मध्य प्रदेश के सागर जिले में स्थित श्री देव भूतेश्वर महादेव मंदिर अपनी अनोखी धार्मिक परंपराओं और ऐतिहासिक महत्व के लिए पूरे क्षेत्र में विशेष पहचान रखता है। श्रावण मास के पावन अवसर पर यहां भगवान शिव का एक खास अनुष्ठान आयोजित किया जाता है, जिसे असाध्य रोग शांति औषधि अभिषेक नाम दिया गया है। इस दौरान प्रतिदिन महादेव का जल और दूध के साथ-साथ अनेक आयुर्वेदिक जड़ी-बूटियों से श्रृंगार एवं अभिषेक किया जाता है। माना जाता है कि शिव ही समस्त औषधियों के स्वामी हैं और इस तरह के पूजन से शारीरिक व्याधियों के शमन के साथ-साथ मानसिक शांति और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। इस विशेष धार्मिक आयोजन में हिस्सा लेने के लिए सागर शहर और आसपास के इलाकों से भारी संख्या में श्रद्धालु मंदिर परिसर में पहुंच रहे हैं।
हजार साल पुराना इतिहास और उत्तर मुखी शिवलिंग की विशेषता
सागर जिले में यह अकेला ऐसा शिव मंदिर है जहां स्थापित शिवलिंग उत्तर दिशा की ओर मुख किए हुए है। धार्मिक मान्यताओं में उत्तर मुखी शिवलिंग को अत्यंत फलदायी और शुभ माना जाता है। हालांकि इस प्राचीन स्थल का स्पष्ट लिखित दस्तावेज उपलब्ध नहीं है, लेकिन उपलब्ध साक्ष्यों तथा नाथ संप्रदाय से जुड़े ऐतिहासिक तथ्यों के आधार पर इसे लगभग 1000 वर्ष पुराना माना जाता है।
मंदिर परिसर के नामकरण के पीछे भी एक बेहद दिलचस्प ऐतिहासिक कारण जुड़ा हुआ है। प्राचीन समय में यह संपूर्ण क्षेत्र एक वीरान और घने जंगल से घिरा हुआ था तथा मंदिर के ठीक बगल में श्मशान घाट मौजूद था। रात के समय अंधेरा घिरते ही लोग इस स्थान पर आने से डरते थे और इसे भूतों का स्थान मानने लगे थे। इसी वजह से स्थानीय निवासियों ने यहां विराजमान शिव प्रतिमा को भूतों के देव यानी भूतेश्वर महादेव कहना शुरू कर दिया। धीरे-धीरे समय बीतने के साथ यह पावन धाम श्री देव भूतेश्वर के नाम से प्रसिद्ध हो गया और आज यह क्षेत्र में अगाध श्रद्धा का केंद्र बना हुआ है।
20 से अधिक दुर्लभ जड़ी-बूटियों से किया जाता है भगवान का अभिषेक
सावन के पवित्र महीने में मंदिर परिसर के अंदर सुबह से ही वैदिक मंत्रोच्चार की गूंज सुनाई देती है। असाध्य रोगों से मुक्ति और आरोग्य लाभ की कामना से किए जाने वाले इस अभिषेक में 20 से भी अधिक विशेष प्राकृतिक पदार्थों एवं जड़ी-बूटियों का इस्तेमाल होता है। इनमें मुख्य रूप से गिलोय, भांग, अमरबेल, बरगद, पीपल, नीम, मीठी नीम, पान के पत्ते, कच्ची हल्दी, शुद्ध शहद, त्रिफला, बाला, अतिबाला, अश्वगंधा, निर्गुंडी, वच, जटामांसी, पुनर्नवा, दारुहल्दी, शिलाजीत, अर्जुन की छाल, कचनार, ताजे फलों के रस तथा मधुरस शामिल हैं।
इन सभी दिव्य औषधियों को मिलाकर जब भगवान भोलेनाथ का पूजन किया जाता है, तो उससे उत्पन्न होने वाले वातावरण को अत्यंत पवित्र माना गया है। जो श्रद्धालु स्वयं अपनी ओर से यह विशेष आयुर्वेदिक स्नान कराना चाहते हैं, उनके लिए मंदिर प्रबंधन द्वारा सरल व्यवस्था की गई है। कोई भी यजमान एक दिन पूर्व रसीद कटवाकर निर्धारित समय पर विद्वान आचार्यों के साथ वैदिक मंत्रों के बीच इस पवित्र अनुष्ठान को पूरा कर सकता है।
औषधीय प्रसाद का वितरण और पर्यावरण संरक्षण का संदेश
अभिषेक प्रक्रिया संपन्न होने के उपरांत इस्तेमाल की गई सभी जड़ी-बूटियों को निष्ठापूर्वक और स्वच्छता के साथ एकत्रित किया जाता है। मंदिर समिति के पदाधिकारियों के अनुसार इन प्रयुक्त औषधियों को अत्यंत पवित्र माना जाता है, इसलिए इन्हें फेंका नहीं जाता। इसके बजाय एकत्रित सामग्री को श्रद्धालुओं के बीच प्रसाद के रूप में बांटा जाता है, ताकि लोग इसका सेवन कर आरोग्य प्राप्त कर सकें।
इसके साथ ही कुछ औषधीय पौधों एवं बीजों का उपयोग मंदिर परिसर में ही पौधारोपण के लिए किया जाता है। इस पहल का मुख्य उद्देश्य समाज में आयुर्वेद की महत्ता को रेखांकित करने के साथ-साथ प्रकृति एवं पर्यावरण के संरक्षण का संदेश फैलाना है। मंदिर समिति के कोषाध्यक्ष विकास तिवारी का कहना है कि यह आयोजन केवल एक धार्मिक कर्मकांड तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सनातन परंपरा में प्रकृति, आयुर्वेद और अध्यात्म के बीच बने अनूठे तालमेल की मिसाल है।
400 साल पुरानी समाधि, प्राचीन बावड़ी और 30 वर्षों से जारी अखंड संकीर्तन
श्री देव भूतेश्वर मंदिर परिसर न केवल धार्मिक अनुष्ठानों के लिए बल्कि अपनी कई ऐतिहासिक धरोहरों के लिए भी जाना जाता है। मंदिर प्रांगण में 400 वर्ष पुरानी संत मस्तराम बाबा की पावन समाधि स्थित है, जो यहां अतीत में निवास करते थे। इसके अतिरिक्त परिसर में एक प्राचीन बावड़ी भी विद्यमान है, जिसके बारे में कहा जाता है कि यह लगभग 700 साल पुरानी है और आज भी बीते युग की स्थापत्य कला की गवाही देती है।
इस मंदिर प्रांगण की एक और सबसे बड़ी खासियत यहां पिछले तीन दशकों से लगातार बिना रुके चल रहा हरि नाम संकीर्तन है। पिछले 30 वर्षों से यहां अखंड गौरी शंकर सीताराम नाम का जाप 24 घंटे लगातार गूंज रहा है। दिन हो या रात, शहर के श्रद्धालु और स्थानीय लोग बारी-बारी से आकर इस अखंड संकीर्तन में अपनी हाजिरी लगाते हैं और भजन-कीर्तन का हिस्सा बनते हैं।
गुलाब बाबा ट्रस्ट द्वारा धौलपुर पत्थरों से कराया जा रहा भव्य निर्माण
श्रद्धालुओं की बढ़ती संख्या और मंदिर के धार्मिक महत्व को ध्यान में रखते हुए अब इसके जीर्णोद्धार एवं विशाल निर्माण का कार्य चल रहा है। गुलाब बाबा ट्रस्ट के मार्गदर्शन में पिछले 4 वर्षों से मंदिर का कायाकल्प किया जा रहा है। इस संपूर्ण पुननिर्माण परियोजना को पूरा होने में लगभग 4 वर्ष का समय और लगने का अनुमान जताया गया है।
नए निर्माण कार्य में राजस्थान के प्रसिद्ध धौलपुर पत्थरों का उपयोग किया जा रहा है, जिससे मंदिर को एक भव्य और पारंपरिक स्वरूप दिया जा सके। वर्तमान समय में मंदिर का मुख्य गर्भगृह 9 फीट चौड़ा और 9 फीट लंबा है, जो श्रद्धालुओं की भीड़ के लिहाज से काफी छोटा पड़ता है। नई निर्माण योजना के तहत गर्भगृह के आकार को बढ़ाकर 18 फीट बाय 18 फीट किया जा रहा है। इस विस्तार से भविष्य में मंदिर में आने वाले भक्तों को बिना किसी असुविधा के सुगमता पूर्वक दर्शन पूजन करने की सुविधा मिल सकेगी।



















