आधुनिक जीवनशैली में आजीविका, उच्च शिक्षा और पारिवारिक जिम्मेदारियों के चलते वैवाहिक जोड़ों का अलग-अलग शहरों या देशों में रहना एक सामान्य चलन बन चुका है। ऐसे रिश्तों की बुनियाद आपसी समझ, संवाद और अटूट भरोसे पर टिकी होती है, जहां दूरी होने के बावजूद दोनों साझेदार सुरक्षित महसूस करते हैं। हालांकि, जब संवाद की डोर कमजोर पड़ने लगती है और मन में अनसुलझे संदेह घर करने लगते हैं, तो सामान्य बातें भी गंभीर टकराव का कारण बन जाती हैं। पंजाब के लुधियाना स्थित विकास नगर से सामने आई एक दुखद घटना ने यह स्पष्ट कर दिया है कि वैवाहिक जीवन में अविश्वास और नियंत्रण की प्रवृत्ति किस हद तक विनाशकारी साबित हो सकती है।
लुधियाना के विकास नगर की दुखद घटना का विवरण
विकास नगर के इस मामले में 50 वर्षीय रविंदर सिंह अपनी 49 वर्षीया पत्नी कमलदीप कौर के साथ ऑस्ट्रेलिया में रहने वाले अपने छोटे बेटे से मिलने गए थे। पारिवारिक यात्रा के बाद कमलदीप कौर लगभग चार महीने पहले भारत वापस लौट आई थीं। इसके बाद रविंदर 29 अक्टूबर को स्वदेश वापस आया। घर वापसी के महज दो दिन बाद, 31 अक्टूबर की शाम को रविंदर ने अपने बड़े बेटे गगनदीप को बाजार से दूध लाने के बहाने बाहर भेज दिया। बेटे के घर से बाहर जाते ही रविंदर ने कथित तौर पर रसोई के चाकू से कमलदीप कौर पर एक के बाद एक कई गंभीर वार कर दिए।
जब गगनदीप खरीदारी कर घर वापस लौटा, तो उसने अपने पिता को मकान से बाहर जाते हुए देखा। मकान के भीतर कदम रखते ही उसने अपनी मां को गंभीर रूप से घायल और खून से लथपथ अवस्था में पाया। आसपास के पड़ोसियों की सहायता से घायल कमलदीप कौर को तुरंत नजदीकी अस्पताल ले जाया गया, जहां चिकित्सकों ने परीक्षण के उपरांत उन्हें मृत घोषित कर दिया। घटना की सूचना मिलते ही पुलिस ने त्वरित कार्रवाई करते हुए रविंदर को गिरफ्तार कर लिया। इस पूरे मामले में जांच अधिकारी इस गंभीर पहलू की भी पड़ताल कर रहे हैं कि क्या आरोपी पहले से ही हत्या की पूरी योजना बनाकर ऑस्ट्रेलिया से भारत लौटा था।
कोअर्सिव कंट्रोल और अत्यधिक निगरानी के दुष्परिणाम
पारिवारिक हिंसा के मामलों की विशेषज्ञ कार्मेल ओ’ब्रायन का मानना है कि जब कोई व्यक्ति अपने जीवनसाथी की व्यक्तिगत स्वतंत्रता को अनुचित ढंग से सीमित करने लगे और उसे अपनी शर्तों पर जीने के लिए विवश करे, तो इस मनोवैज्ञानिक स्थिति को कोअर्सिव कंट्रोल कहा जाता है। इस तरह के आचरण में जीवनसाथी की हर गतिविधि पर लगातार नजर रखना, जासूसी करना, दोस्तों और सगे-संबंधियों से मिलने-जुलने पर रोक लगाना तथा हद से ज्यादा अधिकार जताने की मानसिकता शामिल होती है। जब किसी रिश्ते में ऐसा व्यवहार सामान्य मान लिया जाता है, तो वहां शारीरिक या मानसिक उत्पीड़न का खतरा कई गुना बढ़ जाता है।
इसी तरह के व्यवहार पर प्रकाश डालते हुए क्लिनिकल साइकोलॉजिस्ट डॉ. सुसान अल्बर्स बताती हैं कि जलन एक बेहद पेचीदा और असहज करने वाला मानवीय संवेग है। वैवाहिक जीवन में किसी खास परिस्थिति में हल्की जलन का अहसास होना भले ही सामान्य बात हो, लेकिन जब यह भावना साथी की गतिविधियों की अनवरत निगरानी करने, उस पर प्रभुत्व जमाने या बार-बार बेवफाई के बेबुनियाद लांछन लगाने का रूप ले ले, तो यह रिश्ते की बुनियाद को पूरी तरह से खोखला कर देती है।
दूर रहकर निभाए जाने वाले रिश्तों में अविश्वास पनपने की वजहें
लंबे समय तक एक-दूसरे से मीलों दूर रहने वाले दम्पतियों के दैनिक जीवन में परस्पर शारीरिक उपस्थिति का अभाव स्वाभाविक रूप से आ जाता है। काम का भारी दबाव, समय का बड़ा अंतर और अलग-अलग दिनचर्या की वजह से दोनों के बीच दिनभर के छोटे-छोटे अनुभव साझा करने की गुंजाइश कम हो जाती है। यह संवादहीनता तब और विकट हो जाती है जब पहले से ही किसी एक साझेदार के भीतर असुरक्षा की भावना मौजूद हो।
संवाद का दायरा सिमटते ही अविश्वास धीरे-धीरे जड़े जमाने लगता है। ऐसी मानसिक स्थिति में सोशल मीडिया पर डाली गई कोई साधारण तस्वीर, किसी अनजान व्यक्ति का सामान्य फोन कॉल या काम में व्यस्त होने के कारण तुरंत संपर्क न हो पाना भी बेवफाई के शक में बदल जाता है। स्पष्ट बातचीत के अभाव में व्यक्ति अपने मन में ही नकारात्मक कहानियां गढ़ने लगता है, जिससे भ्रम और संदेह का दायरा दिन-प्रतिदिन बढ़ता चला जाता है।
खतरे के स्पष्ट संकेत और हिंसा की जवाबदेही
जब कोई साथी बार-बार मोबाइल फोन की जांच करने लगे, सोशल मीडिया और निजी खातों के पासवर्ड मांगने पर दबाव डाले, प्रत्येक मिनट का लेखा-जोखा मांगे और परिवार या मित्रों से दूरी बनाने के लिए बाध्य करे, तो यह केवल जलन का सामान्य मामला नहीं रह जाता। यह दूसरे व्यक्ति के अस्तित्व और स्वतंत्रता को कुचलने का स्पष्ट प्रयास बन जाता है। जीवनसाथी के चरित्र पर खुलेआम सवाल उठाना, उसे डराना, हिंसा की धमकियां देना, गुस्से में घरेलू सामान को तोड़ना-फेंकना और भय दिखाकर अपनी इच्छाएं थोपना गंभीर खतरे के लक्षण हैं।
मनोवैज्ञानिक और कानूनी दृष्टिकोण से यह तथ्य पूरी तरह स्पष्ट होना चाहिए कि किसी भी व्यक्ति के मन में संदेह का पैदा होना एक अलग मानसिक पहलू है, परंतु उस संदेह की आड़ में दूसरे इंसान पर शारीरिक हमला करना या उसे मानसिक यातना देना सर्वथा अक्षम्य अपराध है। किसी भी हिंसक कृत्य या हत्या का पूरा उत्तरदायित्व केवल और केवल हमलावर पर होता है, न कि उस पीड़ित व्यक्ति पर जिस पर बेबुनियाद शक किया जा रहा था।
दूरियों के बावजूद वैवाहिक रिश्ते में विश्वास बनाए रखने के उपाय
अलग-अलग जगहों पर रहकर भी वैवाहिक जीवन को स्वस्थ और सुरक्षित बनाए रखने के लिए कुछ ठोस कदमों को प्राथमिकता देना आवश्यक है
- नियमित और शांत संवाद: अपनी दैनिक व्यस्तताओं में से कुछ समय विशेष रूप से ऐसा सुरक्षित रखें, जब दोनों साथी बिना किसी तनाव या जल्दबाजी के खुलकर बात कर सकें। इस बातचीत में केवल घर-परिवार के खर्चों या जिम्मेदारियों पर चर्चा न हो, बल्कि अपनी वास्तविक भावनाओं, चिंताओं और मानसिक स्थिति को भी साझा करें।
- हर स्थिति में संदेह से बचाव: यदि जीवनसाथी अपने काम में अत्यधिक व्यस्त है, दोस्तों के साथ समय बिता रहा है या समय पर फोन नहीं उठा पा रहा है, तो इसे सीधे तौर पर धोखेबाजी या बेवफाई से न जोड़ें। एक-दूसरे की परिस्थितियों को समझने की परिपक्वता दिखाएं।
- आंतरिक असुरक्षा की पहचान: यदि आपके मन में बार-बार अविश्वास की भावनाएं उभरती हैं, तो आत्म-विश्लेषण करें कि क्या यह किसी पुराने कड़वे अनुभव या आत्मसम्मान की कमी का नतीजा है। यदि यह समस्या मन पर हावी होने लगे, तो पेशेवर काउंसलर या थेरेपिस्ट से परामर्श लेने में संकोच न करें।
- व्यक्तिगत आजादी का पूर्ण सम्मान: वैवाहिक बंधन का अर्थ कभी भी एक-दूसरे की स्वतंत्रता को बंधक बनाना नहीं होता। दोनों साझेदारों का अपना अलग व्यक्तित्व, सामाजिक दायरा और निजी जिंदगी होना रिश्ते को अधिक मजबूत बनाता है।
लुधियाना में घटी इस खौफनाक वारदात ने एक महिला का जीवन हमेशा के लिए छीन लिया और बेटों के सिर से उनकी मां का साया हटा दिया। यह घटना समाज के हर उस रिश्ते के लिए एक गंभीर चेतावनी है जहां अत्यधिक नियंत्रण और शक को स्नेह का नाम देकर सही ठहराने की कोशिश की जाती है। यदि वैवाहिक संबंध में सम्मान और भरोसा समाप्त हो जाए, तो अलग होने के वैधानिक विकल्प हमेशा उपलब्ध रहते हैं, लेकिन किसी भी व्यक्ति को अपने साथी का जीवन समाप्त करने का कोई अधिकार नहीं है।



















