेराबंदी को तोड़ने के लिए जरूरी है।
दिल्ली का वीटो और भविष्य की रणनीति
इस बड़े फेरबदल की पटकथा बिहार के प्रांतीय नेताओं के बजाय दिल्ली स्थित भाजपा के शीर्ष नेतृत्व द्वारा लिखी गई है। बांकीपुर को भाजपा का एक अभेद्य किला माना जाता है, और किसी भी स्थिति में इसे हारना पार्टी की राष्ट्रीय प्रतिष्ठा के लिए एक बड़ा धक्का साबित हो सकता था। जैसे ही दिल्ली में आलाकमान को समीकरणों के बिगड़ने की सूचना मिली, केंद्रीय चुनाव समिति ने हस्तक्षेप किया। मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी की रैली के बावजूद प्रादेशिक नेतृत्व को दिल्ली के सख्त निर्देशों का पालन करना पड़ा। इसके परिणामस्वरूप, एक व्यवस्थित और सम्मानजनक प्रक्रिया के तहत अभिषेक बंटी को प्रेस कॉन्फ्रेंस कर नामांकन वापस लेने के लिए तैयार किया गया, ताकि पार्टी नई रणनीति के साथ आगे बढ़ सके।











