बागेश्वर शहर में स्थानीय स्तर पर चल रही डेयरी अब क्षेत्र के पशुपालकों की आजीविका का मजबूत आधार बनती जा रही है। सरस मार्केट के पास प्रेमा कोरंगा द्वारा संचालित इस डेयरी से पच्चीस से अधिक पशुपालक सीधे तौर पर जुड़े हुए हैं। ये पशुपालक अपने मवेशियों से उत्पादित दूध को इसी डेयरी में लाते हैं और इसके बदले उन्हें हर समय पर भुगतान मिलता है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार इस व्यवस्था के जरिए जुड़े हुए काश्तकारों को हर महीने एक लाख रुपये से अधिक की राशि बांटी जा रही है।
स्थानीय पशुपालकों को मिल रहा है सीधा लाभ
प्रेमा कोरंगा ने इस बारे में जानकारी देते हुए बताया कि इस डेयरी के संचालन से स्थानीय पशुपालकों को सबसे बड़ा फायदा यह हुआ है कि उन्हें अपना दूध बेचने के लिए दूर-दराज के बाजारों की खाक नहीं छाननी पड़ती। ग्रामीण इलाकों और घरों में पैदा होने वाले दूध को सीधे इस केंद्र तक पहुंचाकर वे लगातार आमदनी कमा रहे हैं। इससे उन परिवारों को बहुत बड़ा आर्थिक संबल मिल रहा है जिन्होंने पशुपालन को अपने मुख्य व्यवसाय के रूप में अपनाया हुआ है। विशेष तौर पर छोटे और सीमांत पशुपालकों के लिए दूध की यह नियमित बिक्री उनकी आजीविका का अहम जरिया बन चुकी है।
इस केंद्र में पशुपालकों से जो दूध इकट्ठा किया जाता है उसे सीधे उपभोक्ताओं तक तो पहुंचाया ही जाता है, साथ ही इससे कई तरह के स्वादिष्ट और जरूरी दुग्ध उत्पाद भी तैयार किए जाते हैं। इन उत्पादों में ताजा दही, शुद्ध घी, छाछ और अन्य सामग्रियां शामिल हैं। शहर के आम नागरिकों को भी इसके चलते बेहद ताजा और स्थानीय दूध से बने उत्पाद आसानी से मिल जाते हैं। इससे एक तरफ जहां खरीदारों की जरूरतें पूरी हो रही हैं, वहीं दूसरी तरफ दूध के उत्पादन से लेकर उसकी बिक्री तक स्थानीय स्तर पर रोजगार के नए रास्ते खुल रहे हैं।
डेयरी कारोबार में निवेश और विस्तार की संभावनाएं
प्रेमा कोरंगा का यह मानना है कि स्थानीय स्तर पर दूध की खपत और उसकी बिक्री में लगातार बढ़ोतरी होने से पशुपालन को बहुत बढ़ावा मिल रहा है। यदि पशुपालकों को उनके दूध का सही और तय समय पर बाजार मिलता रहे, तो ग्रामीण इलाकों के और भी परिवार इस काम से जुड़ सकते हैं। इससे गांवों में खुद का रोजगार यानी स्वरोजगार के अवसर तेजी से बढ़ेंगे और परिवारों की आर्थिक स्थिति भी मजबूत होगी। इस डेयरी से जुड़े लोगों के लिए समय पर मिलने वाला भुगतान अपने आप में एक बेहद अहम बात है।
दूध एक ऐसा उत्पाद है जो बहुत जल्दी खराब हो जाता है, ऐसे में पास में ही बाजार मिल जाने से किसानों को अपनी उपज को दूर के शहरों या बाजारों में ले जाने की जद्दोजहद से मुक्ति मिल जाती है। इसके अलावा स्थानीय स्तर पर दूध और उससे बनने वाली चीजों की मांग बढ़ने से लोग अपने पशुओं की संख्या बढ़ाने और इस सेक्टर में पैसा लगाने के बारे में भी सोच रहे हैं। बागेश्वर जैसे पहाड़ी जिलों में पशुपालन हमेशा से ही ग्रामीण अर्थव्यवस्था की रीढ़ रहा है। ऐसे में स्थानीय स्तर पर इस तरह के डेयरी बिजनेस को प्रोत्साहन मिलने से पशुपालकों को बाजार, पक्की कमाई और स्वरोजगार तीनों का फायदा एक साथ मिल रहा है। प्रेमा कोरंगा की इस डेयरी से जुड़े पच्चीस से ज्यादा पशुपालकों का उदाहरण इस बात की गवाही देता है कि सही दिशा में प्रयास करने से ग्रामीण अर्थव्यवस्था कितनी मजबूत हो सकती है।





















