देश में स्मार्टफोन खरीदारों को आने वाले दिनों में बड़ी आर्थिक राहत मिलने की उम्मीद जगी है. स्मार्टफोन निर्माता कंपनियों और दूरसंचार उद्योग से जुड़े संगठनों ने औपचारिक रूप से केंद्र सरकार के समक्ष प्रस्ताव रखा है कि मोबाइल हैंडसेट पर लागू वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) की वर्तमान दर को 18% से सीधे घटाकर 5% के निचले स्लैब में लाया जाए. इंडस्ट्री का स्पष्ट कहना है कि बीते कुछ समय के दौरान इलेक्ट्रॉनिक कंपोनेंट्स की कीमतों में इजाफा होने और इनपुट फ्रेट यानी माल ढुलाई खर्च बढ़ने की वजह से हैंडसेट की औसत बिक्री कीमत लगातार ऊपर चढ़ी है. इस लगातार बढ़ती महंगाई का सबसे बुरा असर समाज के उस बड़े हिस्से पर पड़ा है, जो किफायती बजट और एंट्री-लेवल डिवाइस पर निर्भर रहता है.
बाजार की इस सुस्ती को दूर करने के लिए उद्योग जगत अब टैक्स में राहत को एक मजबूत समाधान के तौर पर देख रहा है. निर्माताओं का मानना है कि करों में कटौती से ग्राहकों के लिए अंतिम खुदरा मूल्य तुरंत नीचे आ जाएगा. हालांकि, यह रियायत लागू करना पूरी तरह केंद्र या किसी एक राज्य सरकार के हाथ में नहीं है, बल्कि कर दरों में किसी भी फेरबदल का अंतिम फैसला जीएसटी काउंसिल की आगामी बैठक में सभी राज्यों और केंद्र के वित्त मंत्रियों द्वारा सर्वसम्मति से लिया जाएगा.
मार्च 2020 में हुई टैक्स वृद्धि को वापस लेने की दलील
हैंडसेट कंपनियों का प्रमुख तर्क यह है कि मोबाइल फोन पर लागू 18% का कर ढांचा उपभोक्ताओं पर गैर-जरूरी बोझ डाल रहा है. ऐतिहासिक संदर्भ देते हुए उद्योग ने ध्यान दिलाया है कि मार्च 2020 में मोबाइल हैंडसेट पर जीएसटी की दर को 12% से बढ़ाकर 18% कर दिया गया था. अब निर्माता उस समय लागू की गई इस बढ़ोतरी को पूरी तरह वापस लेने और इसे 5% के स्तर पर लाने का पुरजोर अनुरोध कर रहे हैं. इंडस्ट्री प्रतिनिधियों का विश्लेषण है कि टैक्स स्लैब नीचे आने से हैंडसेट की एमआरपी पर सीधा असर पड़ेगा और कमजोर पड़ रही घरेलू बिक्री को एक नया जीवनदान मिलेगा.
10,000 रुपये से सस्ते हैंडसेट के खरीदार सबसे ज्यादा प्रभावित
हैंडसेट की बढ़ती औसत कीमतों का सीधा नुकसान 10,000 रुपये से कम लागत वाले बजट सेगमेंट को झेलना पड़ा है. देश भर में यह कीमत वर्ग उन करोड़ों ग्राहकों की बुनियादी जरूरतें पूरी करता है, जो बेसिक फीचर फोन छोड़कर पहली बार स्मार्टफोन की डिजिटल दुनिया में कदम रखते हैं. उद्योग संगठनों का कहना है कि 18% की भारी टैक्स दर इस वर्ग के लिए उपकरण खरीदने की शुरुआती लागत बहुत ज्यादा बढ़ा देती है. विशेषकर ग्रामीण क्षेत्रों और सीमित मासिक आय वाले परिवारों के लिए कुछ हजार या कुछ सौ रुपयों का अंतर भी खरीद के फैसले को टालने या रद्द करने की मुख्य वजह बन जाता है.
बिक्री वॉल्यूम बढ़ने से सरकारी खजाने को नुकसान न होने का तर्क
मोबाइल निर्माताओं की दलील केवल उपभोक्ताओं को सस्ता उत्पाद देने तक सीमित नहीं है, बल्कि उन्होंने सरकारी राजस्व के संतुलन का गणित भी सामने रखा है. कंपनियों का विश्लेषण है कि प्रति फोन 5% टैक्स मिलने से तात्कालिक रूप से प्रति यूनिट राजस्व जरूर कम दिखेगा, लेकिन कीमतों में कमी आते ही बिक्री का कुल वॉल्यूम तेजी से उछलेगा. जब बाजार में अधिक संख्या में स्मार्टफोन खरीदे जाएंगे, तो ज्यादा यूनिट्स बिकने से सरकार को मिलने वाले कुल राजस्व में संभावित गिरावट की भरपाई आसानी से हो जाएगी. इसके साथ ही व्यापक स्तर पर स्मार्टफोन की पैठ बढ़ने से ऑनलाइन सेवाएं, यूपीआई और डिजिटल पेमेंट के नेटवर्क का दायरा बढ़ेगा, जिससे समग्र डिजिटल अर्थव्यवस्था को भी अतिरिक्त मजबूती मिलेगी.
जीएसटी काउंसिल के पाले में फैसला
मोबाइल विनिर्माण उद्योग का यह विस्तृत मसौदा जीएसटी दरों की आगामी समीक्षा प्रक्रिया के दौरान विचारार्थ शामिल किया गया है. नीति निर्माताओं के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह होगी कि आम नागरिकों के लिए तकनीक को सस्ता बनाने की इंडस्ट्री की मांग और सरकारी कर संग्रह की स्थिरता के बीच एक संतुलित संतुलन कैसे बनाया जाए. इसके अलावा देश में घरेलू इलेक्ट्रॉनिक्स विनिर्माण को गति देना भी सरकार का एक प्रमुख एजेंडा है. बाजार के विश्लेषक और खरीदार अब जीएसटी काउंसिल की औपचारिक बैठक के निर्णय का इंतजार कर रहे हैं, क्योंकि इस दर कटौती पर मुहर लगते ही सीधे बाजार में फोन सस्ते होने का रास्ता साफ हो जाएगा.


















