अंतरंग स्वास्थ्य और व्यक्तिगत देखभाल से जुड़े आधुनिक इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों की दुनिया में लगातार नए प्रयोग हो रहे हैं, लेकिन तकनीक का हर नया फीचर यूज़र्स को पसंद आए यह जरूरी नहीं है। 18 से 60 वर्ष की आयु वर्ग की लगभग 50% महिलाएँ अपने जीवन में कम से कम एक बार वाइब्रेटर का उपयोग कर चुकी हैं। जहाँ साधारण मॉडल एक समान और स्थिर कंपन के साथ आते हैं जिन्हें बटन दबाकर धीरे-धीरे बढ़ाया जा सकता है, वहीं आधुनिक बाज़ार में सैकड़ों अलग-अलग सेटिंग्स वाले हाई-टेक डिवाइस भी मौजूद हैं। इन्हीं आधुनिक फीचर्स में शामिल 'थ्रस्ट मोड' को लेकर इन दिनों सोशल मीडिया पर तीखी बहस छिड़ गई है। अंदर-बाहर की गति करने वाला यह मोड पारंपरिक संभोग का अनुभव देने के इरादे से डिज़ाइन किया गया था, लेकिन बड़ी संख्या में महिला यूज़र्स इसे अत्यधिक यांत्रिक, आक्रामक और अवांछित मानकर पूरी तरह से खारिज कर रही हैं।
सोशल मीडिया पर छिड़ी बहस और यूज़र्स की प्रतिक्रियाएँ
इस पूरे मामले पर डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर महिलाओं की प्रतिक्रियाओं की बाढ़ आ गई है। @mrs.kmita नामक यूज़र ने इंस्टाग्राम पर लिखा, "इन वाइब्रेटर्स में यह बेतुकी लयबद्ध सेटिंग्स किसने डाली हैं? मैं दावे के साथ कह सकती हूँ कि यह काम किसी महिला का नहीं हो सकता।" इस पोस्ट के आते ही हज़ारों अन्य महिलाओं ने भी अपनी सहमति जताई और अपने अनुभव साझा किए।
सिडनी लेरौक्स (@sydneyleroux) ने चुटकी लेते हुए टिप्पणी की कि यह किसी पुरुष द्वारा तुरंत व्यवहार बदलने का यांत्रिक रूप लगता है। वहीं एक अन्य यूज़र @jojo_j0v ने नटखट अंदाज़ में कहा कि अगर उन्हें अस्थिरता और असंगतता ही चाहिए होती, तो वे किसी पुरुष का चुनाव करतीं। @jules_her ने आश्चर्य जताते हुए लिखा कि उन्हें लगता था कि केवल वही हमेशा एक ही बेसिक सेटिंग का इस्तेमाल करती हैं। सोशल मीडिया पर यूज़र्स का मानना है कि जटिल थ्रस्टिंग मोड्स को शामिल करना इस बात का संकेत है कि इन उपकरणों को महिलाओं की वास्तविक जरूरतों के बजाय पुरुषों के दृष्टिकोण को ध्यान में रखकर तैयार किया गया है। कई यूज़र्स ने शिकायत की कि गलती से थ्रस्ट मोड ऑन हो जाने पर 184 अलग-अलग सेटिंग्स में से वापस अपनी पसंदीदा सेटिंग पर साइकिल करना बेहद खीझ पैदा करने वाला होता है।
एडल्ट टॉय उद्योग का नेतृत्व और निर्माण इतिहास
महिलाओं के इस गुस्से ने एडल्ट प्रोडक्ट इंडस्ट्री के नेतृत्व और उनके डिज़ाइन प्रक्रिया पर भी कई सवाल खड़े कर दिए हैं। यद्यपि बाज़ार में 'शी! विमेंस स्टोर' (Sh! Women's Store) जैसी महिलाओं के स्वामित्व वाली कई कंपनियाँ मौजूद हैं, लेकिन उद्योग के प्रमुख ब्रांड्स में शीर्ष पदों पर पुरुषों की मौजूदगी काफी अधिक रही है। ब्रिटेन के सबसे लोकप्रिय ऑनलाइन एडल्ट टॉय रिटेलर लवहनी (Lovehoney) में उत्पाद निर्माण और परीक्षण के जिम्मेदार चीफ प्रोडक्ट ऑफिसर डॉ मार्क टोबियास ज़ेगेनहेगन (Dr Mark Tobias Zegenhagen) एक पुरुष हैं। हालांकि कंपनी में सारा-जेन मॉरिस (Sarah-Jane Morris) जैसी महिलाएँ भी डिजिटल प्रोडक्ट हेड के रूप में कार्यरत हैं।
इसी तरह लग्जरी एडल्ट टॉय ब्रांड लेलो (LELO) और हॉट ऑक्टोपस (Hot Octopuss) की स्थापना भी तीन-तीन पुरुषों के समूह द्वारा की गई थी। भले ही ये कंपनियाँ सभी जेंडर्स के लिए उत्पाद बनाती हैं और महिलाओं के लिए विशेष मार्केटिंग करती हैं, लेकिन उनके शुरुआती नेतृत्व में पुरुषों का दबदबा रहा है। ऐतिहासिक रूप से भी पहले वाइब्रेटर का आविष्कार 1880 के दशक में जोसेफ मोर्टिमर ग्रैनविले (Joseph Mortimer Granville) नाम के एक पुरुष डॉक्टर ने किया था। 'परक्यूटर' नामक इस मेडिकल उपकरण का मूल उद्देश्य मांसपेशियों के दर्द का इलाज करना था, जिसे बाद में यौन उत्तेजना और उपचार के लिए अपनाया जाने लगा।
विशेषज्ञों की राय: थ्रस्ट मोड का तकनीकी और शारीरिक पहलू
सेक्सोलॉजिस्ट और मनोयौन थेरेपिस्ट नेस कूपर (Ness Cooper) के अनुसार, सेक्सुअल हेल्थ प्रोडक्ट्स का विकास हमेशा से जेंडर राजनीति और शरीर की एर्गोनॉमिक्स से गहराई से जुड़ा रहा है। नेस कूपर बताती हैं कि अतीत में बहुत कम उपकरण सीधे योनि मार्ग या वल्वा की संरचना को ध्यान में रखकर बनाए जाते थे। निर्माताओं का मानना था कि जितनी अधिक सेटिंग्स होंगी, संतुष्टि की संभावना उतनी ही बढ़ जाएगी। 20 से अधिक वर्षों तक सेक्स टेक कंपनियों के साथ काम कर चुकीं नेस ने पैकेजिंग पर केवल लॉन्जरी पहने महिलाओं के चित्रों को हटाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
हालांकि, नेस कूपर इस विचार से पूरी तरह सहमत नहीं हैं कि सभी टॉय्स पुरुषों की सोच से ही बनाए जाते हैं। वे कहती हैं कि सेक्स टेक क्षेत्र में काम करने वाले कई पुरुष निर्माता भी सेटिंग्स की अत्यधिक संख्या से भ्रमित रहते हैं और असफलता से डरते हैं। उनके अनुसार थ्रस्ट मोड का विकास उन यूज़र्स के लिए किया गया था जो केवल वाइब्रेशन से संतुष्ट नहीं होते और जिन्हें पेनिट्रेटिव अनुभव की आवश्यकता होती है। इसके अलावा, दिव्यांग व्यक्तियों या पेल्विक फ्लोर संबंधी समस्याओं से जूझ रहे लोगों के लिए मैनुअल गति बनाए रखना शारीरिक रूप से कठिन होता है, जहाँ थ्रस्टिंग टॉय्स एक उपयोगी तकनीक साबित होते हैं।
जटिल डिज़ाइन्स और आर्गास्म किलर सेटिंग्स
विशेषज्ञों का मानना है कि बाज़ार में उपलब्ध उपकरणों में परीक्षण की भारी कमी है। कई बार महिला संस्थापकों द्वारा बनाए गए टॉय्स भी व्यापक महिलाओं पर टेस्ट करने के बजाय व्यक्तिगत प्राथमिकताओं पर आधारित होते हैं। नेस कूपर का कहना है कि कोई भी एक उपकरण सार्वभौमिक नहीं हो सकता, क्योंकि एक व्यक्ति की जरूरतें दूसरे से पूरी तरह भिन्न होती हैं।
आंकड़ों के अनुसार, महिलाएँ 3 से 5 सरल और स्पष्ट सेटिंग्स वाले उपकरणों को सबसे अधिक पसंद करती हैं। जब कोई व्यक्ति उत्तेजना के चरम क्षणों में होता है, तब 100 से अधिक जटिल मोड्स के बीच बटन दबाकर सही स्पीड खोजना मूड को पूरी तरह खराब कर देता है। विशेषज्ञ इसे 'आर्गास्म किलर' का नाम देते हैं, क्योंकि जटिल तकनीक के कारण ध्यान भटक जाता है। यही कारण है कि अब कई कंपनियाँ अपनी डिज़ाइन रणनीति बदलकर न्यूनतम और प्रभावी सेटिंग्स पर ध्यान केंद्रित कर रही हैं।
यौन उपकरणों का प्राचीन इतिहास और पुरातात्विक साक्ष्य
इंसानी इतिहास में आनंद और कामुकता की खोज हमेशा से मौजूद रही है। पुरातत्वविदों को जर्मनी की एक गुफा से 28,000 साल पुराना एक पत्थर का उपकरण मिला था, जिसे दुनिया का सबसे पुराना सेक्स टॉय माना जाता है। इसके अलावा, वर्ष 2023 में शोधकर्ताओं ने ब्रिटेन में हैड्रियंस वॉल पर स्थित विंडोलैंड नामक एक प्राचीन रोमन किले में पाई गई 16 सेंटीमीटर लंबी लकड़ी की कलाकृति को भी एक यौन उपकरण के रूप में चिन्हित किया था। पहले इसे सिलाई का औजार माना गया था, लेकिन न्यूकैसल यूनिवर्सिटी के पुरातत्व विशेषज्ञ डॉ रॉब कॉलिन्स (Dr Rob Collins) ने स्पष्ट किया कि प्राचीन ग्रीक और रोमन सभ्यता में ऐसे उपकरणों का उपयोग आम था, और इस वस्तु के दोनों चिकने सिरे इसके नियमित इस्तेमाल को दर्शाते हैं।
इतिहास में मिस्र की महारानी क्लेओपेट्रा द्वारा मधुमक्खियों से भरे जार का उपयोग करने की किंवदंती हो, प्राचीन भारत के कामसूत्र में उल्लिखित यौन सहायक उपकरण हों, या जापान में ऐतिहासिक रूप से इस्तेमाल होने वाले बेन वा बॉल्स हों, यह स्पष्ट है कि इंसानों ने हमेशा से अपनी अंतरंग ज़रूरतों के लिए नए साधन तलाशे हैं। आधुनिक दौर में सोशल मीडिया पर उठ रही यह आवाज़ दर्शाती है कि उपभोक्ता अब केवल अत्यधिक फीचर्स वाली तकनीक नहीं, बल्कि अपनी शारीरिक संरचना और सुविधा के अनुकूल व्यावहारिक डिज़ाइन्स चाहते हैं।



















