उत्तराखंड के पहाड़ी इलाकों में बने पुराने आवासों की सबसे बड़ी विशेषता उनकी स्लेट से बनी छतें हुआ करती थीं। स्थानीय बोलचाल में स्लेट को पत्थर की मजबूत पट्टियों के रूप में पहचाना जाता था। इन घरों का निर्माण करते समय वहां की जलवायु और प्राकृतिक रूप से मिलने वाले साधनों को प्रमुखता दी जाती थी। इसी वजह से छतों के निर्माण में स्लेट का बड़े पैमाने पर उपयोग किया जाता था। दूरदराज से देखने पर एक कतार में सजी ये पट्टियां पर्वतीय बस्तियों को एक अनूठा और सुंदर स्वरूप प्रदान करती थीं।
स्थानीय जानकार किशन मलड़ा के अनुसार पर्वतीय क्षेत्रों में वर्षा ऋतु काफी लंबी और कई स्थानों पर बेहद मूसलाधार होती है। इस स्थिति को ध्यान में रखते हुए घरों की छतें ऐसी तकनीक से बनाई जाती थीं जिससे पानी का निकास तुरंत हो सके। स्लेट की इन छतों में तेज ढलान रखी जाती थी ताकि बारिश का पानी उन पर ज्यादा देर न ठहरे और ढलान के सहारे तेजी से नीचे बह जाए। इससे छत पर पानी ठहरने या सीलन आने की समस्या न्यूनतम हो जाती थी। यदि इन पत्थरों को करीने से व्यवस्थित किया जाए, तो वे दशकों तक भारी बारिश का आसानी से मुकाबला कर सकती हैं।
राज्य के अधिक ऊंचाई वाले इलाकों में सर्दियों के मौसम में भारी हिमपात होता है। ऐसे बर्फीले क्षेत्रों में छत का वास्तुशिल्प बेहद अहम भूमिका निभाता था। स्लेट की ढलान वाली बनावट के कारण बर्फ उस पर ज्यादा देर तक जमने के बजाय धीरे-धीरे फिसलकर नीचे आ जाती थी। इससे छत के ढांचे पर अत्यधिक वजन पड़ने का खतरा टल जाता था। हालांकि बर्फबारी वाले इलाकों में छत की मजबूती और कोण को वहां की भौगोलिक स्थिति के हिसाब से ही ढाला जाता था। उस दौर के उस्ताद कारीगर मौसम के मिजाज और भौगोलिक स्थिति की गहरी समझ के आधार पर इनका निर्माण करते थे।
पहाड़ी अंचलों में कई जगहों पर तेज गति से हवाएं बहती हैं। ऐसे में ऐसी निर्माण सामग्री की आवश्यकता थी जो विपरीत हवाओं का सामना कर सके। स्लेट की ये पट्टियां भारी-भरकम और मजबूत होती हैं, जिन्हें लकड़ी या अन्य टिकाऊ ढांचों पर खास तरीके से जमाया जाता था। यदि निर्माण कार्य सही ढंग से किया गया हो, तो आंधी-तूफान में इनके उड़ने का जोखिम हल्की छतों की तुलना में काफी कम रहता था। पुराने पर्वतीय आवासों में इन पत्थरों को लगाने का जिम्मा कुशल और अनुभवी कारीगरों के हाथों में होता था।
ये स्लेट और पत्थर केवल छत को टिकाऊ बनाने तक सीमित नहीं थे, बल्कि घर के भीतर का तापमान संतुलित रखने में भी अपनी अहम भूमिका निभाते थे। पत्थर की यह खूबी होती है कि वे गर्मी को बहुत धीमी गति से सोखते और छोड़ते हैं। इसके परिणाम स्वरूप गर्मियों के दिनों में घर के भीतर का तापमान बाहर के मुकाबले काफी ठंडा रहता था और सर्दियों में भी भीतर का वातावरण कुछ हद तक अनुकूल बना रहता था। पहाड़ों में जहां दिन और गर्मी तथा रात की ठंड में बड़ा अंतर होता है, वहां की पारंपरिक निर्माण शैली का यह गुण बेहद उपयोगी साबित होता था।
पर्वतीय इलाकों में निर्माण सामग्री को दूरदराज के क्षेत्रों से ढोकर लाना पहले बहुत कठिन कार्य था। उस समय आधुनिक सड़क मार्ग और परिवहन के साधन आज जैसे विकसित नहीं थे। ऐसे कठिन दौर में स्थानीय स्तर पर सहजता से उपलब्ध पत्थरों का प्रयोग आवास बनाने के लिए किया जाता था। पहाड़ों में बहुतायत में स्लेट पत्थर मिलने के कारण लोग छतों के लिए इसी का चयन करते थे। इससे ढुलाई पर होने वाले भारी खर्च और शारीरिक मेहनत दोनों में काफी बचत हो जाती थी। आसपास मिलने वाले पत्थर, लकड़ी और मिट्टी जैसी प्राकृतिक सामग्रियों से ही घर खड़े किए जाते थे।
स्लेट की मजबूती और दीर्घायु इसकी सबसे बड़ी खासियत मानी जाती है। बेहतरीन गुणवत्ता वाले पत्थरों और मजबूत फ्रेम के साथ तैयार की गई छतें बहुत लंबी अवधि तक चलती थीं। बीच-बीच में यदि कोई पत्थर टूट जाता या अपनी जगह से खिसक जाता था, तो केवल उसे बदलकर छत की मरम्मत कर ली जाती थी। इसके चलते पूरी छत को नए सिरे से बनाने की जरूरत नहीं पड़ती थी। आज भी पुराने गांवों के कई मकानों में स्लेट की ये छतें सुरक्षित दिखाई देती हैं। हालांकि लगातार बारिश, बर्फ, कड़ी धूप और उचित देखभाल के अभाव में अब इन्हें नुकसान भी पहुंच रहा है।
वक्त के साथ पर्वतीय क्षेत्रों में मकान बनाने के तौर-तरीकों में भी तेजी से बदलाव आ रहा है। अब स्लेट के स्थान पर तमाम लोग टिन, सीमेंट और अन्य आधुनिक निर्माण सामग्रियों का खुलकर इस्तेमाल कर रहे हैं। इन नए उत्पादों को लगाना कई परिस्थितियों में बेहद आसान और तीव्र होता है। इसके बावजूद स्लेट की ये पुरानी छतें उत्तराखंड की समृद्ध पारंपरिक वास्तुकला, स्थानीय कारीगरों के कौशल और पहाड़ी जीवनशैली की जीवंत दास्तां बयान करती हैं। आज भी पुराने गांवों में मौजूद स्लेट वाले ये घर पर्यटकों और विरासत प्रेमियों के लिए खासे आकर्षण का केंद्र बने हुए हैं।




















