राजस्थान के सीकर जिले के लक्ष्मणगढ़ कस्बे में स्थित शिखरबंद महादेव मंदिर आस्था, परंपरा और सांस्कृतिक धरोहर का एक अनूठा प्रतीक है। 133 वर्ष से भी अधिक पुराने इस पावन शिवधाम में महाशिवरात्रि पर्व के दौरान तड़के से लेकर देर रात तक भक्तों का तांता लगा रहता है। इस ऐतिहासिक मंदिर की अपनी अलग पहचान है, जहां धार्मिक अनुष्ठानों के साथ-साथ प्राचीन विरासत का संगम देखने को मिलता है।
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और प्राण प्रतिष्ठा का इतिहास
इस भव्य मंदिर की नींव करीब 133 साल पहले कस्बे के प्रतिष्ठित चूड़ीवाला महाजन परिवार के सेठ शिवचंदराय चूड़ीवाला और उनके भाई रामसहाय चूड़ीवाला ने रखी थी। मंदिर में धार्मिक रीति-रिवाजों के अनुसार प्राण प्रतिष्ठा का कार्य विक्रम संवत 1975 में सुखदेव पंडित द्वारा संपन्न कराया गया था, जो पूर्व पालिकाध्यक्ष रामाकिशन पंडित के दादा थे। उस समय रावराजा माधोसिंह के निर्देशों पर नियमित पूजा-पाठ के लिए बानूड़ा से पंडित परिवार को विशेष रूप से लक्ष्मणगढ़ लाया गया था और उनके रहने की पूरी व्यवस्था की गई थी।
वास्तुकला की दृष्टि से यह मंदिर क्षेत्र में अपना एक अलग स्थान रखता है। दक्षिण भारतीय शैली में निर्मित इसकी शिखरबंद संरचना के कारण ही इसे यह नाम मिला, क्योंकि अपने समय में यह इस उपखंड का पहला ऐसा मंदिर था जिस पर शिखर का निर्माण किया गया था। श्रद्धालु इसे प्यार से सिकरीबंद शिवालय भी कहते हैं। मंदिर के गर्भगृह में स्थापित शिवलिंग का निर्माण प्रसिद्ध रामेश्वरम मंदिर की तर्ज पर किया गया माना जाता है।
1188 रुद्राक्षों की प्राचीन मालाएं और चंदन श्रृंगार
मंदिर परिसर में सैकड़ों साल पुरानी दो अत्यंत दुर्लभ रुद्राक्ष मालाएं सुरक्षित रखी गई हैं। इन मालाओं में कुल 1188 रुद्राक्ष पिरोए हुए हैं, जिनका उपयोग आज भी महामृत्युंजय मंत्र और विष्णुसहस्रनाम के नियमित जाप के लिए किया जाता है। इस मंदिर की एक और दुर्लभ विशेषता यहां का विशेष श्रृंगार है। खास धार्मिक अवसरों पर महादेव के शिवलिंग पर चंदन के लेप से अद्भुत और आकर्षक आकृतियां उकेरी जाती हैं, जो अन्य मंदिरों में कम ही देखने को मिलती हैं।
युवाओं की सेवा भावना और नियमित धार्मिक अनुष्ठान
मंदिर की व्यवस्थाओं में स्थानीय युवाओं का योगदान सराहनीय रहता है। स्वच्छता बनाए रखने, पूजन सामग्री की व्यवस्था करने, बगीचे में पक्षियों के लिए दाना-पानी का प्रबंध करने से लेकर बड़े आयोजनों के प्रबंधन तक की जिम्मेदारी युवा संभालते हैं। मंदिर में हर शाम आरती के बाद सामूहिक स्वर में शिव मानस पूजा, शिव तांडव स्तोत्र और रुद्राष्टक का पाठ किया जाता है।
बुजुर्ग, महिलाएं और बच्चे जल व दूध से भगवान भोलेनाथ का अभिषेक करते हैं। धार्मिक मान्यता है कि महाशिवरात्रि के पावन अवसर पर यहां आकर विशेष पूजा-अर्चना करने से भक्तों के सभी अटके हुए कार्य पूर्ण हो जाते हैं। यही वजह है कि यहां विशेष रूप से कुंवारी कन्याएं भी बड़ी संख्या में मनोकामनाएं लेकर पहुंचती हैं।



















