पिछले एक हफ्ते से निर्वाचन आयोग को लेकर चल रहे विवाद के बीच देश की जनता ने यह साफ कर दिया है कि वह इस मुद्दे पर विपक्ष के साथ नहीं है। राहुल गांधी पिछले कुछ दिनों में कई बार सड़क पर उतर चुके हैं और अन्य विपक्षी दलों ने भी पूरी ताकत झोंक दी है, लेकिन वे उस तरह का माहौल बनाने में असफल रहे जिसकी उन्हें उम्मीद थी। हालात यह बन गए कि वे जंतर-मंतर पार्ट-2 की योजना बनाकर उतरे थे, लेकिन पूरा गेम ही पलट गया। अब जंतर-मंतर पर किसी भी तरह का विरोध प्रदर्शन संभव नहीं रह गया है और इस जगह पर होने वाले आयोजनों पर रोक लग गई है। यदि किसी को प्रदर्शन करना है तो उसे रामलीला मैदान या अन्य निर्धारित जगहों पर जाना होगा, क्योंकि जंतर-मंतर पर जाने और वहां रीलबाजी करने की वजह ही समाप्त हो गई है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमित शाह ने हमेशा के लिए यह सुनिश्चित कर दिया है कि अब कोई भी जंतर-मंतर की आड़ में संसद और उसके आसपास के इलाकों में हंगामा नहीं कर पाएगा। विपक्षी दल इस बात से परेशान हैं कि जंतर-मंतर को लेकर आए इस फैसले के बाद वे लगातार पैर पटक रहे हैं। दूसरी ओर, राहुल गांधी से एक ऐसा राजनीतिक कदम उठ गया जिससे पूरा विपक्ष मुश्किल में फंस गया है। राहुल गांधी ने खुद ही सारा मामला सुप्रीम कोर्ट को सौंप दिया, जबकि पहले उनका यह कहना था कि अदालत जाना उनका काम नहीं है। वे अपनी ही रणनीति में ऐसे उलझे कि उन्हें मजबूरी में सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाना पड़ा।
राहुल गांधी की योजना राष्ट्रपति की तरह सुप्रीम कोर्ट को भी अपनी राजनीति के दायरे में घसीटने की थी। राजनीति के चलते मुख्य न्यायाधीश से मिलने का समय मांगना ऐसी बात थी जिसे पहले कभी नहीं सुना गया था। सब जानते थे कि मुख्य न्यायाधीश मिलने के लिए तैयार नहीं होंगे और खुद कांग्रेस के भीतर भी यह चर्चा थी कि अदालत को राजनीति में घसीटने की कोई आवश्यकता नहीं है। यदि कुछ करना ही है तो सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की जानी चाहिए। शुरुआत में राहुल गांधी इस बात से सहमत नहीं हुए, लेकिन अंततः उन्हें वही करना पड़ा। हालांकि बड़ा सवाल यह है कि जब मामला सुप्रीम कोर्ट में पहुंच ही चुका है, तो फिर सड़कों पर हंगामा करने का क्या औचित्य रह जाता है।
सुप्रीम कोर्ट जो भी फैसला सुनाएगा, उसे हर किसी को मानना ही होगा। ऐसे में न तो राहुल गांधी की सड़क वाली राजनीति का कोई मतलब रह जाएगा और न ही विपक्षी दलों के बवाल का कोई फायदा होगा। इसके बावजूद इन्हें यही लगता है कि सड़कों पर प्रदर्शन करके ही सरकार को दबाव में लाया जा सकता है। आज इसी अराजक राजनीति को लेकर कई खुलासे और दावे सामने आए हैं। मोदी विरोधियों के लिए पिछले दो-तीन दिन काफी चौंकाने वाले रहे हैं, क्योंकि उन्होंने जैसी उम्मीद की थी, जमीन पर स्थिति बिल्कुल उसके विपरीत नजर आई।
मोदी विरोधियों को लगातार झटके
मोदी विरोधियों के लिए पिछले कुछ दिन बेहद हैरान करने वाले रहे हैं, क्योंकि उनकी योजना जंतर-मंतर जाकर बड़ा बवाल खड़ा करने की थी ताकि पूरा देश उनके साथ आ जाए। ऐसा कुछ भी नहीं हुआ और आम जनता ने उनका साथ नहीं दिया। इसके उलट, उनके रोज-रोज के तमाशों को देखकर जनता में और अधिक नाराजगी बढ़ रही है। जनता यह भली-भांति देख रही है कि सड़कों पर उतरकर हंगामा करना उस मुद्दे पर हो रहा है जिसका एजेंडा पहले ही विफल हो चुका है और जो मामला पहले से ही सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन है। इस पर इस तरह का भारी विरोध प्रदर्शन करने का कोई तुक नहीं बनता है।
इस पूरे घटनाक्रम में विपक्षी दलों के कूदने के बाद आम लोग सवाल पूछ रहे हैं कि क्या देश के सभी स्कूल ठीक हो गए हैं और क्या पूरी शिक्षा व्यवस्था दुरुस्त हो चुकी है। इन दलों ने खुद को ही जनता के सामने बेनकाब कर दिया है कि वे केवल नरेंद्र मोदी के खिलाफ एक विशेष एजेंडा चलाने के लिए आए हैं। लोग अब यह समझ चुके हैं कि यह उन निराश और हताश लोगों का तंत्र है जो चुनाव में नरेंद्र मोदी को पराजित नहीं कर पा रहे हैं, इसलिए वे सड़कों पर अराजकता फैलाकर उन्हें हटाना चाहते हैं। पिछले दो दिनों से इन्हें लगातार तगड़े झटके मिल रहे हैं और आज तो इनकी पूरी दुकान पर ही ताला लगने जैसी स्थिति बन गई है।
गृह मंत्रालय का बड़ा कदम और जंतर-मंतर पर रोक
विपक्षी दलों के नेताओं को आज सबसे बड़ा झटका तब लगा जब वे दिल्ली पुलिस के पास प्रदर्शन की अनुमति मांगने पहुंचे। वे यह तारीख और समय तय करने गए थे कि वे कब से जंतर-मंतर पर धरना शुरू कर सकते हैं और इसके लिए वे दिल्ली पुलिस को अल्टीमेटम दे रहे थे। लेकिन गृह मंत्रालय ने जंतर-मंतर की उस राजनीति की दुकान पर हमेशा के लिए ताला लगा दिया। अब न तो विपक्षी दल और न ही राहुल गांधी जंतर-मंतर पर किसी तरह का प्रदर्शन कर पाएंगे, क्योंकि गृह मंत्रालय ने निर्धारित प्रदर्शन स्थलों की सूची से जंतर-मंतर का नाम आधिकारिक रूप से हटा दिया है।
अब से जंतर-मंतर पर धरना प्रदर्शन पूरी तरह प्रतिबंधित कर दिया गया है। इसके साथ ही दिल्ली में विरोध प्रदर्शनों के लिए केवल तीन जगहों को अधिकृत किया गया है। ये तीन स्थान रामलीला मैदान, बुराड़ी मैदान और सीबीडी ग्राउंड हैं। गृह मंत्रालय द्वारा गठित एक समिति की सिफारिशों के आधार पर जंतर-मंतर को प्रदर्शन स्थल की सूची से डिनोटिफाई कर दिया गया है ताकि सभी को उचित और तय स्थान मिल सके।
जंतर-मंतर पर प्रदर्शन क्यों प्रतिबंधित किए गए
जंतर-मंतर के आसपास संसद भवन के अलावा कई अत्यंत महत्वपूर्ण सरकारी कार्यालय और राष्ट्रीय संस्थान स्थित हैं। इसके समीप ही कई सांसदों के आधिकारिक आवास भी बने हुए हैं। यही कारण है कि इस विरोध स्थल को बेहद संवेदनशील माना जाता रहा है। जगह की भारी कमी के कारण यहाँ आने-जाने वाले आम नागरिकों को भी भारी असुविधा का सामना करना पड़ता था और प्रदर्शनकारियों को भी कठिनाई होती थी। सुप्रीम कोर्ट भी पहले यह कह चुका है कि प्रदर्शनकारियों को किसी दूसरी जगह पर स्थानांतरित करने पर गंभीरता से विचार किया जाना चाहिए, क्योंकि यहाँ उनके लिए बुनियादी सुविधाएं और पर्याप्त जगह दोनों का अभाव है।
अब विपक्षी दलों के पास विरोध प्रदर्शन करने के लिए केवल तीन ही जगहें शेष बची हैं, जिनमें रामलीला मैदान संसद के पास स्थित है, जबकि बाकी दोनों स्थल संसद से काफी दूर हैं। अब जब जंतर-मंतर प्रदर्शन के लिए वैध जगह ही नहीं बची है, तो ये दल किस मुंह से लोगों से जंतर-मंतर चलने का आह्वान करेंगे। जंतर-मंतर पार्ट-2 चलाने की उनकी पूरी योजना एक ही झटके में पूरी तरह विफल हो चुकी है। यदि उन्हें जंतर-मंतर पर बवाल मचाने की छूट दी जाती, तो वहाँ बड़े पैमाने पर नेताओं का जमावड़ा लगता और उन्हें मीडिया कवरेज तथा राजनीतिक फुटेज मिल जाती।

















