मथुरा से महज 20 किलोमीटर की दूरी पर यमुना नदी के तट पर बसा रावल गांव द्वापर युग की अनेक ऐतिहासिक घटनाओं का साक्षी रहा है। यह स्थान राधा रानी की जन्मभूमि के रूप में विख्यात है, जहां उनके पिता राजा वृषभान का शासन हुआ करता था। राजा वृषभान को उस कालखंड का सबसे शक्तिशाली और धनी राजा माना जाता था। उनकी समृद्धि का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि उस समय के पूरे बृज क्षेत्र में उनके प्रभाव और अनुमति के बिना कोई भी महत्वपूर्ण कार्य संपन्न नहीं होता था।
राजा वृषभान का शासन और रावल का महत्व
ऐतिहासिक मान्यताओं के अनुसार, राधा रानी के पिता राजा वृषभान न केवल एक सक्षम शासक थे बल्कि अपनी प्रजा और अपनी पुत्री के प्रति अत्यंत स्नेह रखने वाले व्यक्ति भी थे। स्थानीय मान्यताओं और धार्मिक परंपराओं के अनुसार, जब भी राधा रानी अपने पिता के पास उपस्थित होती थीं, तो राजा वृषभान का मन असीम आनंद से भर जाता था। उनके शासनकाल में रावल गांव एक समृद्ध केंद्र के रूप में विकसित हुआ, जहां राधा रानी अपनी सखियों के साथ यमुना तट पर क्रीड़ा किया करती थीं। उनकी उपस्थिति राजा के लिए सदैव प्रसन्नता का स्रोत रही।
11 लाख गायों के स्वामी थे राजा वृषभान
राजा वृषभान की आर्थिक शक्ति का मुख्य आधार उनका पशुधन था। मंदिर के सेवायत पुजारी राहुल पंडित के अनुसार, राजा वृषभान के पास कुल 11 लाख गायें थीं, जिनका पालन-पोषण वे अत्यंत कुशलता से किया करते थे। यह उस काल में सबसे बड़ी संख्या मानी जाती थी। उनकी तुलना अक्सर नंद बाबा से की जाती है, जिनके पास उस समय 9 लाख गायें थीं। रोचक तथ्य यह है कि राजा वृषभान और नंद बाबा के बीच गहरी मित्रता थी। जहां नंद बाबा गोकुल का संचालन करते थे, वहीं राजा वृषभान रावल में अपना शासन संभालते थे। अपनी अपार गो-संपदा और उदार व्यक्तित्व के कारण, उन्हें बृज क्षेत्र का सबसे बड़ा गोपालक और शासक माना जाता है, जिनकी ख्याति आज भी इस क्षेत्र के जन-जन में सुरक्षित है।











