उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले भारतीय जनता पार्टी ने सीट दर सीट रणनीति बनाना शुरू कर दिया है। पार्टी की सबसे ज्यादा चिंता उन सीटों को लेकर है जहां पिछली बार हार मिली या फिर जीत का अंतर 10 हजार वोट से भी कम रहा। ऐसी सीटों पर अब नए प्रभारी भेजे जाएंगे, वो भी ऐसे नेता जिन्हें कांटे की टक्कर वाले चुनाव जीतने या जिताने का पुराना अनुभव हो।
सीटों की सूची तैयार, नेताओं को मिला होमवर्क
पार्टी ने कमजोर और संवेदनशील सीटों की सूची बनानी शुरू कर दी है। प्रदेश अध्यक्ष पंकज चौधरी और संगठन महामंत्री धर्मपाल सिंह ने पार्टी पदाधिकारियों को इससे जुड़ा होमवर्क सौंप दिया है, ताकि हर सीट का बारीकी से मूल्यांकन हो सके।
मिशन 2027 को लेकर संगठन में भी हलचल तेज है। हाल में प्रदेश पदाधिकारियों, विभिन्न मोर्चों और क्षेत्रीय अध्यक्षों के नामों का ऐलान हुआ। इसके तुरंत बाद राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन ने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ, दोनों उपमुख्यमंत्रियों और संगठन के वरिष्ठ नेताओं के साथ बैठकों का दौर शुरू किया, जिसमें आगामी चुनाव की रणनीति पर मंथन हुआ।
18 जिलों पर पैनी नजर, आखिर क्यों
रणनीति बनाने के लिए पार्टी ने 2017 और 2022 के विधानसभा चुनाव के नतीजों का बारीकी से विश्लेषण कराया है। साथ ही 2024 के लोकसभा चुनाव में हर विधानसभा सीट पर पार्टी और विरोधियों के प्रदर्शन का भी अध्ययन कराया गया। इस विश्लेषण में सामने आया कि 18 ऐसे जिले हैं जहां लोकसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी को बढ़त मिली थी। इन जिलों को बीजेपी अब सबसे संवेदनशील मान रही है और यहां केंद्रीय मंत्रियों समेत बड़े नेताओं को क्लस्टर प्रभारी बनाए जाने की योजना है।
जहां कमल कभी नहीं खिला, वहां भी नई कोशिश
इतना ही नहीं, कुछ विधानसभा सीटें ऐसी भी हैं जहां बीजेपी आज तक जीत ही नहीं पाई है या फिर एक-दो बार ही जीत दर्ज कर सकी है। पार्टी ने तय किया है कि ऐसी परंपरागत रूप से कमजोर सीटों पर भी अनुभवी और जमीन से जुड़े नेताओं को जिम्मेदारी सौंपी जाएगी, ताकि इन सीटों को धीरे धीरे मजबूत किया जा सके।
2022 में हुए नुकसान से सबक
2022 के विधानसभा चुनाव के आंकड़े बीजेपी की चिंता की बड़ी वजह हैं। 2017 के मुकाबले पार्टी को 57 सीटों का सीधा नुकसान हुआ था, जबकि समाजवादी पार्टी ने उस चुनाव में 64 सीटें ज्यादा जीतीं। इसके बाद 2024 के लोकसभा चुनाव के विधानसभावार आंकड़ों ने बीजेपी की चिंता और बढ़ा दी, क्योंकि सपा ने दो दर्जन से भी ज्यादा विधानसभा सीटों पर बढ़त हासिल की। यही वजह है कि पार्टी अब 2027 से पहले कोई भी जोखिम उठाने के मूड में नहीं है।
सर्वे के बाद अब प्रभारियों से भी लिया जाएगा फीडबैक
बीजेपी अब तक निजी एजेंसियों से दो बार सर्वे करा चुकी है। अब पार्टी विधानसभा प्रभारियों से सीधा फीडबैक लेने की तैयारी में है। उनसे पूछा जाएगा कि उनके इलाके में विपक्ष की सबसे बड़ी ताकत क्या है, पीडीए यानी पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक समीकरण का वहां कितना असर दिख रहा है, और विपक्ष किस मुद्दे के सहारे जनता के बीच माहौल बनाने में जुटा है।
पार्टी की निगाह सिर्फ हारी हुई सीटों तक सीमित नहीं है। 2022 में जिन सीटों पर जीत का अंतर 10 हजार वोट से कम रहा था, उन पर भी बारीकी से नजर रखी जा रही है। जरूरत पड़ने पर ऐसी सीटों पर उम्मीदवार तक बदले जा सकते हैं।
सिर्फ बैठकें नहीं, जमीन पर उतरेगी टीम
नए बनाए जाने वाले प्रभारियों की जिम्मेदारी सिर्फ बैठकों तक सीमित नहीं रहेगी। उन्हें लगातार अपने इलाके में मौजूद रहना होगा। इसके तहत जनसंपर्क अभियान चलाए जाएंगे, युवाओं के साथ संवाद कार्यक्रम होंगे, किसान चौपालें लगेंगी और पिछड़ा व दलित सम्मेलन भी आयोजित किए जाएंगे। कुल मिलाकर बीजेपी 2027 के चुनाव से पहले हर कमजोर सीट पर संगठन की मजबूती और सामाजिक समीकरणों को साधने, दोनों मोर्चों पर एक साथ काम करने की रणनीति पर आगे बढ़ रही है।











