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उज्जैन की मोक्षदायिनी नदी के नाम पर मुख्यमंत्री मोहन यादव का आदेश, जानें शिप्रा की पौराणिक कहानीधर्म
3 घंटे पहले· 2

उज्जैन की मोक्षदायिनी नदी के नाम पर मुख्यमंत्री मोहन यादव का आदेश, जानें शिप्रा की पौराणिक कहानी

भोपाल की एक बैठक में सरकारी फाइल में ‘क्षिप्रा’ लिखा देख मुख्यमंत्री मोहन यादव ने इसे ‘शिप्रा’ करने का निर्देश दिया, जिसके बाद उज्जैन की इस मोक्षदायिनी नदी के असली नाम और उससे जुड़ी पौराणिक कथा को लेकर नई चर्चा शुरू हो गई है।

लक्ष्मी गुप्तालक्ष्मी गुप्ताअंक ज्योतिषी 3 मिनट पढ़ें AI के लिए
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उज्जैन में बहने वाली मोक्षदायिनी नदी के असली नाम को लेकर एक नई बहस छिड़ गई है। बाबा महाकाल की नगरी उज्जैन का जिक्र आते ही जिस नदी की तस्वीर जेहन में उभरती है, वह है शिप्रा नदी, जिसके तट पर हर कुंभ मेले के दौरान करोड़ों श्रद्धालु आस्था की डुबकी लगाने पहुंचते हैं। लेकिन सरकारी फाइलों में इस नदी का नाम कहीं ‘शिप्रा’ तो कहीं ‘क्षिप्रा’ लिखा मिलता है, और अब इसी उलझन को सुलझाने की कोशिश हुई है।

मुख्यमंत्री मोहन यादव ने क्यों दिया आदेश

भोपाल में हुई एक सरकारी बैठक में मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के सामने जब एक फाइल आई, जिसमें नदी का नाम ‘क्षिप्रा’ लिखा था, तो उन्होंने इस पर आपत्ति जताई। शास्त्रीय प्रमाणों का हवाला देते हुए मुख्यमंत्री मोहन यादव ने अधिकारियों को निर्देश दिए कि आगे से सरकारी दस्तावेजों में नदी का नाम ‘शिप्रा’ लिखा जाए। दरअसल बरसों से सरकारी रिकॉर्ड और आम बोलचाल, दोनों में ‘शिप्रा’ और ‘क्षिप्रा’ नाम साथ साथ चलते रहे हैं, और इसी नदी के पवित्र घाटों पर श्रद्धालु स्नान, तर्पण और दान जैसे धार्मिक अनुष्ठान करते आए हैं।

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विद्वान क्या कहते हैं मूल नाम पर

पद्मश्री साहित्यकार डॉ. भगवती लाल राजपुरोहित के मुताबिक नदी का मूल नाम ‘शिप्रा’ ही माना जाता है, भले ही आज के दौर में ‘क्षिप्रा’ नाम ज्यादा प्रचलित हो गया हो। उन्होंने इसकी वजह भी बताई, मालवा क्षेत्र की बोलचाल में ‘श’ अक्षर का उच्चारण कई बार ‘स’ जैसा हो जाता है। यही भाषाई प्रवृत्ति है जिसके चलते स्थानीय बोली में नदी को पहले ‘शपरा’ और फिर धीरे धीरे ‘शिप्रा’ कहा जाने लगा। साहित्य में भी इसके पुख्ता सबूत मौजूद हैं, महाकवि ने अपने प्रसिद्ध ग्रंथ मेघदूतम् में नदी के लिए ‘शिप्रा’ शब्द का ही इस्तेमाल किया है। वहीं मालवी बोली में इसका एक और रूप ‘सिप्रा’ भी सुनने को मिलता है, जो इस नाम की स्थानीय विविधता को दर्शाता है।

धार्मिक ग्रंथों में दोनों नाम प्रमाण के साथ मौजूद

वैदिक विद्वान पंडित अक्षत व्यास इस मसले पर एक अलग नजरिया रखते हैं। उनका कहना है कि शिप्रा और क्षिप्रा, दोनों नामों को लेकर वास्तव में कोई भ्रम नहीं होना चाहिए, क्योंकि धार्मिक ग्रंथों में दोनों नाम मिलते हैं। स्कंद महापुराण के अवंती खंड में इस पवित्र नदी को शिप्रा और क्षिप्रा, दोनों नामों से संबोधित किया गया है। तीर्थ पुरोहितों की सदियों पुरानी पोथियों में, साथ ही मंत्रों और तर्पण विधियों में क्षिप्रा नाम की प्रमुखता से मौजूदगी दर्ज है। एक अर्थ की दृष्टि से देखें तो क्षिप्रा का मतलब होता है तीव्र गति से बहने वाली धारा, जो बरसात के मौसम में नदी के तेज बहाव का प्रतीक माना जाता है।

विष्णु और शिव की कथा से जुड़ी नदी की उत्पत्ति

इस नदी की उत्पत्ति को लेकर एक पौराणिक कथा प्रचलित है। कहा जाता है कि एक बार भगवान शिव ब्रह्मकपाल लेकर भगवान विष्णु के पास भिक्षा मांगने पहुंचे। भगवान विष्णु ने अपनी अंगुली दिखाकर भिक्षा दी, लेकिन शिवजी ने इसे अशिष्टता समझा और क्रोध में आकर अपने त्रिशूल से विष्णु की अंगुली पर प्रहार कर दिया। इस प्रहार से जो रक्त की धारा बह निकली, वही विष्णु लोक से धरती पर उतरकर शिप्रा नदी के रूप में प्रवाहित हुई। यही कारण है कि शिप्रा को ‘दिव्य रक्त धारा’ के नाम से भी जाना जाता है।

श्रीराम से जुड़ा रामघाट का महत्व

स्कंद पुराण में एक और प्रसंग का वर्णन मिलता है, जिसके अनुसार वनवास काल के दौरान भगवान श्रीराम, लक्ष्मण और सीता उज्जैन पहुंचे थे। यहां उन्होंने शिप्रा नदी के तट पर अपने पिता राजा दशरथ का तर्पण और श्राद्ध कर्म संपन्न किया था। इसी वजह से रामघाट को शिप्रा नदी का सबसे पवित्र घाट माना जाता है। आज भी लाखों श्रद्धालु इसी घाट पर पहुंचकर तर्पण, पिंडदान और स्नान करते हैं और पुण्य अर्जित करने की कामना लेकर आते हैं।

इसका आप पर असर

  • भारत में: देशभर से उज्जैन के कुंभ मेले या शिप्रा स्नान के लिए जाने वाले श्रद्धालुओं को अब सरकारी दस्तावेजों और साइनबोर्ड पर नदी का नाम आधिकारिक रूप से ‘शिप्रा’ लिखा मिल सकता है।
  • उज्जैन में: स्थानीय प्रशासन को अब सरकारी फाइलों, नक्शों और रिकॉर्ड में नदी का नाम बदलकर ‘शिप्रा’ करना होगा, जिससे मंदिर प्रबंधन और तीर्थ पुरोहितों के दस्तावेजों में एकरूपता आएगी।

सवाल-जवाब

मुख्यमंत्री मोहन यादव ने नदी का नाम बदलने का आदेश कहां दिया?
भोपाल में हुई एक सरकारी बैठक के दौरान फाइल में ‘क्षिप्रा’ लिखा देख उन्होंने यह निर्देश दिया।
नदी का असली नाम क्या माना जाता है, शिप्रा या क्षिप्रा?
पद्मश्री डॉ. भगवती लाल राजपुरोहित के मुताबिक नदी का मूल नाम ‘शिप्रा’ है, हालांकि आज ‘क्षिप्रा’ नाम ज्यादा प्रचलित हो गया है।
‘शिप्रा’ नाम कैसे प्रचलन में आया?
मालवा क्षेत्र की बोलचाल में ‘श’ का उच्चारण ‘स’ जैसा होने से नदी पहले ‘शपरा’ और फिर ‘शिप्रा’ कहलाने लगी।
क्या धार्मिक ग्रंथों में दोनों नाम दर्ज हैं?
हां, स्कंद महापुराण के अवंती खंड में नदी को शिप्रा और क्षिप्रा दोनों नामों से संबोधित किया गया है।
शिप्रा नदी की उत्पत्ति की पौराणिक कथा क्या है?
कथा के अनुसार भगवान शिव के त्रिशूल से घायल भगवान विष्णु की अंगुली से बहा रक्त, विष्णु लोक से धरती पर उतरकर शिप्रा नदी बना।
रामघाट को सबसे पवित्र घाट क्यों माना जाता है?
स्कंद पुराण के अनुसार वनवास काल में भगवान श्रीराम ने यहीं शिप्रा तट पर अपने पिता दशरथ का तर्पण और श्राद्ध किया था।
लक्ष्मी गुप्ता
लेखक के बारे मेंलक्ष्मी गुप्ताअंक ज्योतिषी
विशेषज्ञताभविष्यसूचक अंक ज्योतिष, समग्र उपचार पद्धतियाँ, रिश्ते एवं पारिवारिक ज्योतिष, आध्यात्मिक विकास

एक समर्पित अंक ज्योतिषी, जो अंक ज्योतिष की गणितीय बुनियाद और पारंपरिक ज्योतिषीय पांडुलिपियों के संरक्षण में विशेषज्ञता रखती हैं।

लक्ष्मी पारंपरिक वैदिक ज्योतिष की गहन सटीकता को परामर्श के एक आधुनिक, चिकित्सकीय दृष्टिकोण के साथ जोड़ती हैं। उनका उद्देश्य अंक ज्योतिष को महज़ भविष्यवाणी से आगे बढ़ाकर आत्म-खोज और सचेत निर्णय लेने का एक सशक्त साधन बनाना है। संस्कृत अध्ययन और आधुनिक मनोविज्ञान की पृष्ठभूमि के साथ वे ऐसे परामर्श देती हैं जो सटीक भी हैं और संवेदनशील भी। चाहे आप करियर बदलाव से गुज़र रहे हों, रिश्तों में स्पष्टता चाहते हों या गहरे आध्यात्मिक उद्देश्य की तलाश में हों — लक्ष्मी सितारों की बुद्धिमत्ता से आपका रास्ता रोशन करती हैं।

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