उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर जिले में न्यायपालिका से जुड़ा एक कड़ा और साहसिक संदेश सामने आया है। अपर जिला एवं सत्र न्यायाधीश रवि कुमार दिवाकर ने दहेज हत्या से जुड़े एक मामले में सुनवाई पूरी करते हुए मृत्युदंड का आदेश पारित किया। इस दौरान उन्होंने स्पष्ट शब्दों में यह बात रखी कि वह अपराधियों, गैंगस्टरों और माफियाओं के किसी भी तरह के अनुचित दबाव के आगे झुकने वाले नहीं हैं। न्यायाधीश ने यह भी उल्लेख किया कि उनके माता-पिता ने उन्हें केवल ईश्वर से ही डरना सिखाया है, इसलिए कर्तव्य पथ पर रहते हुए उन्हें किसी का भय नहीं है।
यह फैसला ऐसे समय में आया है जब न्यायाधीश दिवाकर पिछले चार महीनों के दौरान कुल 23 लोगों को फांसी की सजा सुना चुके हैं। उन्होंने अपने न्यायिक दायित्वों का निर्वहन करते हुए दो टूक कहा कि यदि कोई जज बाहुबलियों और अपराधियों के आगे भयभीत हो जाता है, तो देश की आम जनता का न्याय व्यवस्था से पूरी तरह भरोसा उठ जाएगा।
सिद्धांतों से समझौता न करने का संकल्प
अदालत की कार्यवाही के दौरान न्यायाधीश ने अपने सख्त रुख को दोहराते हुए कहा कि वह अपनी साख और उसूलों से किसी भी कीमत पर पीछे हटने वाले नहीं हैं।
मैं कायर जज कहलाने के बजाय मौत को गले लगाना पसंद करूंगा।
उन्होंने यह भी शिकायत दर्ज कराई कि उन्हें असामाजिक तत्वों और माफियाओं की ओर से लगातार धमकियां मिल रही हैं। उनका यह भी आरोप रहा कि अपराधियों को फायदा पहुंचाने की मंशा से उनकी अदालत से लगभग 100 गंभीर प्रकृति के मुकदमों को वापस ले लिया गया था। सुरक्षा को लेकर खतरे की आशंका जताते हुए उन्होंने वरिष्ठ अधिकारियों से सुरक्षा प्रबंध पुख्ता करने की अपील की है, खासकर तब जब मुजफ्फरनगर में उनकी सुरक्षा में कटौती किए जाने की बात सामने आई थी।
दहेज हत्या के मामले की पूरी पृष्ठभूमि
सरकारी वकील कुलदीप कुमार ने इस मामले के बारे में विस्तार से जानकारी देते हुए बताया कि सोमवार को अदालत ने अभियुक्त नदीम को भारतीय न्याय संहिता और पूर्ववर्ती IPC की धाराओं के तहत दोषी करार दिया। अदालत ने आरोपी पर एक लाख रुपये का आर्थिक जुर्माना भी लगाया है। यह पूरा मामला 23 जुलाई 2018 का है, जब शाहपुर कस्बे में दहेज की मांग को लेकर नदीम ने अपनी 23 वर्षीय पत्नी शहजादी को आग के हवाले कर दिया था।
गंभीर रूप से झुलसी हुई शहजादी को फौरन इलाज के लिए दिल्ली के सफदरजंग अस्पताल में भर्ती कराया गया था, जहां उपचार के दौरान उसकी मौत हो गई थी। अपनी मृत्यु से पहले दिए गए बयान में पीड़िता ने साफ तौर पर नदीम पर ही उसे जलाने का गंभीर आरोप लगाया था। सरकारी पक्ष के सभी 11 गवाह सुनवाई के दौरान अपने बयानों से मुकर गए थे, लेकिन अदालत ने शहजादी के उस आखिरी मृत्युपूर्व बयान को आधार बनाते हुए आरोपी को सजा सुनाई।
फांसी की सजाओं का बढ़ता आंकड़ा और प्रशासनिक फेरबदल
न्यायाधीश दिवाकर की फास्ट ट्रैक कोर्ट ने पिछले चार महीनों के भीतर कुल 11 अलग-अलग मामलों में 23 दोषियों को मृत्युदंड की सजा से दंडित किया है। इन कठोर फैसलों के बीच प्रशासनिक स्तर पर भी बदलाव देखने को मिले। बीते अगस्त महीने में उनके पास विचाराधीन हत्या से जुड़े लगभग 100 मामलों को एक प्रशासनिक आदेश के जरिए जिला एवं सत्र न्यायाधीश वीरेंद्र कुमार सिंह की अदालत में स्थानांतरित कर दिया गया था।
जिला बार एसोसिएशन के अध्यक्ष प्रमोद त्यागी ने इस बात का जिक्र किया था कि मुकदमों का यह ट्रांसफर वकीलों और वादियों के बीच इस आशंका के चलते हुआ था कि त्वरित अदालत द्वारा और भी मामलों में मृत्युदंड सुनाया जा सकता है। इस घटनाक्रम के अलावा हाल ही में मुंबई के दादर इलाके में भी उपद्रवियों द्वारा एक न्यायाधीश की गाड़ी को घेरकर जान से मारने की धमकी दिए जाने का सनसनीखेज मामला प्रकाश में आया था, जिसके बाद पुलिस ने दो व्यक्तियों के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज की थी।




















