पंजाब भर में सरकारी कामकाज और सार्वजनिक यात्रा व्यवस्था पूरी तरह चरमरा गई है, क्योंकि लगभग 3 लाख सरकारी कर्मियों ने अपने लंबित मसलों को लेकर दो दिनों के सामूहिक आकस्मिक अवकाश का फैसला किया है। बुधवार और गुरुवार को होने वाले इस बड़े विरोध प्रदर्शन के कारण नागरिक सेवाओं से जुड़े सरकारी दफ्तरों में कामकाज ठप होने की स्थिति बन गई है। वहीं दूसरी तरफ राज्य की परिवहन व्यवस्था संभालने वाले संविदा और आउटसोर्स कर्मचारियों ने भी अनिश्चितकालीन कार्य बहिष्कार शुरू कर दिया है, जिससे दैनिक यात्रियों की मुश्किलें काफी बढ़ गई हैं।
सचिवालय से लेकर जिला स्तर तक प्रशासनिक काम रुके
कर्मचारी संघों और राज्य शासन के बीच मांगों को लेकर जारी मतभेद अब खुले टकराव का रूप ले चुका है। विभिन्न कर्मचारी संगठनों का स्पष्ट कहना है कि लंबे समय से उठाई जा रही मांगों पर सरकार की तरफ से कोई ठोस पहल नहीं की गई, जिसके चलते उन्हें सामूहिक आकस्मिक अवकाश पर जाने का कड़ा कदम उठाना पड़ा। इस विरोध प्रदर्शन के कारण पंजाब सिविल सचिवालय के साथ-साथ जिला मुख्यालयों, तहसीलों और ब्लॉक स्तर के दफ्तरों में आम नागरिकों से जुड़े जरूरी कामकाज रुक गए हैं। नागरिक प्रमाण पत्र, भूमि रजिस्ट्री, राजस्व मामले और फाइलों के निस्तारण से जुड़े कामों के लिए आने वाले लोगों को खाली हाथ लौटना पड़ रहा है।
तीन हजार से अधिक सरकारी बसें डिपो में बंद
इस आंदोलन का सबसे व्यापक और सीधा असर राज्य के सार्वजनिक परिवहन तंत्र पर दिखाई दे रहा है। पंजाब रोडवेज, पनबस और पेप्सू रोड ट्रांसपोर्ट कॉरपोरेशन (पीआरटीसी) के बेड़े की करीब 3,000 से अधिक सरकारी बसें सड़कों से हट गई हैं। इन उपक्रमों के संविदा और आउटसोर्स कर्मियों के अनिश्चितकालीन हड़ताल पर चले जाने से केवल पंजाब के भीतर ही नहीं, बल्कि केंद्र शासित प्रदेश चंडीगढ़ और अन्य राज्यों के लिए चलने वाली अंतरराज्यीय सेवाएं भी बुरी तरह प्रभावित हो गई हैं। लंबी दूरी के रूट बंद होने से नौकरीपेशा लोगों, विद्यार्थियों और दैनिक यात्रियों को निजी बसों या महंगे टैक्सियों का सहारा लेना पड़ रहा है।
मंगलवार शाम से ही रोक दिए गए थे लंबे रूट
आंदोलन की पूर्व तैयारी के तहत मंगलवार दोपहर बाद से ही बस अड्डों और डिपो पर हालात बदलने लगे थे। पंजाब रोडवेज, पनबस और पीआरटीसी कॉन्ट्रैक्ट वर्कर्स यूनियन के प्रतिनिधियों के अनुसार, डिपो पर तैनात चालकों और परिचालकों ने मंगलवार दोपहर के बाद रात में ठहरने वाली लंबी दूरी की बसों को चलाने से इनकार कर दिया था। इसके बाद सभी वाहनों को वापस डिपो परिसरों में खड़ा करा दिया गया। यूनियन ने यह स्पष्ट कर दिया था कि बुधवार सुबह की शुरुआती पाली से ही कोई भी सरकारी गाड़ी सड़क पर नहीं उतरेगी।
पक्की नौकरी और निजी एजेंसियों को बाहर करने की मांग
प्रदर्शनकारी कर्मियों का मुख्य संघर्ष उनकी नौकरी की सुरक्षा और नियमितीकरण को लेकर है। परिवहन संघ मांग कर रहे हैं कि संविदा के आधार पर कार्यरत चालकों, परिचालकों और वर्कशॉप में काम करने वाले मैकेनिकों को विभागीय सेवा नियमों के तहत नियमित किया जाए। इसके साथ ही भर्ती प्रक्रिया में शामिल निजी आउटसोर्सिंग एजेंसियों को पूरी तरह खत्म करने और कर्मचारियों का सीधा अनुबंध संबंधित विभाग के माध्यम से करने पर जोर दिया जा रहा है। कर्मचारी नेताओं ने साफ किया है कि जब तक उनकी मांगों के समर्थन में औपचारिक सरकारी अधिसूचनाएं जारी नहीं हो जातीं, तब तक परिवहन का चक्का जाम जारी रहेगा।



















