भारतीय परिवारों में करवा चौथ का उल्लेख होते ही अमूमन महिलाओं के सोलह श्रृंगार, निर्जला उपवास और रात्रि के समय छलनी की ओट से चंद्रमा के दर्शन करने का विहंगम दृश्य जेहन में उभरता है. हालांकि, आधुनिक दौर में वैवाहिक रिश्तों के समीकरण तेजी से बदल रहे हैं और अब कई घरों में पुरुष भी अपनी जीवनसंगिनी के प्रति समर्पण व्यक्त करने के लिए पूरे दिन अन्न-जल त्यागकर उपवास का पालन कर रहे हैं. कई पति अपनी पत्नी को मानसिक और भावनात्मक संबल देने के लिए दिनभर उपवास में साथ रहते हैं, वहीं शाम की पारंपरिक पूजा अर्चना से लेकर गगन में चांद के दीदार तक हर रस्म को बराबरी के साथ साझा करते हैं. करवा चौथ के अवसर पर पतियों का यह उपवास दांपत्य में बराबरी, परस्पर सम्मान और प्रगाढ़ प्रेम का एक सशक्त माध्यम बनकर उभरा है.
शुरुआत का कोई लिखित दस्तावेज नहीं, बदलती सोच से पनपा चलन
करवा चौथ के पारंपरिक इतिहास पर दृष्टि डालें तो यह पर्व मूल रूप से विवाहित महिलाओं द्वारा अपने पति के सुदीर्घ जीवन और उत्तम स्वास्थ्य की मंगलकामना के लिए निर्धारित रहा है. सांस्कृतिक रूप से यह पावन त्योहार मुख्य रूप से उत्तर भारत के पंजाब, हरियाणा, राजस्थान और उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में अत्यधिक श्रद्धा और उल्लास के साथ मनाया जाता रहा है. भारत सरकार के पर्यटन पोर्टल के विवरण के अनुसार, वर्तमान समय में कई पति भी अपनी पत्नी के आरोग्य और लंबी आयु की कामना करते हुए इस उपवास में सहभागिता करने लगे हैं. जहां तक इस बात का प्रश्न है कि पुरुषों द्वारा इस उपवास की शुरुआत किस विशिष्ट कालखंड अथवा किस निश्चित भौगोलिक क्षेत्र से हुई, तो इसका कोई प्रामाणिक ऐतिहासिक साक्ष्य उपलब्ध नहीं है. इसलिए इसे किसी एक व्यक्ति विशेष, एक परिवार अथवा किसी खास शहर तक सीमित मानकर देखना सही नहीं होगा, बल्कि यह समाज में पनप रही नई सोच और आपसी समझ का व्यापक परिणाम है.
पारस्परिक एकजुटता और सम्मान प्रकट करने की पहल
अनेक युवा और आधुनिक दंपति अब करवा चौथ को केवल महिला केंद्रित एकतरफा अनुष्ठान तक सीमित नहीं रखना चाहते. उनके दृष्टिकोण में यह त्योहार एक-दूसरे के प्रति अगाध प्रेम, निष्ठा और सुख-दुख साझा करने का एक जीवंत माध्यम है. जब पत्नी पूरे दिन कठिन उपवास का निर्वाह करती है, तो पति भी भूखा-प्यासा रहकर उस शारीरिक और मानसिक तपस्या का प्रत्यक्ष भागीदार बनता है. पति-पत्नी साथ मिलकर शाम की कथा सुनते हैं, थाली घुमाने की रस्म पूरी करते हैं, छत पर टकटकी लगाकर चंद्रमा के उदय होने की प्रतीक्षा करते हैं और अंततः एक-दूसरे को पानी पिलाकर अपना व्रत खोलते हैं. इस प्रकार यह पर्व महज एक पारंपरिक धार्मिक रस्म न रहकर वैवाहिक रिश्ते को नई ताजगी, आत्मीयता और गहराई प्रदान करने का अवसर बन जाता है.
अक्टूबर 2024 में भी सामाजिक अध्ययनों और मीडिया चर्चाओं में करवा चौथ के इस परिवर्तित होते स्वरूप का प्रमुखता से उल्लेख किया गया था. उस समय भी यह बात सामने आई थी कि उत्तर भारत सहित देश के विभिन्न हिस्सों में पतियों द्वारा पत्नी के साथ निर्जला या फलाहारी उपवास रखने का दायरा लगातार बढ़ रहा है.
क्या पतियों के लिए उपवास रखना आवश्यक है?
धार्मिक और शास्त्रीय मान्यताओं के अनुसार करवा चौथ का व्रत केवल सुहागिन महिलाओं के लिए ही विहित है. पतियों के लिए यह उपवास रखना किसी भी प्रकार की धार्मिक अनिवार्यता या बाध्यकारी परंपरा का हिस्सा नहीं है. इसके बावजूद, यदि कोई पुरुष अपने अंतर्मन से, स्वेच्छा और अगाध आस्था से अपनी पत्नी के लिए उपवास रखने का निर्णय लेता है, तो आज के सामाजिक परिवेश में परिवार इसे सहजता और सम्मान के साथ स्वीकार करते हैं. प्रत्येक क्षेत्र और विभिन्न कुलों में पूजा-पाठ, सामग्री और उपवास के नियमों में स्वाभाविक भिन्नता पाई जाती है. यही कारण है कि वैवाहिक जोड़े अपनी निजी मान्यताओं, शारीरिक सामर्थ्य और सुविधा के अनुसार त्योहार की शैली स्वयं निर्धारित कर रहे हैं.
स्वास्थ्य और शारीरिक सीमाओं का ध्यान रखना अनिवार्य
भावनात्मक जुड़ाव और श्रद्धा अपनी जगह है, लेकिन उपवास का संकल्प लेने से पूर्व स्वयं के स्वास्थ्य का यथार्थवादी आकलन करना बेहद आवश्यक होता है. विशेष रूप से ऐसे व्यक्ति जो किसी गंभीर बीमारी से पीड़ित हैं, मधुमेह के मरीज हैं या जिन्हें समय पर नियमित दवाइयां खानी पड़ती हैं, उन्हें अंधानुकरण में निर्जला उपवास रखने से बचना चाहिए. स्वास्थ्य विशेषज्ञों और चिकित्सकों की स्पष्ट राय है कि दवा लेने वाले या अस्वस्थ व्यक्तियों को बिना चिकित्सकीय परामर्श के लंबे समय तक भूखा-प्यासा नहीं रहना चाहिए.
पतियों द्वारा करवा चौथ का उपवास रखना रिश्तों में आ रही साझीदारी और भावनात्मक परिपक्वता का स्पष्ट परिचायक है. पुराने समय में जहां इस पर्व पर केवल महिला के एकतरफा त्याग और समर्पण को रेखांकित किया जाता था, वहीं अब इसे परस्पर भावनाओं की कद्र करने के संतुलन के रूप में देखा जा रहा है. इसका तात्पर्य यह कतई नहीं है कि प्रत्येक पति के लिए उपवास रखना अनिवार्य है. हर दांपत्य में स्नेह और आदर व्यक्त करने की पद्धतियां भिन्न हो सकती हैं. कुछ लोग उपवास रखकर अपनी भावनाएं व्यक्त करते हैं, तो कुछ पति दिनभर पत्नी के घरेलू कार्यों में हाथ बंटाकर, उसकी शारीरिक थकान का ध्यान रखकर और पूजा के प्रबंध में साथ खड़े रहकर अपना समर्पण प्रकट करते हैं.



















