भारतीय दूरदर्शन के इतिहास में ऐतिहासिक धारावाहिक 'द स्वॉर्ड ऑफ टीपू सुल्तान' एक ऐसा नाम है जिसने अपनी भव्यता और संवादों से दर्शकों के दिलों पर गहरी छाप छोड़ी। हालांकि इस ऐतिहासिक टीवी शो की सफलता के पीछे एक बेहद खौफनाक और दिल दहला देने वाला हादसा जुड़ा हुआ है। लगभग 36 साल पहले दूरदर्शन पर प्रसारित होने वाले इस शो के निर्माण के दौरान सेट पर इतनी भीषण आग लग गई थी कि उसने देखते ही देखते तबाही मचा दी। इस दर्दनाक अग्निकांड में 52 से अधिक निर्दोष लोगों को अपनी जान गंवानी पड़ी थी। इसके अलावा धारावाहिक के मुख्य अभिनेता और निर्देशक संजय खान भी आग की लपटों में बुरी तरह झुलस गए थे। यह हादसा भारतीय टेलीविज़न उद्योग के सबसे दुखद पन्नों में दर्ज है।
मैसूर के प्रीमियर स्टूडियो में आतिशबाजी से भड़की थी विनाशकारी आग
यह खौफनाक घटना 8 फरवरी 1989 के दिन कर्नाटक के मैसूर में स्थित प्रसिद्ध प्रीमियर स्टूडियो में घटी थी। उस दिन स्टूडियो के अंदर धारावाहिक के लिए एक भव्य शादी के दृश्य की शूटिंग की जा रही थी। इस शादी के माहौल को जीवंत और आकर्षक बनाने के लिए भारी मात्रा में आतिशबाजी और पटाखों का इंतजाम किया गया था। शूटिंग की प्रक्रिया के दौरान अचानक पटाखों से निकली एक मामूली सी चिंगारी सेट के किसी हिस्से पर गिर गई। देखते ही देखते उस अकेली चिंगारी ने विकराल रूप धारण कर लिया और पूरे स्टूडियो को अपनी आगोश में ले लिया। आग बुझाने के पर्याप्त और आधुनिक इंतजाम न होने की वजह से वहां मौजूद लोग असहाय हो गए।
सिर्फ एक दरवाजा और अत्यधिक ज्वलनशील सामग्री बनी मौतों की वजह
प्रीमियर स्टूडियो के भीतर आग फैलने की गति इतनी तेज थी कि वहां मौजूद किसी भी व्यक्ति को संभलने या बाहर भागने का मौका तक नहीं मिल सका। सेट को बनाने में बड़े पैमाने पर सूखी लकड़ी, प्लाईवुड, प्लास्टिक और फोम जैसी अत्यधिक ज्वलनशील सामग्रियों का प्रयोग किया गया था। इन चीजों ने आग में घी का काम किया और पूरा सेट कुछ ही पलों में आग का गोला बन गया। इसके साथ ही सबसे बड़ी लापरवाही यह थी कि स्टूडियो में बाहर निकलने के लिए केवल एक ही दरवाजा मौजूद था। आग और घने जहरीले धुएं के बीच जान बचाने के लिए लोगों में भगदड़ मच गई। उस संकरे दरवाजे से बाहर न निकल पाने के कारण क्रू मेंबर्स और कई जूनियर आर्टिस्ट अंदर ही फंस गए। धुएं में दम घुटने और आग की चपेट में आने से 52 से ज्यादा लोगों की मौके पर ही मौत हो गई।
70 से ज्यादा सर्जरी और महीनों का इलाज: संजय खान की मुश्किल जंग
इस भीषण हादसे की चपेट में धारावाहिक के लीड एक्टर और डायरेक्टर संजय खान भी आ गए थे। आग की लपटों से उनका शरीर अत्यंत गंभीर रूप से जल गया था और उनकी हालत बेहद नाजुक हो गई थी। घटना के तुरंत बाद उन्हें आपातकालीन स्थिति में अस्पताल ले जाया गया, जहां वह कई महीनों तक जिंदगी और मौत के बीच संघर्ष करते रहे। डॉक्टरों के सामने उनकी जान बचाना एक बहुत बड़ी चुनौती थी। संजय खान की जान बचाने और उनके जले हुए शरीर के अंगों के पुनर्निर्माण के लिए डॉक्टरों को 70 से अधिक जटिल सर्जरी करनी पड़ी थीं। एक लंबे, दर्दनाक इलाज और अपने अटूट हौसले के बल पर आखिरकार संजय खान इस जानलेवा हादसे से उबरने में सफल रहे।
1990 में दूरदर्शन पर टेलीकास्ट और इस ऐतिहासिक शो की अपार सफलता
शारीरिक और मानसिक रूप से इतने बड़े आघात का सामना करने के बावजूद संजय खान ने अपने सपने को अधूरा नहीं छोड़ने का संकल्प लिया। पूरी तरह ठीक होने के बाद उन्होंने इस धारावाहिक की शूटिंग को दोबारा शुरू करने और इसे पूरा करने का फैसला किया। उनकी इस अटूट प्रतिबद्धता के बाद साल 1990 में दूरदर्शन के राष्ट्रीय नेटवर्क पर 'द स्वॉर्ड ऑफ टीपू सुल्तान' का आधिकारिक प्रसारण शुरू हुआ। जैसे ही यह सीरियल ऑन एयर हुआ, दर्शकों ने इसे हाथों-हाथ लिया और यह भारतीय टेलीविजन इतिहास के सबसे लोकप्रिय और सफल धारावाहिकों में से एक बन गया। हालांकि, जब भी इस शो की ऐतिहासिक सफलता और शानदार निर्माण की चर्चा होती है, तब 52 से ज्यादा मासूम लोगों के असमय चले जाने का दुख भी लोगों की यादों में ताजा हो जाता है।



















