सुप्रीम कोर्ट से तमिलनाडु सरकार को राहत, गाय-बछड़े काटने पर लगे हाईकोर्ट के प्रतिबंध पर लगी रोकराजनीति
4 घंटे पहले· 2

सुप्रीम कोर्ट से तमिलनाडु सरकार को राहत, गाय-बछड़े काटने पर लगे हाईकोर्ट के प्रतिबंध पर लगी रोक

तमिलनाडु में गायों और बछड़ों के वध पर मद्रास हाईकोर्ट द्वारा लगाए गए पूर्ण प्रतिबंध को सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल स्थगित कर दिया है। राज्य सरकार की अपील पर शीर्ष अदालत ने यह अंतरिम राहत दी है।

तमिलनाडु में पशु वध से जुड़े एक बड़े कानूनी विवाद में सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकार को बड़ी राहत प्रदान की है। शीर्ष अदालत ने मद्रास हाईकोर्ट के उस हालिया आदेश पर अंतरिम रोक लगा दी है, जिसमें गाय और बछड़ों के काटने पर राज्यव्यापी पूर्ण प्रतिबंध लागू कर दिया गया था। इस मामले की गंभीरता को देखते हुए राज्य सरकार की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी ने सुप्रीम कोर्ट में प्रभावी तरीके से दलीलें पेश कीं, जिसके बाद कोर्ट ने हाईकोर्ट के फैसले में संशोधन की आवश्यकता जताई है।

मामले की पृष्ठभूमि और सुप्रीम कोर्ट का रुख

सोमवार, 13 जुलाई 2026 को जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की खंडपीठ ने इस मामले की सुनवाई की। पीठ ने तमिलनाडु सरकार द्वारा दायर विशेष अनुमति याचिका यानी SLP पर नोटिस जारी किया है। अदालत का यह मानना था कि हाईकोर्ट द्वारा दिया गया आदेश अपने वर्तमान स्वरूप में काफी व्यापक है और इसमें संशोधन किया जाना अनिवार्य है। इस कानूनी जंग में अभिषेक मनु सिंघवी ने सरकार का प्रतिनिधित्व करते हुए तर्क दिया कि हाईकोर्ट का आदेश तमिलनाडु एनिमल प्रिजर्वेशन एक्ट, 1958 के मौजूदा प्रावधानों के पूरी तरह विपरीत है। राज्य के इस कानून के तहत उन गायों को काटने की कानूनी अनुमति है, जो 10 वर्ष से अधिक आयु की हो चुकी हैं या अब प्रजनन तथा कृषि कार्यों के लिए उपयोगी नहीं रही हैं, बशर्ते इसके लिए संबंधित सक्षम अधिकारी से उचित अनुमति प्राप्त की गई हो।

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राज्य सरकार की कानूनी तर्कशक्ति

तमिलनाडु सरकार ने अपनी दलीलों में स्पष्ट किया कि पशु वध की प्रक्रिया पहले से ही कई केंद्रीय और राज्य कानूनों के अधीन है, जिनमें प्रिवेंशन ऑफ क्रुएल्टी टू एनिमल्स एक्ट, 1960, स्लॉटर हाउस नियम, 2001, तमिलनाडु अर्बन लोकल बॉडीज एक्ट, 1998 और तमिलनाडु अर्बन लोकल बॉडीज रूल्स, 2023 शामिल हैं। सरकार का मुख्य तर्क यह था कि इनमें से किसी भी कानून में पशु वध पर पूर्ण प्रतिबंध जैसा कोई प्रावधान मौजूद नहीं है। सरकार ने अदालत के समक्ष यह पक्ष रखा कि हाईकोर्ट ने एक न्यायिक आदेश के जरिए कानून बनाने का प्रयास किया है, जो विधायी सीमाओं और संवैधानिक प्रावधानों का अतिक्रमण करता है।

मद्रास हाईकोर्ट का आदेश और विवाद

पूरा विवाद 27 मई 2026 के उस आदेश से शुरू हुआ था, जब मद्रास हाईकोर्ट ने बकरीद के त्योहार के करीब आने से पहले गाय और बछड़ों के वध पर रोक लगा दी थी। जस्टिस जीआर स्वामीनाथन और जस्टिस वी लक्ष्मीनारायण की खंडपीठ ने यह फैसला हिंदू मक्कल काची के महासचिव के. सूर्य प्रशांत द्वारा दायर एक जनहित याचिका पर सुनाया था। हालांकि, याचिकाकर्ता ने मूल रूप से केवल यह मांग रखी थी कि बकरीद के दौरान वध कार्य केवल निर्धारित और अधिकृत स्थानों पर ही संपन्न हो, लेकिन हाईकोर्ट ने अपने फैसले में याचिका की मांग से कहीं आगे जाकर पूरे राज्य में ही पूर्ण प्रतिबंध लागू कर दिया।

अपनी याचिका में तमिलनाडु सरकार ने स्पष्ट रूप से कहा कि हाईकोर्ट का यह कदम उस राहत के दायरे से बहुत बाहर है, जिसकी मांग याचिकाकर्ता ने की ही नहीं थी। सरकार का मानना है कि जब देश का कानून विशिष्ट शर्तों के साथ बूचड़खानों में कुछ श्रेणियों के पशु वध की अनुमति देता है, तो ऐसी स्थिति में अदालत का पूर्ण प्रतिबंध लगाने वाला निर्देश वैधानिक व्यवस्था के साथ सीधे टकराता है। इस वजह से इसे कानूनी रूप से बरकरार रखना असंभव है और इसी आधार पर सुप्रीम कोर्ट से राहत की गुहार लगाई गई थी।

सवाल-जवाब

सुप्रीम कोर्ट ने मद्रास हाईकोर्ट के किस आदेश पर रोक लगाई है?
सुप्रीम कोर्ट ने तमिलनाडु में गायों और बछड़ों के काटने पर लगे पूर्ण प्रतिबंध वाले हाईकोर्ट के आदेश पर अंतरिम रोक लगा दी है।
तमिलनाडु सरकार ने कोर्ट में क्या तर्क दिया?
सरकार का तर्क था कि यह प्रतिबंध तमिलनाडु एनिमल प्रिजर्वेशन एक्ट, 1958 और अन्य मौजूदा कानूनों के प्रावधानों के विपरीत है।
मद्रास हाईकोर्ट का फैसला किसके कहने पर आया था?
यह फैसला हिंदू मक्कल काची के महासचिव के. सूर्य प्रशांत द्वारा दायर एक जनहित याचिका की सुनवाई के दौरान आया था।
अदालत ने यह अंतरिम आदेश कब दिया?
सुप्रीम कोर्ट ने 13 जुलाई 2026 को यह अंतरिम आदेश जारी किया।

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