राजस्थान के भरतपुर से एक ऐसी घटना सामने आई है जो किसी फिल्म की पटकथा जैसी लगती है, मगर पूरी तरह सच है। झारखंड के गढ़वा जिले के रहने वाले सुनील कुमार को उनके परिवार ने बरसों पहले मृत मान लिया था और विधिवत उनका अंतिम संस्कार भी कर दिया गया था। अब पूरे 12 साल बाद सुनील अपने परिवार के सामने जिंदा खड़े हैं, और इस चमत्कारिक पुनर्मिलन ने वहां मौजूद हर शख्स की आंखें नम कर दीं।
बाढ़ में बह जाने की आशंका, फिर पंडितों की सलाह पर हुआ अंतिम संस्कार
घटना करीब 12 साल पुरानी है। सुनील कुमार उस दौरान अपनी बहन से मिलने बिहार के छपरा गए थे। वहां से लौटते समय वे रहस्यमय हालात में लापता हो गए। उसी दौरान इलाके में भीषण बाढ़ आई हुई थी, जिसके चलते परिजनों को डर सताने लगा कि सुनील नदी के तेज बहाव में बह गए होंगे। परिवार ने महीनों तक उनकी तलाश की, हर रिश्तेदार के घर तक जाकर पूछताछ की, लेकिन कहीं से कोई सुराग नहीं मिला। धीरे-धीरे उम्मीद टूटने लगी और आखिरकार परिवार ने मान लिया कि सुनील अब जिंदा नहीं बचे। करीब सात साल पहले स्थानीय रीति-रिवाज और पंडितों की सलाह पर परिवार ने सुनील का पुतला बनाकर उनका विधिवत अंतिम संस्कार कर दिया।
सिंदूर उतरा, सफेद कपड़ों में गुजरे बरसों, न्यौते पर छपा स्वर्गीय
अंतिम संस्कार के बाद सुनील की पत्नी अमरावती देवी की जिंदगी पूरी तरह बदल गई। उनका सिंदूर पोंछ दिया गया और मंगलसूत्र, बिछिया जैसे सुहाग के तमाम निशान उतरवा दिए गए। उन्होंने रंगीन कपड़े पहनना छोड़ दिया और बरसों तक सफेद वस्त्रों में विधवा की तरह जीवन बिताया। हाल ही में परिवार में हुई एक शादी के निमंत्रण पत्र में भी सुनील कुमार के नाम के आगे स्वर्गीय शब्द छप चुका था। पूरा परिवार यही मान बैठा था कि सुनील अब इस दुनिया में नहीं रहे।
अंबाला रेलवे स्टेशन पर मिले बीमार सुनील, भरतपुर लाया गया अपना घर आश्रम
इसी बीच हरियाणा के अंबाला रेलवे स्टेशन पर अपना घर आश्रम की रेस्क्यू टीम को एक गंभीर रूप से बीमार, कुपोषित और असहाय व्यक्ति मिला। वह चलने-फिरने में भी असमर्थ था और टीबी जैसी जानलेवा बीमारी से जूझ रहा था। प्राथमिक उपचार देने के बाद बेहतर इलाज और पुनर्वास के लिए उसे भरतपुर स्थित अपना घर आश्रम लाया गया। यहां डॉक्टरों की कड़ी निगरानी, पौष्टिक खाने और नियमित देखभाल से उसकी सेहत में धीरे-धीरे सुधार आने लगा।
होश आते ही खुला राज, झारखंड पुलिस की मदद से मिला परिवार
इलाज के दौरान जब उस व्यक्ति की मानसिक और शारीरिक हालत ठीक होने लगी, तो उसने खुद को सुनील कुमार बताया और अपने गांव व परिवार की जानकारी दी। इसके बाद आश्रम के पुनर्वास विभाग ने झारखंड पुलिस की मदद से परिजनों का पता लगाया और उनसे संपर्क किया। जब यह खबर गांव पहुंची कि सुनील कुमार जीवित हैं, तो किसी को अपने कानों पर यकीन नहीं हुआ।
पिता-पुत्र गले मिलकर रोए, सिंदूर लगाकर पहुंचीं पत्नी अमरावती देवी
अपने पति को वापस लेने अमरावती देवी और बेटा नरेश यादव भरतपुर स्थित आश्रम पहुंचे। जब सुनील अपने बेटे से बिछड़े थे, तब नरेश महज 7-8 साल के थे। बरसों बाद सामने खड़े जवान बेटे को सुनील पहली नजर में पहचान ही नहीं पाए। कुछ पल की खामोशी के बाद पिता-पुत्र एक-दूसरे के गले लगकर फूट-फूटकर रो पड़े। सबसे भावुक पल तब आया जब अमरावती देवी अपने जीवित पति के सामने खड़ी थीं। बरसों तक विधवा की जिंदगी जीने के बाद इस बार वे सिंदूर लगाकर और लाल रंग की साड़ी पहनकर पति से मिलने पहुंची थीं। उनके लिए यह सिर्फ पुनर्मिलन नहीं, बल्कि समाज में सम्मान और नए जीवन की वापसी जैसा ऐतिहासिक क्षण था। अपना घर संस्था के मुताबिक उनका मकसद सिर्फ बेसहारा लोगों को आश्रय देना नहीं, बल्कि उन्हें उनके परिवार से मिलाकर एक सम्मानजनक जिंदगी लौटाना है।











