तकरीबन दो दशकों तक देश की सबसे बड़ी और खौफनाक आपराधिक गुत्थियों में से एक रहे निठारी कांड के मुख्य आरोपी सुरेंद्र कोली की कहानी का अंत हो गया है। लगभग 19 वर्षों तक जेल की सलाखों के पीछे रहने के बाद, कानूनी रूप से पूरी तरह बरी होकर बाहर आया सुरेंद्र कोली अपनी आजादी के 310 दिन भी पूरे नहीं कर पाया। शुक्रवार को उत्तराखंड के हरिद्वार में भूपतवाला इलाके से उसकी मौत की खबर सामने आई, जहां उसने फांसी लगाकर खुदकुशी कर ली। अभी तीन दिन पहले ही उसने वहां एक स्थानीय चाय की दुकान पर काम करना शुरू किया था। जिस शख्स की जिंदगी के 6,935 दिन जेल की कालकोठरी में सुरक्षा और मुकदमों के बीच गुजरे, खुली हवा में आते ही उसकी सांसें हमेशा के लिए थम गईं। इस घटना ने एक बार फिर उस दौर की यादें ताजा कर दी हैं जिसने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया था।
जेल से लेकर बरी होने तक का उतार-चढ़ाव भरा सफर
सुरेंद्र कोली का कानूनी सफर बेहद पेचीदा और नाटकीय मोड़ों से भरा रहा। साल 2006 में गिरफ्तारी के बाद से वह लगातार जेल में बंद था। एक समय ऐसा था जब निचली अदालतों ने उसे बेहद जघन्य अपराधों का दोषी मानते हुए 13 अलग-अलग मामलों में मौत की सजा सुनाई थी। देश की जनता और न्याय प्रणाली के बीच इस मामले को लेकर गहरा गुस्सा था। हालांकि, जैसे-जैसे यह मामला उच्च अदालतों में अपील के जरिए पहुंचा, अभियोजन पक्ष के दावों की कलई खुलने लगी। साल 2023 में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक बड़ा फैसला सुनाते हुए कोली को 12 मामलों में बरी कर दिया था। अदालत ने जांच के तरीकों और पेश किए गए सबूतों की विश्वसनीयता पर कड़े सवाल उठाए थे। इसके बाद भी उसके खिलाफ एक मामला लंबित था, जिसमें उसे राहत मिलना बाकी था।
सुप्रीम कोर्ट का अंतिम फैसला और रिहाई
सुरेंद्र कोली के भाग्य का अंतिम फैसला नवंबर 2025 में हुआ। उसका आखिरी मामला देश की शीर्ष अदालत यानी सुप्रीम कोर्ट के समक्ष पहुंचा। सुप्रीम कोर्ट ने जांच एजेंसियों की कार्यप्रणाली में बड़ी कमियों, ठोस वैज्ञानिक सबूतों की अनुपस्थिति और फॉरेंसिक साक्ष्यों के अभाव को रेखांकित किया। अदालत ने पाया कि कोली के खिलाफ लगाए गए आरोपों को साबित करने के लिए पर्याप्त और पुख्ता सबूत मौजूद नहीं थे। इसी आधार पर न्यायालय ने उसे इस अंतिम मामले में भी पूरी तरह दोषमुक्त कर दिया। इससे पहले इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कोठी के मालिक मोनिंदर सिंह पंढेर और घरेलू सहायक सुरेंद्र कोली दोनों को सबूतों की भारी कमी के कारण राहत दी थी। सभी कानूनी अड़चनों से मुक्त होने के बाद कोली आखिरकार जेल की चहारदीवारी से बाहर आ सका था, लेकिन उसकी यह आजादी बेहद संक्षिप्त साबित हुई।
निठारी कांड: नोएडा की वह खौफनाक कोठी डी-5
इस पूरे घटनाक्रम की शुरुआत साल 2005 और 2006 के बीच हुई थी, जब उत्तर प्रदेश के नोएडा स्थित निठारी गांव से अचानक बच्चे और महिलाएं लापता होने लगे थे। एक के बाद एक कई लोगों के गायब होने से पूरे इलाके में दहशत का माहौल बन गया था। पुलिस की शुरुआती सुस्ती के बाद जब जांच ने रफ्तार पकड़ी, तो सुराग नोएडा के सेक्टर-31 स्थित कोठी नंबर डी-5 की तरफ गए। यह आलीशान कोठी एक कारोबारी मोनिंदर सिंह पंढेर की थी, और सुरेंद्र कोली वहां उसका घरेलू नौकर या सहायक था। जांचकर्ताओं को भनक भी नहीं थी कि इस कोठी की दीवारों के पीछे कितना बड़ा राज छिपा हुआ था।
नाले से मिले नरकंकाल और सीबीआई की जांच
29 दिसंबर 2006 का वह दिन भारतीय अपराध के इतिहास में दर्ज हो गया, जब कोठी डी-5 के पीछे बने एक नाले और उसके आसपास की जमीन से इंसानी खोपड़ियां, हड्डियों के अवशेष, बच्चों के सड़े-गले कपड़े और अन्य संदिग्ध सामान बरामद हुए। इस वीभत्स खोज ने पूरे देश को हिलाकर रख दिया। इसके तुरंत बाद पुलिस ने मोनिंदर सिंह पंढेर और उसके नौकर सुरेंद्र कोली को गिरफ्तार कर लिया। मामले की संवेदनशीलता और बड़े पैमाने पर फैले जनाक्रोश को देखते हुए जनवरी 2007 में इस पूरे मामले की जांच केंद्रीय जांच ब्यूरो यानी CBI को सौंप दी गई। स्थानीय पुलिस ने इस सिलसिले में कुल 19 विभिन्न गुमशुदगी और गंभीर अपराधों के मुकदमे दर्ज किए थे। CBI ने अपनी गहन पड़ताल के बाद इनमें से 16 मामलों में अदालत के सामने आरोप पत्र दाखिल किए, जिनमें कोली पर अपहरण, बलात्कार, बर्बर हत्या और सबूतों को मिटाने जैसे बेहद संगीन आरोप लगाए गए थे।
हरिद्वार में जीवन का अंतिम अध्याय
कानूनी मुकदमों से बरी होने के बाद सुरेंद्र कोली ने समाज की मुख्यधारा में लौटने की कोशिश की थी। वह अपनी पहचान छिपाकर या नए सिरे से जिंदगी शुरू करने के इरादे से उत्तराखंड के धार्मिक शहर हरिद्वार पहुंचा था। वह उत्तरी हरिद्वार के भूपतवाला नामक इलाके में आया और वहां एक साधारण सी चाय की दुकान पर अपनी रोजी-रोटी कमाने के लिए काम करने लगा। लेकिन वहां काम शुरू किए अभी केवल तीन दिन ही हुए थे कि शुक्रवार को उसकी लाश फंदे से लटकती हुई पाई गई। शुरुआती जांच के आधार पर स्थानीय पुलिस इसे आत्महत्या मान रही है। जो शख्स लगभग दो दशकों तक जेल की सख्त सुरक्षा में जीवित रहा, वह खुली दुनिया में आने के एक साल के भीतर ही टूट गया और इस तरह निठारी कांड के सबसे चर्चित चेहरे का अंत बेहद खामोशी से हो गया।


















