टेलीविजन जगत के जाने-माने कलाकार दिव्यांका त्रिपाठी और विवेक दहिया के घर इस बार का गणेशोत्सव बेहद खास और यादगार बन गया है. हाल ही में जुड़वा बेटों के माता-पिता बनने के बाद इस दंपति के लिए यह पहला मौका है जब वे अपने नन्हे बच्चों की मौजूदगी में विघ्नहर्ता भगवान गणेश का स्वागत कर रहे हैं. जीवन के इस नए और खूबसूरत पड़ाव में परिवार की खुशियां दोगुनी हो चुकी हैं, जिसकी झलक उनके इस साल के उत्सव और तैयारियों में साफ तौर पर दिखाई दे रही है.
बच्चों को समर्पित रही घर की पूरी सजावट और थीम
घर में गणपति बप्पा के आगमन के लिए की गई साज-सज्जा पूरी तरह से दोनों नवजात बेटों को ध्यान में रखकर तैयार की गई थी. इस बार की सजावट को एक प्यारा और शांत स्वरूप देने के लिए हल्के नीले रंग यानी ब्लू थीम का चयन किया गया. पूरे पंडाल और घर के कोने-कोने को मोतियों, खरगोशों और मशरूम जैसी मनमोहक आकृतियों से सजाया गया. इस सजावट का मुख्य उद्देश्य किसी दिखावे या भव्यता के बजाय एक मासूम, कोमल और सुखद वातावरण तैयार करना था, ताकि घर पधारे बप्पा का मंगलकारी आशीर्वाद दोनों मासूमों को सहज रूप से मिल सके.
जिम्मेदारियों के बीच बदली दिनचर्या और रफ्तार
मां बनने के बाद जीवन में आए बदलावों और नई जिम्मेदारियों का जिक्र करते हुए दिव्यांका ने बताया कि उनकी सोचने और काम करने की रफ्तार में भारी बदलाव आया है. उन्होंने साझा किया कि अगर पहले उनका दिमाग 60 की गति से सोचता था, तो अब इन दोहरी जिम्मेदारियों को संभालने के लिए उसे 160 की रफ्तार से सक्रिय रखना पड़ता है. एक साथ कई मोर्चों पर नजर रखनी होती है, जिसमें नवजात शिशुओं की सुविधा और देखभाल सबसे ऊपर रहती है. इसके साथ ही घर आने वाले मेहमानों का सत्कार और उत्सव से जुड़ी रस्मों का सुचारु संचालन भी सुनिश्चित करना होता है. दिनभर की इस भारी भागदौड़ और अतिरिक्त मेहनत के बावजूद वे और विवेक माता-पिता बनने के इस नए सफर का भरपूर आनंद ले रहे हैं.
दिखावे की जगह सादगी और पारिवारिक सुकून को प्राथमिकता
इस बार उत्सव की योजना बनाते समय किसी बड़ी दावत या भारी-भरकम जलसे के आयोजन से पूरी तरह परहेज किया गया. प्राथमिकता केवल इस बात को दी गई कि परिवार के सदस्य आपस में मिलकर शांति और सुकून के साथ यह पावन पर्व मना सकें. उत्सव के पारंपरिक प्रसाद के लिए दिव्यांका ने बाजार पर निर्भर रहने के बजाय खुद घर की रसोई में मोदक बनाए. इसके अतिरिक्त रोजमर्रा का शुद्ध भोजन जैसे दाल, रोटी, सब्जी भी घर पर ही पारंपरिक ढंग से तैयार किया गया, जिससे उत्सव की पवित्रता और पारिवारिक अपनत्व बना रहे.
प्राथमिकताओं में बदलाव और चौबीसों घंटे बच्चों पर नजर
संतान के आगमन ने दोनों कलाकारों की प्राथमिकताओं को पूरी तरह बदल दिया है. दिव्यांका ने स्पष्ट किया कि अब उनका सारा ध्यान हर क्षण केवल अपने बच्चों की ओर ही लगा रहता है. दोनों शिशु बेहद छोटे हैं, जिसके चलते रात में सोते समय भी वे और विवेक लगातार उठकर यह देखते रहते हैं कि बच्चे सुरक्षित और आराम से हैं या नहीं. पहले जहां वे अपनी दिनचर्या और खुद के बारे में सोचते थे, वहीं अब उनका सारा वक्त और सोच परिवार में शामिल हुए इन दो नन्हे सदस्यों के इर्द-गिर्द ही घूमती है.



















