शिवपुरी जिले के घने जंगलों के बीच एक ऐसा प्राचीन मंदिर बसा है, जिसकी जड़ें सीधे महाभारत काल से जुड़ी बताई जाती हैं। जिला मुख्यालय से करीब 30 किलोमीटर दूर स्थित 20-भुजी माता मंदिर सिर्फ अपनी पुरानी परंपरा के लिए नहीं, बल्कि उन चमत्कारी घटनाओं के लिए भी चर्चा में रहता है, जो विज्ञान की समझ से परे मानी जाती हैं। कहा जाता है कि अज्ञातवास के दौरान पांडवों ने इसी स्थान पर आकर माता की विशेष पूजा-अर्चना की थी। आइए इस मंदिर से जुड़े उन रहस्यों को करीब से जानते हैं, जिन्हें सुनकर आज भी लोग हैरान रह जाते हैं।
महाभारत काल से पांडवों तक का नाता
यह मंदिर सैकड़ों साल पुराना बताया जाता है। स्थानीय मान्यताओं और ऐतिहासिक संकेतों के अनुसार, महाभारत काल में जब पांडव अज्ञातवास काट रहे थे, तब उन्होंने इसी घने इलाके की पहाड़ी पर शरण ली थी और यहीं माता की आराधना की थी। सिर्फ पांडव ही नहीं, मध्यकाल में पथरीगढ़ के प्रतापी राजा ज्वाला सिंह भी नियमित रूप से यहां पहुंचकर माता की सेवा करते थे और आशीर्वाद लेते थे। आज भी पहाड़ी के आसपास बिखरे कई अवशेष इस पुराने इतिहास की गवाही देते नजर आते हैं।
20 भुजाओं को गिनना आसान नहीं
गांव वालों और यहां आने वाले श्रद्धालुओं का कहना है कि माता की मूर्ति से जुड़ा एक ऐसा चमत्कार है, जिसे विज्ञान भी नहीं सुलझा पाया। कोई भी सामान्य व्यक्ति माता की 20 भुजाओं को सीधे गिनने की कोशिश करे तो गिनती हर बार गड़बड़ा जाती है। स्थानीय लोगों का दावा है कि जो भक्त पूरी श्रद्धा से माता को नारियल चढ़ाता है, सिर्फ वही सभी 20 भुजाओं को साफ-साफ गिन पाता है। हर भुजा में माता ने अलग-अलग अस्त्र-शस्त्र धारण कर रखे हैं।
बिना प्राण-प्रतिष्ठा के खुद प्रकट हुईं माता
मंदिर के मुख्य पुजारी रामदास जी महाराज के मुताबिक, यह मध्य प्रदेश का शायद पहला ऐसा मंदिर है जहां माता की प्रतिमा की प्राण-प्रतिष्ठा किसी इंसान ने नहीं की, बल्कि माता खुद इस जगह पर प्रकट हुई थीं। बुजुर्ग बताते हैं कि पहले यहां मकोर यानी माफुर का एक पेड़ हुआ करता था, और उसी पेड़ के पास माता की यह दिव्य प्रतिमा प्रकट हुई थी। माता आखिर इस जगह तक कैसे पहुंचीं, यह सवाल आज भी अनसुलझा बना हुआ है।
12 महीने पानी से लबालब रहने वाला कुंड
पहले यह मंदिर घाटी के ऊपर बना हुआ था। उसी पुरानी संरचना के ठीक नीचे एक बेहद प्राचीन कुंड मौजूद है। इस कुंड की खासियत यह है कि तेज गर्मी के मौसम में भी यह कभी नहीं सूखता, बल्कि पूरे 12 महीने इसमें पानी भरा रहता है। मान्यता है कि इस पवित्र कुंड में स्नान करने से भक्तों की त्वचा से जुड़ी हर तरह की बीमारी हमेशा के लिए खत्म हो जाती है।
कैंसर तक से मुक्ति का दावा
माता के दरबार में सिर्फ आस्था नहीं, बल्कि अटूट भरोसे की कई कहानियां भी सुनने को मिलती हैं। स्थानीय निवासियों के मुताबिक, हाल ही में यहां एक ऐसी घटना सामने आई जिसने सबको चौंका दिया। कैंसर जैसी गंभीर और असाध्य बीमारी से जूझ रहे तीन लोग डॉक्टरों से उम्मीद टूटने के बाद माता के दरबार में पहुंचे थे। माता के आशीर्वाद और लगातार दर्शन के बाद वे पूरी तरह इस बीमारी से उबरकर स्वस्थ हो गए।
रन्नौद मठ से मिलते-जुलते पत्थर
इतिहासकारों और स्थानीय लोगों का मानना है कि इस मंदिर में लगे पत्थर और मशहूर रन्नौद मठ के पत्थर हूबहू एक जैसे हैं। इसी वजह से अंदाजा लगाया जाता है कि दोनों ऐतिहासिक इमारतें एक ही दौर में बनी होंगी। मध्यकाल में विदेशी हमलावरों ने इस प्राचीन मंदिर को भारी नुकसान पहुंचाया था, जिससे पुराने खंभे टूट-फूट गए थे। फिलहाल पहाड़ के नीचे एक भव्य नया मंदिर बनकर तैयार हो चुका है, जो पूरे जिले के लिए आस्था का बड़ा केंद्र बन गया है।
पहाड़ी पर दबा प्राचीन अनलपुर गांव
स्थानीय निवासी विक्रम सिंह चौहान बताते हैं कि सिंध नदी किनारे स्थित गौ-खो तक फैली इस पहाड़ी पर आज भी प्राचीन संस्कृति के निशान मिलते हैं। यहां पुरानी नींव और खंडहर बन चुके मकान साफ नजर आते हैं। एक पुराने बीजे यानी ऐतिहासिक शिलालेख में इस जगह का नाम अनलपुर दर्ज मिलता है, जो कभी एक समृद्ध बस्ती हुआ करती थी। पुराने मंदिर के अवशेष आज भी मौजूदा मंदिर से करीब 100 मीटर की दूरी पर पहाड़ी पर बिखरे हुए दिखते हैं।











