कानपुर के जाजमऊ इलाके की गिनती लंबे समय तक शहर के सबसे गंदे और प्रदूषित हिस्सों में होती रही, और इसकी बड़ी वजह यहां की चमड़ा टेनरियां मानी जाती थीं, जिनसे निकलने वाला जहरीला पानी सीधे गंगा में मिल जाता था। इसी संकट को खत्म करने के मकसद से जाजमऊ में एक कॉमन इफ्लुएंट ट्रीटमेंट प्लांट यानी सीईटीपी तैयार किया गया, जिसकी लागत करीब 450 करोड़ रुपये आई और इसकी क्षमता 20 एमएलडी रखी गई, ताकि टेनरियों का पानी गंगा तक पहुंचने से पहले ही रोका जा सके। यह प्लांट 2019 में बनकर तैयार हो गया था, मगर पूरी क्षमता के साथ इसका काम 2024 से शुरू हो पाया। आज हालात यह हैं कि रोजाना करीब 10 से 12 एमएलडी दूषित पानी इस प्लांट तक पहुंचता है और उसे कई अलग-अलग चरणों से गुजारकर साफ किया जाता है, इसके बाद ही वह आगे भेजा जाता है।
चार जोन और मास्टर पंपिंग स्टेशन से होकर पहुंचता है पानी
जाजमऊ में फिलहाल 276 टेनरियां चल रही हैं, और इनसे निकलने वाला दूषित पानी सीधे नदी में नहीं बहाया जाता। इसके बजाय पूरे इलाके को चार जोन में बांटकर पाइपलाइन के जरिए पानी को अलग-अलग पंपिंग स्टेशनों तक भेजा जाता है। पंपिंग स्टेशन एक, दो और चार का पानी आगे पंपिंग स्टेशन तीन में इकट्ठा होता है, जिसे मास्टर पंपिंग स्टेशन का दर्जा दिया गया है। यहीं से सारा दूषित पानी सीईटीपी के इनलेट तक भेजा जाता है, और तभी असली सफाई का काम शुरू होता है। नेशनल मिशन फॉर क्लीन गंगा से जुड़े प्रोजेक्ट इंजीनियर विकास तिवारी बताते हैं कि प्लांट में एक्टिवेटेड स्लज तकनीक अपनाई गई है। सबसे पहले पानी में मौजूद बड़े कचरे और भारी कणों यानी ग्रीट को अलग किया जाता है, इसके बाद पानी को टीएसएस टैंक में भेजा जाता है जहां ठोस कण हटाए जाते हैं।
क्रोमियम जैसे खतरनाक तत्वों को हटाने के लिए कई पड़ाव
चमड़ा बनाने के दौरान इस्तेमाल होने वाले रसायनों में क्रोमियम जैसे तत्व शामिल होते हैं, जो बिना उपचार के नदी में मिलने पर पर्यावरण के लिए बड़ा खतरा बन सकते हैं। इसी वजह से सीईटीपी में पानी को एक नहीं, बल्कि कई पड़ावों से गुजारा जाता है। ग्रीट अलग करने और टीएसएस टैंक की प्रक्रिया के बाद पानी में केमिकल डोजिंग की जाती है और फिर बायोलॉजिकल ट्रीटमेंट होता है। इसके आगे अल्ट्रा फिल्ट्रेशन सहित अन्य तकनीकों का इस्तेमाल करके पानी को और बेहतर बनाया जाता है। इस पूरी कड़ी में एक्सटेंडेड एयरेशन सिस्टम की भूमिका भी अहम मानी जाती है, क्योंकि यही जैविक प्रक्रिया के जरिए पानी में घुले प्रदूषक तत्वों की मात्रा घटाता है। यह पूरी श्रृंखला इसलिए बनाई गई है ताकि किसी एक चरण की कमी की वजह से अनुपचारित पानी आगे न निकल जाए। सारे चरण पूरे होने के बाद शुद्ध किया गया पानी इरीगेशन चैनल के रास्ते खेतों की सिंचाई के लिए भेज दिया जाता है। नेशनल मिशन फॉर क्लीन गंगा से जुड़े अधिकारियों के मुताबिक इस प्लांट के चालू होने के बाद टेनरियों का गंदा पानी अब सीधे गंगा में नहीं जा रहा।
20 एमएलडी की क्षमता, फिर भी आधा पानी ही पहुंच रहा
सीईटीपी हर दिन बीस एमएलडी यानी करीब दो करोड़ लीटर दूषित पानी को साफ करने में सक्षम है, लेकिन अभी इसमें केवल 10 से 12 एमएलडी पानी ही आ पा रहा है। इसके पीछे बड़ी वजह यह है कि जाजमऊ की ज्यादातर टेनरियां अपनी पूरी क्षमता से नहीं, बल्कि आधी क्षमता पर ही चल रही हैं। उत्तर प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के क्षेत्रीय अधिकारी अजीत सुमन के हवाले से बताया गया कि चालू टेनरियों को आधी क्षमता पर ही काम करने की मंजूरी दी गई है। मौजूदा आंकड़ों के अनुसार 65 टेनरियां पूरी तरह बंद पड़ी हैं, जबकि 13 टेनरियों को सिर्फ सूखे काम यानी बिना पानी वाली प्रक्रियाओं की ही इजाजत है। इसके अलावा 46 टेनरियां डिस्मेंटेल्ड यानी हटाई जा चुकी श्रेणी में दर्ज हैं। प्लांट की तय क्षमता और अभी पहुंच रहे पानी के बीच का यह फासला बताता है कि जाजमऊ की टेनरियों का उत्पादन अब भी किस हद तक सीमित है।
प्रदूषण की सबसे बड़ी कड़ी पर लगी रोक
जाजमऊ का यह प्लांट इसलिए खास मायने रखता है क्योंकि यहीं पर चमड़ा उद्योग और गंगा नदी के बीच बनने वाली प्रदूषण की सबसे बड़ी कड़ी को तोड़ने की कोशिश हो रही है। यह प्लांट ठीक उसी जगह बनाया गया है जहां से कभी टेनरियों का पानी गंगा में मिलता था, और यही वजह है कि अधिकारी इसे प्रदूषण रोकने की पूरी मुहिम का सबसे अहम हिस्सा मानते हैं। जिस जाजमऊ का नाम बरसों तक गंगा में फैलती गंदगी के साथ जोड़कर लिया जाता रहा, वहीं अब करोड़ों रुपये खर्च करके तैयार किया गया यह ट्रीटमेंट प्लांट दूषित पानी को नदी तक पहुंचने से पहले रोकने और साफ करने का जरिया बन चुका है।





















