संसद के मानसून सत्र की शुरुआत के साथ ही परिसीमन (डिलिमिटेशन) विधेयक को लेकर देश की राजनीतिक सरगर्मियां अचानक तेज हो गई हैं। लोकसभा और विधानसभा क्षेत्रों के पुनर्निर्धारण से जुड़े इस बेहद अहम और संवेदनशील मुद्दे ने महाराष्ट्र की राजनीति में एक नया मोड़ ला दिया है। सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि इस प्रस्तावित कानून ने राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) के शरद पवार गुट के भीतर ही एक स्पष्ट वैचारिक विभाजन को उजागर कर दिया है। पार्टी के दो प्रमुख चेहरे—युवा नेता रोहित पवार और वरिष्ठ सांसद सुप्रिया सुले—इस बिल को लेकर पूरी तरह से अलग-अलग राय रखते हैं। एक तरफ जहां भतीजे रोहित पवार इस बिल को सत्ता पक्ष की एक गहरी और खतरनाक साजिश बता रहे हैं, वहीं दूसरी ओर सुप्रिया सुले इसे लेकर कुछ शर्तों के साथ नरम और लचीला रुख अपनाती हुई नजर आ रही हैं।
रोहित पवार की चेतावनी और 50 प्रतिशत सीटों का लालच
रोहित पवार ने सोशल मीडिया पर एक लंबा और विस्तृत पोस्ट लिखकर इस परिसीमन विधेयक का कड़ा और मुखर विरोध किया है। उन्होंने अपनी चिंताओं को साझा करते हुए स्पष्ट किया है कि मौजूदा मानसून सत्र में इस बिल को किसी भी हाल में पास कराना ही सत्ताधारी पार्टी का सबसे बड़ा और एकमात्र लक्ष्य बन गया है। रोहित ने विपक्षी दलों को चेतावनी दी है कि सरकार क्षेत्रीय दलों और राज्यों को अपने पक्ष में करने के लिए 50 प्रतिशत अधिक सीटें देने का मीठा लालच दे सकती है। उन्होंने साफ शब्दों में कहा कि अगर विपक्ष इस लुभावने आंकड़ों के मायाजाल में फंसकर बिल का समर्थन कर देता है, तो इसके भविष्य में बेहद घातक राजनीतिक परिणाम भुगतने होंगे।
असम और नगर निगम चुनावों का दिया उदाहरण
अपनी बात को और अधिक स्पष्टता और मजबूती देने के लिए रोहित पवार ने हालिया स्थानीय चुनावों का सटीक उदाहरण पेश किया। उनका तर्क है कि जिस तरह से नगर निगम चुनावों में राजनीतिक फायदा उठाने के लिए वार्डों की सीमाओं में बड़े पैमाने पर मनमाना बदलाव किया गया था, ठीक उसी तर्ज पर अब लोकसभा और विधानसभा क्षेत्रों का भी सत्ताधारी दल के हित में पुनर्गठन किया जाएगा। उन्होंने असम राज्य में हुए निर्वाचन क्षेत्रों के हालिया परिसीमन का विशेष रूप से हवाला दिया। रोहित के अनुसार, असम का उदाहरण यह साबित करता है कि यह पूरी प्रक्रिया भौगोलिक वास्तविकताओं और संवैधानिक मर्यादाओं को ताक पर रखकर केवल सत्ता पर अपनी मजबूत पकड़ बनाए रखने के उद्देश्य से की जाएगी।
भाजपा की कथित रणनीति और तानाशाही का अंदेशा
रोहित पवार ने भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) पर इस पूरे मुद्दे को लेकर एक लंबी और सोची-समझी रणनीति के तहत काम करने का बहुत ही गंभीर आरोप लगाया है। उनके दावों के मुताबिक, सत्ता के पूरे चुनावी समीकरण को हमेशा के लिए अपने पक्ष में झुकाने के लिए भाजपा साल 2016 से ही काम कर रही है। उन्होंने आरोप लगाया कि अनुभवी और पूर्व प्रशासनिक अधिकारियों की एक विशेष टीम के साथ मिलकर यह ब्लूप्रिंट तैयार किया गया है कि किस-किस चुनाव क्षेत्र को किस प्रकार से बदला जाए। उनका कहना है कि सरकार अब केवल इस बिल के संसद के दोनों सदनों से पारित होने की प्रतीक्षा कर रही है। बिल पास होने तक विपक्ष के साथ मीठी-मीठी बातें की जाएंगी, झूठा राजनीतिक सौहार्द दिखाया जाएगा, तरह-तरह के आश्वासनों का प्रलोभन दिया जाएगा और लोकतंत्र की दुहाई देकर उन्हें विश्वास में लेने का नाटक किया जाएगा।
अपनी लंबी पोस्ट में रोहित ने आगे अंदेशा जताया कि जैसे ही यह परिसीमन विधेयक कानून का रूप लेगा, विपक्ष की अहमियत पूरी तरह से खत्म कर दी जाएगी। उन्होंने कहा कि विपक्ष को ऐसे किनारे कर दिया जाएगा जैसे शरीर से मक्खी को झटक दिया जाता है, और फिर से देश में तानाशाही प्रवृत्ति हावी हो जाएगी। उन्होंने आरोप लगाया कि एक तरफ परिसीमन और दूसरी तरफ एसआईआर (SIR) के माध्यम से सीधे तौर पर भारत के संविधान पर प्रहार करने की सुनियोजित तैयारी की जा रही है। उन्होंने देश के सभी विपक्षी दलों और नेताओं से भावुक अपील की है कि वे इस बात पर पूरी गंभीरता से विचार करें कि क्या उन्हें इस साजिश को विफल करना है या फिर प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से इसका समर्थन करके इसे सफल होने देना है।
युवाओं से बदलाव का आह्वान
देश के युवाओं की भूमिका का जिक्र करते हुए रोहित पवार ने कहा कि नई पीढ़ी ने अब व्यवस्था में बड़ा परिवर्तन लाने का पक्का संकल्प कर लिया है, इसलिए सभी राजनीतिक दलों को पूरी ईमानदारी के साथ युवाओं का साथ देना चाहिए। उन्होंने 'अपना टाइम आएगा' जैसी इंतजार वाली निष्क्रिय मानसिकता को छोड़ने की सलाह दी। इसके बजाय, उन्होंने 'अपना टाइम आ गया है' के मजबूत आत्मविश्वास के साथ विपक्ष को एकजुट होकर दृढ़ता से निर्णय लेने का आह्वान किया है। उनका साफ संदेश है कि अब संघर्ष करना है या समझौता, यह कड़ा निर्णय हर किसी को स्वयं ही लेना होगा।
सुप्रिया सुले का सशर्त समर्थन
वहीं दूसरी तरफ, इस पूरे विवाद में शरद पवार गुट की ही वरिष्ठ नेता और सांसद सुप्रिया सुले का परिसीमन बिल पर रुख रोहित पवार के विचारों से काफी जुदा दिखाई दे रहा है। सुप्रिया सुले इस विधेयक का रोहित की तरह सीधे तौर पर कड़ा विरोध करने के बजाय इसे लेकर एक बीच का रास्ता अपनाती दिख रही हैं। उनका आधिकारिक बयान सामने आया है जिसमें उन्होंने कहा है कि अगर केंद्र सरकार निर्वाचन क्षेत्रों में 50 प्रतिशत सीटें बढ़ाने वाले फॉर्मूले पर लिखित में ठोस आश्वासन देती है, तो इस बिल को समर्थन देने पर विचार किया जा सकता है। एक ही पार्टी के भीतर से उठ रही इन दो विरोधाभासी आवाजों ने राजनीतिक हलकों में यह बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है कि जब यह विवादास्पद बिल संसद के पटल पर रखा जाएगा, तो शरद पवार गुट का अंतिम और आधिकारिक स्टैंड आखिर क्या होगा।




















