शारीरिक सौष्ठव और फिटनेस की आधुनिक होड़ में जहां युवा महंगे डिब्बाबंद सप्लीमेंट्स और आधुनिक व्यायामशालाओं का रुख कर रहे हैं, वहीं पारंपरिक कुश्ती के अखाड़ों में देसी खानपान का महत्व आज भी कायम है। उत्तर प्रदेश के झांसी जिले में कुश्ती को लेकर युवाओं और अनुभवी पहलवानों में जबरदस्त उत्साह बना हुआ है। जिले के मोठ गांव में पिछले दो सालों से अखिल भारतीय दंगल का आयोजन किया जा रहा है, जिसमें उत्तर प्रदेश के तमाम जिलों के अलावा पड़ोसी राज्य मध्य प्रदेश से भी पहलवान अपनी कुश्ती कला और दमखम का प्रदर्शन करने अखाड़े की मिट्टी पर उतरते हैं। इस अखाड़े में उतरने वाले खिलाड़ी साबित कर रहे हैं कि प्राकृतिक देसी खुराक और कड़े अनुशासन के दम पर किसी भी आधुनिक सप्लीमेंट के बिना मजबूत शरीर और बेहतरीन स्टेमिना तैयार किया जा सकता है।
युवा पहलवान अजय प्रताप का सफर और देसी खानपान
महज 21 साल की उम्र में अखाड़े में अपनी पहचान बना चुके पहलवान अजय प्रताप कुश्ती को केवल एक खेल नहीं बल्कि अपना जीवन मानते हैं। कोरोना काल के बाद वर्ष 2020 से उन्होंने अखाड़े में कुश्ती का नियमित अभ्यास आरंभ किया था। धीरे-धीरे खेल की बारीकियों को सीखते हुए उन्होंने अपनी मेहनत के बल पर स्टेट चैंपियनशिप में जीत दर्ज की। अजय प्रताप का स्पष्ट मानना है कि अखाड़े में सफलता हासिल करने के लिए जितना जरूरी कड़ा अभ्यास है, उतना ही जरूरी शरीर को सही पोषण देना भी है।
अपनी दिनचर्या में अजय किसी भी तरह के कृत्रिम प्रोटीन पाउडर का इस्तेमाल पूरी तरह नकारते हैं। वे सुबह के नाश्ते और दैनिक भोजन में गाय-भैंस का ताजा दूध, केला, भीगा हुआ चना, मसूर और मूंग की दाल जैसी प्राकृतिक चीजों को प्रमुखता से शामिल करते हैं। उनका कहना है कि कुश्ती केवल मांसपेशियों की ताकत का खेल नहीं है, बल्कि यह प्रतिद्वंद्वी की चाल को भांपने, उसके दांव की काट ढूंढने और सही समय पर सटीक वार करने की मानसिक सजगता पर भी निर्भर करता है। स्टेट चैंपियनशिप जीतने के बाद अजय का आत्मविश्वास काफी बढ़ा है और वे अपनी देसी खुराक के सहारे भविष्य की बड़ी प्रतियोगिताओं की तैयारी में जुटे हुए हैं।
15 वर्षों का अनुभव और छह किलोमीटर की दैनिक दौड़
अखिल भारतीय दंगल में अपने दांव-पेच दिखाने वाले संतोष पहलवान का कुश्ती जीवन करीब 15 वर्षों का है। उत्तर प्रदेश के विभिन्न जिलों में आयोजित अनगिनत कुश्ती प्रतियोगिताओं में भाग ले चुके संतोष पहलवान को अखाड़े की मिट्टी और शरीर की बनावट की गहरी समझ है। अपने शरीर को मुकाबले के अनुकूल फुर्तीला और टिकाऊ बनाए रखने के लिए वे प्रतिदिन सुबह करीब छह किलोमीटर की लंबी दौड़ लगाते हैं। इस दौड़ से उनके फेफड़ों और हृदय की क्षमता मजबूत होती है, जो लंबे मुकाबलों में सांस थामे रखने में मददगार साबित होती है।
दौड़ पूरी करने के बाद संतोष पहलवान अपनी डाइट पर विशेष ध्यान देते हैं। उनकी सुबह की खुराक में बादाम का शेक, शुद्ध देसी घी और दूध मुख्य रूप से शामिल रहते हैं। संतोष पहलवान के अनुसार, कुश्ती के मैदान में हर पहलवान का अपना एक अनूठा तरीका और दांव होता है। कोई पहलवान केवल अपनी शारीरिक शक्ति और वजन के बल पर सामने वाले को चित करने की कोशिश करता है, तो कोई खिलाड़ी फुर्ती, लचीलेपन और त्वरित दांव-पेच से बढ़त हासिल करता है। उनका कहना है कि लंबे समय तक चोटों से बचे रहकर अखाड़े में टिके रहने के लिए निरंतर दौड़, नियमित कसरत और पौष्टिक देसी खानपान ही सबसे कारगर उपाय है।
देसी खुराक का पोषण विज्ञान और पहलवानों की जरूरतें
अखाड़े के पहलवानों का दैनिक आहार यह साफ दर्शाता है कि भारतीय पारंपरिक खानपान वैज्ञानिक दृष्टि से कितना संतुलित है। कुश्ती एक अत्यधिक ऊर्जा खपत वाला खेल है जिसमें मांसपेशियों की मरम्मत और त्वरित ऊर्जा दोनों की भारी जरूरत होती है। दूध, दही, पनीर और दालें प्रोटीन का उत्कृष्ट और सुपाच्य स्रोत हैं जो मांसपेशियों के निर्माण में मदद करती हैं। वहीं केला शरीर को तुरंत ऊर्जा देने वाले कार्बोहाइड्रेट प्रदान करता है, जिससे थकावट जल्दी नहीं होती।
चना और मूंग न केवल प्रोटीन से भरपूर होते हैं बल्कि इनमें जरूरी खनिज और फाइबर भी होते हैं जो पाचन तंत्र को दुरुस्त रखते हैं। बादाम और देसी घी शरीर को स्वस्थ वसा, ओमेगा फैटी एसिड और जोड़ों के लिए जरूरी चिकनाई प्रदान करते हैं, जिससे कुश्ती के दौरान हड्डियों और जोड़ों पर पड़ने वाला दबाव कम होता है। प्रत्येक पहलवान की शारीरिक बनावट, वजन वर्ग और अभ्यास का स्तर अलग होता है, इसलिए आहार का चयन भी व्यक्तिगत जरूरतों के मुताबिक होना चाहिए। बिना किसी विशेषज्ञ सलाह के महंगे कृत्रिम पाउडर पर निर्भर होने के बजाय संतुलित देसी भोजन से शरीर की सभी पोषण संबंधी आवश्यकताओं को पूरा किया जा सकता है।
सहनशक्ति, शारीरिक तालमेल और अभ्यास का तालमेल
अखाड़े में होने वाले किसी भी मुकाबले में पहलवान को लगातार अपनी शारीरिक स्थिति बदलनी पड़ती है और हर पल अत्यधिक बल का प्रयोग करना होता है। ऐसे में केवल मांसपेशियां फुला लेना पर्याप्त नहीं होता, बल्कि सहनशक्ति और शरीर के अंगों के आपसी तालमेल की सबसे बड़ी भूमिका होती है। संतोष पहलवान की छह किलोमीटर की दैनिक दौड़ कार्डियोवैस्कुलर क्षमता को चरम पर बनाए रखती है, जबकि अखाड़े में की जाने वाली कुश्ती दांव-पेच, शरीर के संतुलन और प्रतिक्रिया समय को धार देती है।
पहलवानों के लिए यह भी बेहद आवश्यक है कि वे अत्यधिक व्यायाम से होने वाले तनाव और खिंचाव से बचने के लिए शरीर को पर्याप्त आराम और नींद दें। मांसाहारी पहलवान जहां अंडा और मांस के जरिए अपनी प्रोटीन की जरूरतें पूरी कर सकते हैं, वहीं शाकाहारी खिलाड़ी दाल, चना, मूंग, दूध, दही और पनीर जैसी प्राकृतिक चीजों से अपनी पूरी ताकत हासिल कर सकते हैं। झांसी के मोठ का यह दंगल साफ संदेश देता है कि आधुनिक चमक-दमक के दौर में भी पारंपरिक अखाड़ा संस्कृति और देसी आहार का कोई सानी नहीं है।



















