गणेश चतुर्थी के महानिपावन अवसर से ठीक एक दिन पहले राजस्थान की राजधानी जयपुर में स्थित विश्वप्रसिद्ध मोती डूंगरी गणेश मंदिर में सिंजारा उत्सव की अद्भुत छटा देखने को मिली। इस पारंपरिक रस्म के साक्षी बनने और प्रसाद के रूप में पवित्र मेहंदी प्राप्त करने के लिए अलसुबह से ही श्रद्धालुओं की भारी भीड़ मंदिर परिसर के बाहर एकत्र होने लगी। विशेष रूप से अविवाहित युवक-युवतियों में इस प्रसाद को लेकर गहरा उत्साह देखा गया। पुरानी धार्मिक मान्यताओं के अनुसार मोती डूंगरी मंदिर से प्राप्त मेहंदी को हाथों पर रचाने से शीघ्र विवाह के योग बनते हैं और विवाह के मार्ग में आने वाली सभी अड़चनें तथा रुकावटें समाप्त हो जाती हैं।
सिंजारा परंपरा और मेहंदी प्रसाद की गहरी धार्मिक मान्यता
जयपुर शहर में सिंजारा की प्रथा शताब्दियों पुरानी सांस्कृतिक एवं धार्मिक परंपरा का हिस्सा रही है। स्थानीय रीति-रिवाजों के अनुसार परिवार में किसी नए बच्चे के जन्म होने अथवा नई शादी संपन्न होने पर देवताओं को नए वस्त्र और मेहंदी अर्पित करने का विधान है। गणेश चतुर्थी महोत्सव की शुरुआत से पूर्व निभाई जाने वाली यह सिंजारा रस्म अब मंदिर के मुख्य आकर्षणों में से एक बन चुकी है। श्रद्धालुओं के बीच यह दृढ विश्वास है कि सिंजारा के दिन मंदिर में आकर जो भी मनौतियां मांगी जाती हैं, भगवान गणेश उन्हें अवश्य पूर्ण करते हैं।
ज्योतिषीय एवं सांस्कृतिक परंपराओं में मेहंदी का सीधा संबंध मांगलिक कार्यों और विवाह से माना गया है। ऐसे युवा जो विवाह योग्य हैं अथवा जिनके रिश्ते तय होने में लंबे समय से विलंब हो रहा है, वे इस पवित्र मेहंदी को विशेष आस्था के साथ प्राप्त करते हैं। जनश्रुति और मंदिर की मान्यताओं के अनुसार यदि योग्य व्यक्ति इस मेहंदी को अपने हाथों पर लगाता है, तो एक वर्ष की समयावधि के भीतर उसका विवाह संपन्न हो जाता है। इसी कारण से इस दिन बांटे जाने वाले इस मेहंदी प्रसाद को ही मुख्य और सबसे महत्वपूर्ण प्रसाद माना जाता है।
3500 किलो मेहंदी और आठ विशेष वितरण केंद्र
इस वर्ष सिंजारा की रस्म को विशाल स्तर पर आयोजित किया गया, जिसके लिए मंदिर प्रशासन द्वारा 3500 किलोग्राम विशेष मेहंदी की व्यवस्था की गई थी। भगवान गणेश को सर्वप्रथम यह मेहंदी विधि-विधान से अर्पित की गई और उसके उपरांत ही इसे आम श्रद्धालुओं में बांटने की प्रक्रिया आरंभ हुई। मंदिर में आने वाले विशाल जनसैलाब को ध्यान में रखते हुए मंदिर परिसर के भीतर आठ अलग-अलग स्थानों पर वितरण केंद्र स्थापित किए गए थे ताकि किसी भी श्रद्धालु को असुविधा का सामना न करना पड़े और कोई भी भक्त बिना प्रसाद के खाली हाथ वापस न लौटे।
सिंजारा के इस पावन पर्व पर मोती डूंगरी मंदिर में आस्था का सैलाब केवल जयपुर या राजस्थान तक ही सीमित नहीं रहा। पड़ोसी राज्यों जैसे हरियाणा, गुजरात और पंजाब से भी बड़ी संख्या में युवक-युवतियां मेहंदी प्रसाद प्राप्त करने के लिए जयपुर पहुंचे। गणेश चतुर्थी के साथ ही दस दिवसीय गणेशोत्सव का भव्य शुभारंभ हो जाता है, जिसका समापन अनंत चतुर्दशी के दिन प्रतिमा विसर्जन के साथ होता है। श्रद्धालु अपने जीवन में सुख, शांति, समृद्धि और विघ्नों से मुक्ति पाने की कामना के साथ विघ्नहर्ता भगवान श्री गणेश की आराधना करते हैं।
भगवान गणेश का दिव्य अलौकिक श्रृंगार
सिंजारा उत्सव के अवसर पर मोती डूंगरी गणेश मंदिर में स्थापित भगवान गणेश की प्रतिमा का अत्यंत दर्शनीय और अलौकिक श्रृंगार किया गया। भगवान को विशेष रूप से तैयार की गई भव्य पोशाक पहनाई गई। इसके साथ ही उन्हें बहुमूल्य स्वर्ण मुकुट, प्रसिद्ध नौलखा हार और सुंदर आभूषणों से सुसज्जित किया गया। भगवान गणेश को एक भव्य चांदी के सिंहासन पर विराजमान कराया गया, जिसके दर्शन कर श्रद्धालु भावविभोर हो उठे। मंदिर परिसर भगवान के जयकारों और वैदिक मंत्रोच्चार से गूंज उठा।
मोती डूंगरी गणेश मंदिर का 500 साल पुराना इतिहास
जयपुर का मोती डूंगरी गणेश मंदिर केवल आस्था का केंद्र ही नहीं, बल्कि ऐतिहासिक विरासत का भी अनूठा प्रतीक है। इस मंदिर का समृद्ध इतिहास लगभग 500 वर्ष पुराना माना जाता है। मंदिर की स्थापना से जुड़ी कथा के अनुसार, भगवान गणेश की यह चमत्कारिक प्रतिमा मूल रूप से राजस्थान के मावली क्षेत्र से लाई गई थी। प्रतिमा को एक बैलगाड़ी में रखकर जयपुर लाया जा रहा था। धार्मिक संकल्प के अनुसार यह तय किया गया था कि यात्रा के दौरान बैलगाड़ी जिस स्थान पर स्वयं रुक जाएगी, वहीं भगवान गणेश की स्थापना कर दी जाएगी।
जब बैलगाड़ी मोती डूंगरी पहाड़ी के निचले इलाके में आकर रुकी, तो उसी पवित्र स्थल पर प्रतिमा की स्थापना का निर्णय लिया गया। इसके बाद मोती डूंगरी पहाड़ी की तलहटी में मंदिर का निर्माण कराया गया। इतिहासकार बताते हैं कि वर्तमान मंदिर संरचना का निर्माण 18वीं शताब्दी में प्रसिद्ध सेठ जय राम पालीवाल के कुशल मार्गदर्शन और देखरेख में संपन्न हुआ था। अपनी अद्वितीय वास्तुकला और विशिष्ट धार्मिक आयोजनों के कारण यह मंदिर संपूर्ण राजस्थान और देशभर के श्रद्धालुओं की अगाध श्रद्धा का प्रमुख केंद्र बना हुआ है।



















