राजस्थान की पावन धरा अपनी ऐतिहासिक विरासतों, शूरवीरों के शौर्य और जीवंत लोक संस्कृति के लिए दुनिया भर में प्रसिद्ध है। हालांकि, इस ऐतिहासिक भूमि की पहचान केवल किलों और महलों तक ही सीमित नहीं है, बल्कि यह एक ऐसी समृद्ध संत परंपरा की भी साक्षी रही है जिसने समय की सीमाओं को लांघकर देश के कोने-कोने में अपनी आध्यात्मिक सुगंध बिखेरी है। इसी गौरवमयी संत परंपरा का एक चमकता सितारा है निरंजनी संप्रदाय, जिसकी शुरुआत आज से लगभग पांच शताब्दी पहले नागौर जिले के डीडवाना से हुई थी। आज यह संप्रदाय राजस्थान की सीमाओं को पार कर गुजरात, हरियाणा, पंजाब, मध्यप्रदेश, उत्तरप्रदेश, बिहार और झारखंड समेत देश के दस से अधिक राज्यों में अपनी साधना, वैराग्य और अनन्य भक्ति की परंपरा का प्रचार-प्रसार कर रहा है। वर्तमान समय में इस संप्रदाय की मुख्य गद्दी का संचालन संत सांवरदास महाराज द्वारा किया जा रहा है, जो इसकी प्राचीन परंपराओं को आगे बढ़ा रहे हैं।
डाकू हरिसिंह से स्वामी हरिदास महाराज बनने का सफर
निरंजनी संप्रदाय की स्थापना की कहानी अत्यंत रोचक और प्रेरणादायी है। इस संप्रदाय के प्रवर्तक स्वामी हरिदास महाराज के प्रारंभिक जीवन का नाम हरिसिंह था। लोककथाओं और क्षेत्रीय जनश्रुतियों में इस बात का उल्लेख मिलता है कि वे अपने शुरुआती जीवन में एक डाकू हुआ करते थे। परंतु, उनके जीवन में एक बड़ा बदलाव तब आया जब वे गुरु गोरखनाथ के सान्निध्य में आए। गुरु गोरखनाथ की संगति ने उनके भीतर के अज्ञान को दूर किया और उनके जीवन की पूरी दिशा ही बदल दी। सांसारिक सुखों और मोह-माया का पूरी तरह परित्याग कर उन्होंने कठोर तपस्या, योग साधना और गहन आत्मचिंतन का मार्ग अपनाया। इस कठिन साधना के बल पर जब उन्हें आध्यात्मिक सिद्धि प्राप्त हुई, तो उन्होंने एक निराकार ब्रह्म की उपासना पर केंद्रित निरंजनी संप्रदाय की नींव रखी। इस संप्रदाय का मूल संदेश बाहरी आडंबरों और रूढ़ियों से दूर रहकर ईश्वर के निर्गुण स्वरूप की आराधना करना है।
सांखला राजपूत परिवार में जन्म और लोककल्याण का मार्ग
इतिहासकारों और संप्रदाय के दस्तावेजों के अनुसार, स्वामी हरिदास महाराज का जन्म विक्रम संवत 1512 में डीडवाना से करीब पांच किलोमीटर की दूरी पर बसे कापड़ोद गांव में हुआ था। उनका जन्म एक सांखला राजपूत परिवार में हुआ था। ज्ञान प्राप्ति के पश्चात उन्होंने अपना पूरा जीवन जनकल्याण, समाज सुधार, साधना और अध्यात्म के संदेश को जन-जन तक पहुँचाने में समर्पित कर दिया। उन्होंने समाज को पाखंड से दूर रहकर सीधे ईश्वर से जुड़ने का मार्ग दिखाया, जिससे समाज के हर वर्ग के लोग उनसे जुड़ते चले गए और यह संप्रदाय व्यापक रूप से फैलता गया।
गाढ़ाधाम दयाल बगीची और गुदड़ी मेला का उत्सव
स्वामी हरिदास महाराज ने 88 वर्ष की लंबी आयु तक समाज को नई राह दिखाई और विक्रम संवत 1600 की फाल्गुन शुक्ल षष्ठी को वे ब्रह्मलीन हो गए, जहाँ उन्होंने समाधि ली। आज उनका यह पवित्र समाधि स्थल गाढ़ाधाम दयाल बगीची के नाम से जाना जाता है और इसे निरंजनी संप्रदाय के सबसे बड़े और प्रमुख तीर्थ स्थल के रूप में पूजा जाता है। हर साल यहाँ फाल्गुन शुक्ल एकादशी के पावन अवसर पर भव्य 'गुदड़ी मेला' आयोजित किया जाता है, जो इस संप्रदाय का सबसे प्रमुख और विशाल धार्मिक उत्सव है। इस मेले में देश के कोने-कोने से बड़ी संख्या में साधु-संत और हजारों की तादाद में श्रद्धालु डीडवाना पहुँचते हैं। कई दिनों तक चलने वाले इस मेले में रामनाम संकीर्तन, हरिकीर्तन, ज्ञानवर्धक सत्संग और आध्यात्मिक प्रवचनों की अमृत वर्षा होती है। समाधि स्थल पर मत्था टेककर लोग गुरु परंपरा के प्रति अपनी गहरी श्रद्धा और विश्वास व्यक्त करते हैं। पांच सौ वर्षों का समय बीत जाने के बाद भी यह दिव्य परंपरा आज भी पूरी जीवंतता के साथ कायम है और डीडवाना की यह पावन विरासत पूरे देश को आलोकित कर रही है।











