इलाहाबाद हाई कोर्ट ने हाल ही में दिए अपने एक फैसले में सिंगल जज के आदेश को सही ठहराते हुए नीट के जरिए एमबीबीएस और अन्य मेडिकल पाठ्यकमों में प्रवेश के लिए पात्र वरिष्ठ नागरिकों के वास्ते एक प्रतिशत आरक्षण या विशेष कोटा देने की याचिका को नामंजूर कर दिया है। जस्टिस राजन रॉय और जस्टिस मंजीव शुक्ला की बेंच ने अशोक बहार की तरफ से दायर की गई विशेष अपील का निपटारा करते हुए यह टिप्पणी की कि प्रस्तावित आरक्षण के संबंध में संबंधित विधायिका या सरकार को विचार करना चाहिए।
आरक्षण को लेकर कोई कानूनी प्रावधान नहीं
सुनवाई के दौरान बेंच ने यह बात साफ तौर पर कही कि इस तरह के किसी भी प्रस्तावित आरक्षण के लिए वर्तमान में कोई प्रावधान मौजूद नहीं है और याचिकाकर्ता के अभ्यावेदन में ऐसा कोई भी कानूनी अधिकार शामिल नहीं था जिसके आधार पर रिट ऑफ मैंडेमस जारी करने की आवश्यकता पड़े। अदालत ने अपने आदेश में कहा कि एमबीबीएस और अन्य मेडिकल कोर्स में दाखिले के मामले में पात्र बुजुर्गों के लिए आरक्षण की मांग करने वाला अभ्यावेदन किसी भी ऐसे अधिकार पर आधारित नहीं है।
अशोक बहार ने दाखिल की थी विशेष अर्जी
अशोक बहार ने अदालत में अर्जी दाखिल करते हुए यह मांग रखी थी कि अधिकारियों को उनके अभ्यावेदन पर विचार करने का निर्देश दिया जाए। साथ ही नीट के माध्यम से एमबीबीएस और अन्य मेडिकल कोर्सेज में दाखिले के लिए योग्य सीनियर सिटिजन्स के वास्ते एक प्रतिशत रिजर्वेशन या विशेष कोटा निर्धारित करने के लिए उचित नीतिगत फैसला लिया जाए। उनकी यह भी मांग थी कि अधिकारियों को 23 जून, 2026 के उनके लंबित अभ्यावेदन पर एक निश्चित समय सीमा के भीतर एक तर्कपूर्ण और बोलने वाला आदेश पारित करके फैसला सुनाने का निर्देश दिया जाए।
इससे पहले सिंगल जज ने इस आधार पर रिट याचिका को खारिज कर दिया था कि यह पूरा मामला नीतिगत दायरे से जुड़ा हुआ है। याचिकाकर्ता द्वारा मांगी गई रिट ऑफ मैंडेमस को जारी करने से साफ इंकार कर दिया गया था। उसी आदेश को चुनौती देते हुए, बहार ने मौजूदा इंट्रा-कोर्ट अपील का रुख किया था।
एनटीए केवल परीक्षा आयोजित करने वाली संस्था
नेशनल टेस्टिंग एजेंसी के वकील ने डिवीजन बेंच के समक्ष अपना पक्ष रखते हुए बताया कि एनटीए केवल एक परीक्षा कराने वाली संस्था है और एमबीबीएस कोर्स में दाखिले की प्रक्रिया मौजूदा कानूनों तथा नीतियों के अनुसार ही संचालित होती है। बेंच को यह भी बताया गया कि वर्तमान स्थिति में अपीलकर्ता द्वारा जैसी मांग की जा रही है, वैसा कोई भी प्रावधान अस्तित्व में नहीं है। यह पूरा मामला वैसे भी संबंधित विधायिका या फिर सरकार के अधिकार क्षेत्र के अंतर्गत आता है। बेंच ने अपने फैसले में आगे जिक्र किया कि याचिकाकर्ता का अभ्यावेदन कोई कानूनी अभ्यावेदन नहीं था, बल्कि इसे केवल मैंडेमस की मांग करने वाली रिट याचिका को सुनवाई योग्य बनाए रखने के लिए जरूरी शर्तों को पूरा करने के उद्देश्य से पेश किया गया था।
बेंच ने कहा कि हमारी यह राय है कि अपील करने वाला इस विषय को कार्यपालिका या विधायिका के समक्ष ले जा सकता है, जैसा भी मामला हो, लेकिन मामले के तथ्यों और परिस्थितियों को देखते हुए, मैंडेमस जारी करने का कोई सवाल ही पैदा नहीं होता।
अदालत ने इस बात को भी रेखांकित किया कि इन मेडिकल कोर्सेज में एडमिशन के वास्ते आयु सीमा कार्यपालिका या विधायिका द्वारा तय की जानी चाहिए या नहीं, यह फैसला उन्हें ही लेना है, जब तक कि इस संबंध में पहले से ही कोई नियम तय न हो। सिंगल जज के निर्णय में किसी भी तरह की त्रुटि न पाते हुए, डिवीजन बेंच ने इस अपील को पूरी तरह से खारिज कर दिया।

















