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हेमवती नंदन बहुगुणा: यूपी के वो मुख्यमंत्री जिन्होंने इंदिरा गांधी के सामने नहीं झुकाया सिरराजनीति
13 जुल॰ 2026, 12:02 pm (45 दिन पहले)· 2

हेमवती नंदन बहुगुणा: यूपी के वो मुख्यमंत्री जिन्होंने इंदिरा गांधी के सामने नहीं झुकाया सिर

उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री हेमवती नंदन बहुगुणा की कहानी, जो इमरजेंसी के दौरान दिल्ली के केंद्रीय नेतृत्व के साथ अपने मतभेदों और कुर्सी छोड़ने के फैसले के लिए आज भी याद किए जाते हैं।

साल 1975 का समय भारतीय राजनीति में बड़े बदलावों का साक्षी था। 25 जून 1975 को जब देश में इमरजेंसी की घोषणा हुई, तो इसका असर केवल राष्ट्रीय स्तर पर ही नहीं, बल्कि राज्यों की सत्ता संरचना पर भी गहरा पड़ा। उस दौरान उत्तर प्रदेश की कमान हेमवती नंदन बहुगुणा के हाथों में थी। वे एक अनुभवी कांग्रेस नेता और कुशल संगठनकर्ता थे, जिनकी बातों को लखनऊ से लेकर दिल्ली के सत्ता के गलियारों तक गंभीरता से लिया जाता था। हालांकि, यही वह समय था जब कांग्रेस के भीतर केंद्रीय नेतृत्व का प्रभाव काफी बढ़ गया था, जिसके चलते हेमवती नंदन बहुगुणा को अपने राजनीतिक सफर के सबसे चुनौतीपूर्ण दौर का सामना करना पड़ा।

प्रारंभिक जीवन और संघर्ष

हेमवती नंदन बहुगुणा का जन्म 25 अप्रैल 1919 को गढ़वाल क्षेत्र के एक ब्राह्मण परिवार में हुआ था। तत्कालीन संयुक्त प्रांत का यह हिस्सा आज उत्तराखंड का हिस्सा है। छात्र जीवन से ही वे राजनीति और देश की सेवा में रुचि लेने लगे थे। वे स्वतंत्रता संग्राम का सक्रिय हिस्सा रहे और उन्होंने भारत छोड़ो आंदोलन में भी भाग लिया, जिसके कारण उन्हें जेल की सजा भी काटनी पड़ी। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद, उन्होंने कांग्रेस के संगठनात्मक ढांचे में खुद को एक प्रभावशाली नेता के रूप में स्थापित किया। उनकी शानदार भाषण शैली और जमीनी स्तर पर कार्यकर्ताओं के बीच उनकी पैठ ने उन्हें राष्ट्रीय नेतृत्व का ध्यान खींचने में मदद की।

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उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री के रूप में कार्यकाल

कांग्रेस पार्टी ने 1973 में कमलापति त्रिपाठी के स्थान पर हेमवती नंदन बहुगुणा को उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री चुना। उन्होंने 8 नवंबर 1973 को इस पद की शपथ ली। उनके नेतृत्व में 1974 का विधानसभा चुनाव लड़ा गया, जिसमें कांग्रेस ने बड़ी जीत हासिल की और बहुगुणा एक बार फिर राज्य के मुख्यमंत्री बने। उस कालखंड में उत्तर प्रदेश का राज्य देश की राजनीति का सबसे महत्वपूर्ण केंद्र माना जाता था, और मुख्यमंत्री का पद एक अत्यंत प्रभावशाली पद हुआ करता था।

राजनीतिक मतभेदों की शुरुआत

1971 के आम चुनावों में भारी जीत और बांग्लादेश युद्ध के बाद इंदिरा गांधी का राजनीतिक कद अत्यंत ऊंचाइयों पर था। लेकिन 1974-75 तक आते-आते देश की परिस्थितियां बदलने लगीं। महंगाई, छात्रों के विरोध प्रदर्शन और जेपी आंदोलन के कारण सरकार पर भारी दबाव था। 12 जून 1975 को इलाहाबाद हाई कोर्ट ने रायबरेली निर्वाचन क्षेत्र से संबंधित एक मामले में इंदिरा गांधी के चुनाव को रद्द कर दिया, जिसने राजनीतिक अस्थिरता को और गहरा दिया। 'हेमवती नंदन बहुगुणा: ए पॉलिटिकल क्रुसेडर' नामक उनकी जीवनी के अनुसार, बहुगुणा लोकतान्त्रिक संस्थाओं को अधिक महत्व देते थे, जबकि इंदिरा गांधी के नेतृत्व में निर्णय लेने की प्रक्रिया अत्यधिक केंद्रीकृत हो रही थी। इसके अलावा, इमरजेंसी के दौरान संजय गांधी के साथ उनके बनते बिगड़ते रिश्तों ने भी उनके राजनीतिक भविष्य पर नकारात्मक असर डालना शुरू कर दिया था।

सत्ता से विदाई

केंद्रीय नेतृत्व के साथ बढ़ती खाई के बीच 29 नवंबर 1975 को हेमवती नंदन बहुगुणा को मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देना पड़ा। उनके स्थान पर नारायण दत्त तिवारी को उत्तर प्रदेश का नया मुख्यमंत्री नियुक्त किया गया। इतिहासकारों का मानना है कि उनकी विदाई के पीछे केवल एक कारण नहीं था, बल्कि केंद्रीय राजनीति में शक्ति संतुलन में हो रहे बदलाव और दिल्ली के प्रति निष्ठा की मांग इसके मुख्य आधार थे। सत्ता से हटने के बाद भी बहुगुणा ने हार नहीं मानी। 1977 में जब इमरजेंसी हटी और चुनाव घोषित हुए, तो उन्होंने कांग्रेस छोड़कर जगजीवन राम और नंदिनी सत्पथी के साथ मिलकर 'कांग्रेस फॉर डेमोक्रेसी' का गठन किया, जो बाद में जनता पार्टी का हिस्सा बना। इंदिरा गांधी ने भी सार्वजनिक रूप से इस बात को स्वीकार किया था कि उत्तर प्रदेश में बहुगुणा का प्रभाव कांग्रेस के लिए एक बड़ी चुनौती साबित हो सकता है।

इस घटनाक्रम का महत्व

हेमवती नंदन बहुगुणा की जीवन गाथा केवल एक मुख्यमंत्री के पद छोड़ने की कहानी नहीं है, बल्कि यह दिल्ली और लखनऊ के बीच बदलते शक्ति संबंधों का दस्तावेज़ है। यह उस दौर की राजनीति को भी उजागर करती है, जब कांग्रेस के भीतर असहमति की जगह कम होती जा रही थी और लोकतंत्र एक कठिन परीक्षा से गुजर रहा था। आज भी जब उत्तर प्रदेश के राजनीतिक इतिहास पर चर्चा होती है, तो उनकी भूमिका और साहस को महत्वपूर्ण संदर्भ के रूप में देखा जाता है।

सवाल-जवाब

हेमवती नंदन बहुगुणा उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री कब बने थे?
हेमवती नंदन बहुगुणा ने 8 नवंबर 1973 को पहली बार उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ली थी।
उन्हें मुख्यमंत्री पद से कब हटना पड़ा?
केंद्रीय नेतृत्व के साथ मतभेदों के चलते उन्हें 29 नवंबर 1975 को मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देना पड़ा था।
बहुगुणा के बाद उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री कौन बना?
हेमवती नंदन बहुगुणा के बाद नारायण दत्त तिवारी को उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री बनाया गया था।
इमरजेंसी के बाद उन्होंने कौन सा दल बनाया था?
1977 में इमरजेंसी हटने के बाद उन्होंने जगजीवन राम और नंदिनी सत्पथी के साथ मिलकर 'कांग्रेस फॉर डेमोक्रेसी' का गठन किया था।
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