बिहार के लखीसराय जिले में स्थित ऐतिहासिक और धार्मिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण अशोकधाम मंदिर इन दिनों एक दुखद हादसे को लेकर चर्चा में है। भगवान शिव के प्रमुख आस्था केंद्रों में गिने जाने वाले इस मंदिर को इंद्रदमनेश्वर महादेव मंदिर के नाम से भी जाना जाता है। सावन के पवित्र महीने और विशेष तौर पर सावन सोमवार के पावन अवसर पर यहां दूर-दूर से भारी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं और भगवान शिव का जलाभिषेक कर मन्नतें मांगते हैं। जिला प्रशासन की ओर से भी यह बात साझा की गई है कि सावन और शिवरात्रि जैसे बड़े धार्मिक पर्वों पर मंदिर परिसर में भक्तों का भारी सैलाब उमड़ता है। हालांकि, इसी मंदिर में आज श्रद्धालुओं की अत्यधिक भीड़ के बीच एक दर्दनाक भगदड़ मच गई। ताजा जानकारी के मुताबिक, इस दुखद हादसे में 7 श्रद्धालुओं की जान चली गई है, जबकि 12 से अधिक लोग घायल बताए जा रहे हैं। जब बड़ी संख्या में भक्त जलाभिषेक के लिए आगे बढ़ रहे थे, तभी अचानक भीड़ का दबाव बढ़ गया और भगदड़ जैसी अफरा-तफरी की स्थिति पैदा हो गई। प्रशासनिक अमले द्वारा तुरंत घायलों को इलाज के लिए नजदीकी अस्पताल पहुंचाया गया है और मौके पर राहत एवं बचाव का कार्य लगातार जारी है।
गिल्ली-डंडा खेलते समय सामने आया था विशाल शिवलिंग
अशोकधाम मंदिर के इतिहास के पन्ने बेहद रोचक और हैरान करने वाले हैं। बिहार सरकार और लखीसराय जिला प्रशासन के आधिकारिक विवरणों के अनुसार, 7. अप्रैल 1977 को अशोक नाम के एक छोटे से लड़के ने गिल्ली-डंडा खेलते हुए जमीन के नीचे हजारों-लाखों साल पुराने एक विशाल शिवलिंग को पहली बार देखा था। इस अनोखी और चमत्कारी खोज के बाद इस पाउंड और स्थान पर भव्य मंदिर का निर्माण कराया गया और उसी बच्चे अशोक के नाम पर इस पवित्र स्थल का नाम अशोकधाम पड़ गया। समय के साथ यह स्थान केवल एक स्थानीय खोज से बढ़कर पूरे राज्य के शिव भक्तों के लिए बड़ा आस्था केंद्र बन गया।
साल 1993 में हुआ था भव्य मंदिर परिसर का पुनर्निर्माण
इस मंदिर के इतिहास से जुड़ी स्थानीय मान्यताएं इस जगह को प्राचीन शिव उपासना का एक बहुत बड़ा केंद्र बताती हैं। कई ऐतिहासिक और धार्मिक स्रोतों में इस बात का उल्लेख मिलता है कि यहां पाल काल के समय से ही भगवान शिव की पूजा-अर्चना करने की एक लंबी परंपरा चली आ रही है। अशोकधाम के वर्तमान और आधुनिक मंदिर परिसर के पुनर्निर्माण का उद्घाटन 11. फरवरी 1993 को जगन्नाथपुरी के शंकराचार्य के कर-कमलों द्वारा संपन्न हुआ था। आज की तारीख में इस विशाल मंदिर परिसर में केवल भगवान शिव ही नहीं, बल्कि माता पार्वती, नंदी महाराज और देवी दुर्गा के भी भव्य मंदिर स्थापित हैं, जो यहां आने वाले भक्तों को आकर्षित करते हैं।
हिंदू धर्म में सावन के पूरे महीने को देवाधिदेव महादेव भगवान शिव को समर्पित माना जाता है। सावन के हर सोमवार को शिव भक्त कठोर व्रत रखते हैं और मंदिर जाकर शिवलिंग पर जल, पवित्र गंगाजल, बेलपत्र तथा अन्य पारंपरिक पूजन सामग्री अर्पित करते हैं। ऐसी दृढ़ मान्यता है कि सावन सोमवार के दिन पूरी सच्ची श्रद्धा और नियम के साथ भगवान शिव की पूजा करने से भक्तों की सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं और जीवन में सुख-समृद्धि का आशीर्वाद प्राप्त होता है। अशोकधाम में सावन के पूरे महीने के दौरान देश के कोने-कोने से श्रद्धालु पहुंचकर बाबा इंद्रदमनेश्वर महादेव का जलाभिषेक करते हैं। यही मुख्य वजह है कि सावन सोमवार के दिन मंदिर परिसर में पैर रखने की भी जगह नहीं बचती और भारी भीड़ देखने को मिलती है।
बिहार का मिनी बाबा धाम और उससे जुड़ी गहरी आस्था
अशोकधाम की पहचान केवल एक सामान्य प्राचीन धार्मिक स्थल के रूप में ही नहीं है, बल्कि इसके विशालकाय शिवलिंग और उससे जुड़ी चमत्कारी आस्था की कहानी इसे खास बनाती है। स्थानीय स्तर पर इसे बिहार के सबसे प्रमुख शिवधामों में शुमार किया जाता है और कई भक्त इसे आदर के साथ ‘बिहार का बाबाधाम’ भी पुकारते हैं। सावन सोमवार के विशेष अवसर पर यहां भगवान शिव के दिव्य दर्शन पाने और जलाभिषेक करने के लिए भक्तों का सैलाब उमड़ पड़ता है। ऐसे में लाखों श्रद्धालुओं की सुरक्षा, सुचारू भीड़ प्रबंधन और चाक-चौबंद प्रशासनिक व्यवस्था मंदिर प्रशासन और सरकार के लिए बेहद महत्वपूर्ण हो जाती है ताकि किसी भी तरह की अनहोनी से बचा जा सके।
इंद्रदमनेश्वर महादेव मंदिर यानी अशोकधाम की मुख्य विशेषताएं
अद्भुत खोज (7 अप्रैल 1977): इस अत्यंत विशाल शिवलिंग की खोज किसी बड़े पुरातत्व विभाग ने नहीं की थी, बल्कि अशोक नाम के एक बच्चे ने गिल्ली-डंडा का खेल खेलते समय की थी। इसी अनोखी घटना के कारण इस पूरे स्थान का नाम ‘अशोकधाम’ पड़ा।
विशालकाय शिवलिंग: मंदिर के गर्भगृह में स्थापित मुख्य शिवलिंग काले बलुआ पत्थर से बना है, जो आकार में बेहद विशाल और अद्भुत है। इसे पौराणिक राजा इंद्रद्युम्न के काल का माना जाता है, जिस वजह से इसे ‘इंद्रदमनेश्वर महादेव’ के नाम से भी जाना जाता है।
पाल वंश से जुड़ा गौरवशाली इतिहास: ऐतिहासिक और पुरातात्विक साक्ष्यों के अनुसार, यह धार्मिक स्थल प्राचीन पाल वंश के शासनकाल का एक बहुत बड़ा और महत्वपूर्ण केंद्र रहा है।
मिनी बाबा धाम के रूप में ख्याति: सावन सोमवार के पावन दिनों के दौरान लखीसराय के इस प्रसिद्ध मंदिर को ‘मिनी बाबा धाम’ कहा जाता है, जहां लाखों की संख्या में श्रद्धालु अपनी मन्नतें लेकर जल चढ़ाने आते हैं।


















