मध्य प्रदेश के बाद अब उत्तर प्रदेश सरकार भी अपने वक्फ बोर्ड में बड़े बदलाव की तैयारी कर रही है। आने वाले समय में राज्य में नए वक्फ बोर्ड का गठन किया जाएगा, जिसमें पहली बार दो गैर-मुस्लिम सदस्यों को जगह दी जाएगी। इसके अलावा, इस नए बोर्ड में दो मुस्लिम महिलाओं और पसमांदा मुसलमानों को भी प्रतिनिधित्व प्रदान किया जाएगा। सरकारी आंकड़ों के अनुसार, सुन्नी वक्फ बोर्ड का ढांचा 11 सदस्यों का होगा, जिसमें एक चेयरमैन के साथ 10 सदस्य शामिल होंगे। प्रशासन का तर्क है कि बोर्ड में इस तरह के समावेशी बदलावों से कामकाज में पारदर्शिता बढ़ेगी।
उत्तर प्रदेश में वक्फ बोर्डों के कार्यकाल की बात करें तो सुन्नी वक्फ बोर्ड का कार्यकाल मार्च महीने में ही समाप्त हो चुका है, जबकि शिया वक्फ बोर्ड का कार्यकाल आगामी अक्टूबर में पूरा हो जाएगा। इन स्थितियों को देखते हुए राज्य सरकार ने प्रक्रिया शुरू कर दी है। जानकारी के लिए बता दें कि मध्य प्रदेश ऐसा पहला राज्य बना है जिसने अपने वक्फ बोर्ड में दो हिंदू सदस्यों को नियुक्त किया है, और अब उत्तर प्रदेश उसी मॉडल को अपनाने की ओर अग्रसर है। उत्तर प्रदेश में वक्फ संपत्तियों की बात करें तो राज्य में कुल 2,32,547 वक्फ संपत्तियां मौजूद हैं। इनमें से 2,17,161 संपत्तियां सुन्नी वक्फ बोर्ड के अंतर्गत आती हैं, जबकि 15,386 संपत्तियां शिया वक्फ बोर्ड के अधीन हैं। इसके अलावा उम्मीद पोर्टल पर अब तक 92,000 से अधिक वक्फ संपत्तियों का विवरण दर्ज किया जा चुका है।
समाजवादी पार्टी ने जताई असहमति
इस फैसले को लेकर राजनीतिक गलियारों में विरोध भी शुरू हो गया है। समाजवादी पार्टी के विधायक रविदास मेहरोत्रा ने सरकार के इस कदम की कड़ी आलोचना की है। उन्होंने इस विषय को राम मंदिर में कथित चंदा चोरी के आरोपों से जोड़ते हुए दावा किया है कि सरकार की असल मंशा वक्फ की जमीनों पर कब्जा करने की है। रविदास मेहरोत्रा ने तीखे शब्दों का इस्तेमाल करते हुए कहा कि जो लोग राम मंदिर ट्रस्ट में मौजूद हैं और जिन पर चढ़ावे में हेराफेरी के आरोप हैं, वे वक्फ बोर्ड में निष्पक्ष काम कैसे कर सकते हैं। उनका आरोप है कि गैर-मुस्लिम सदस्यों को शामिल करना केवल जमीन हड़पने का एक जरिया है।
मध्यप्रदेश मॉडल पर कानूनी चुनौती की तैयारी
मध्य प्रदेश में वक्फ बोर्ड के पुनर्गठन और वहां गैर-मुस्लिम सदस्यों की नियुक्ति का मामला अब सर्वोच्च न्यायालय तक पहुंचने की संभावना है। कांग्रेस नेताओं ने इस कदम को पूरी तरह अनुचित बताया है। कांग्रेस विधायक आरिफ मसूद का कहना है कि वक्फ अधिनियम से संबंधित मामला पहले से ही उच्चतम न्यायालय में लंबित है, जिस पर अंतिम निर्णय आना शेष है। आरिफ मसूद का तर्क है कि जब तक शीर्ष अदालत कोई अंतिम फैसला नहीं सुना देती, तब तक इस प्रकार की नियुक्तियां करना उचित नहीं था। उन्होंने स्पष्ट किया कि मध्य प्रदेश सरकार का यह निर्णय कानूनी रूप से कई गंभीर सवाल खड़े करता है, और इस पूरे मामले को लेकर वे सर्वोच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाएंगे ताकि बोर्ड के गठन और नियुक्तियों को चुनौती दी जा सके।











